मोदी हैं तो सब मुमकिन है फिर भी भय किस बात का?

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। भारतीय जनता पार्टी का हर छोटा बडा नेता और कार्यकर्ता आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की रणनीति के चलते इस विश्वास में भरे हुए है। इस बार का लोकसभा भी जिस तरह से 2014 चुनाव जिस तरह से देश की जनता बड़े बड़े ख्वाब कभी अच्छे दिन आने वाले हैं, देश के हर नागरिक के खाते में पन्द्रह -पन्द्रह लाख में डाल दिए जाएंगे, मंहगाई कम होगी आदि -आदि तमाम लोक लुभाने वायदों के झांसे में फंसाकर सरकार हथिया ली थी। मगर ऐसा मोदी के पांच साल न तो देश के उन एक दिन के राजाओं (मतदाताओं) की तो बात छोडिए भाजपा के उन नेताओं और कार्यकर्ताओं को जो हर हर मोदी घर घर मोदी राग पास तक गाते बेवकूफ बनते रहे। अब फिर लोकसभा का चुनाव आय तो रोज नित्य -नित्य जुमलों की शुरुआत तो हुई साथ ही पार्टी के उन स्थापित निष्ठावान ,देव दुर्लभ नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ विश्वासघात और उनके बेजियती दौर की भी शुरुआत हो गई जिन्होंने अपने तन मन और धन की बदौलत आज पार्टी को इस मुकाम तक पहुंचया कि आज उनकी उस त्याग, तपस्या,निष्ठा और बलिदान की बदौलत पार्टी अपने चाल, चरित्र और चेहरे कारण अन्य राजनैतिक दलों अलग उसकी पहचान थी। यही वह कारण थे कि राजनीति से जुडा हर आदमी भाजपा समर्थक न होते हुए भी उसकी नीतियों सिद्धांतों की चर्चा करते नहीं थक था? मगर पिछले कुछ बर्षो से पार्टी चाल, चरित्र और चेहरे में काफी बदलाव आया कि अब लोग इस पार्टी को जुमलों बाज पार्टी तो कहने लगे हैं। पार्टी के नेताओं की बातों पर भरोसा उठ गया। हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने जो पार्टी के स्थापकों से एक उन लालकृष्ण आडवाणी की बर्षो पुरानी उस गांधीनगर संसदीय क्षेत्र से जिसका आडवाणी अनेकों समय से चुनाव लगते आए हैं। उस संसदीय क्षेत्र से अपनी उम्मीदवारी घोषित कर उन्हें लोकतंत्र के उस अधिकार से भी बंचित कर अपने नेता और पार्टी में अपने बडे बुर्जुग उन नेताओं के साथ दुव्र्यवहार और विश्वनात करने की नई परंपरा की शुरुआत करदी? वैसे भाजपा में यह परंपरा की शुरुआत कोई नई बात नहीं है। हमारे ही मध्यप्रदेश में भारी मेहनत मशक्कत कर उह कांग्रेस की सरकार के मुखिया दिग्विजय सिंह जिनके शासनकाल में शिवराज सिंह चौहान के राजनीतिक गुरु स्व सुन्दर लाल पटवा, कैलाश सांरग और विक्रम वर्मा जैसे अनेकों नेताओं की कार्यशैली के चलते इस समय प्रदेश भाजपा (डी) यानी दिग्विजय सिंह कहा जाता था। उस समय उमा भारती ने जब दिग्विजय सिंह को सत्ता से बेदखल करने उमा भारती के खिलाफ वह भाजपा के नेता सक्रिय हो गए थे जिन्हें चुनाव के समय उमा भारती द्वारा इस प्रदेश की जनता को अपने घोषणा – पत्र के माध्यम से भय, भूख और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देने का वायदा किया था। इसी से परेशान भाजपा के कई नेता तो अपनी सम्पति और कारोबार बेचकर भोपाल में बसने की तैयारी करने लगे थे। साथ ही उमा भारती की खिलाफ षडयंत्र भी रचना प्रारंभ कर दिया था। ऐसा ही षडयंत्र उमा के तिरंगा मामले की वजह से बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाने के बाद भी गौर के खिलाफ राजधानी के 74 बंगले से शुरुआत हुई थी जिस के पीछे कौन था यह भी राजनीति से जुड़े सभी लोग जानते हैं? वैसे भाजपा में षडयंत्र रचे जाने की परंपराओं से राजनीति से हर व्यक्ति जानता है कि भाजपा में किसने किसके साथ किस तरह का षडयंत्र किया मगर जिस भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लालकृष्ण आडवाणी के साथ जिस तरह की परंपरा डाली उसका असर पार्टी के लिये ठीक नहीं माना जाएगा है? आने बाले समय में इसके दूरगामी परिणाम सामने आएंगें? फिर भी ऐसी स्थिति में जब पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में यह धारणा बनी हुई है कि मोदी हैं तो सब मुमकिन है के बाद भी पार्टी के अधिकांश सांसद रणझोर बनने की स्थिति क्यों हैं। राज्य के दो चर्चित जोगी में से मोदी मंत्रिमंडल के सदस्य जो हाल ही सम्पन्न विधानसभा चुनाव में अपने गृह गांव की विधानसभा से पार्टी के प्रत्याशी की जीत की तो बात छोडिए अपने स्वयं के गांव से भाजपा के उम्मीदवार को प्रर्याप्त मत नहीं दी पाए ऐसी क्या वजह थी देश और प्रदेश की राजनीति करने बाले नरेंद्र तोमर की साख उनके अपने गांव में गांव के लोग नहीं बचा पाए। फिर अपने आपको लोकप्रिय मानने का भ्रम पाले नरेंद्र तोमर ब्राम्हण नेता स्व अटल बिहारी बाजपेयी के भांनजे अनूप मिश्रा का हक मारने पर तुले हुए हैं ? जिन तोमर ने शिवराज सिंह चौहान के साथ मिलकर अपनी मनमानी और विधानसभा में पदस्थ एक अधिकारी के माध्यम से 2008,2013 में ही नहीं 2018 के विधानसभा के चुनाव में टिकट बेचने की चर्चाएं लोग चटखारे लेते नजर आ रहे हैं। पार्टी के अनेकों नेताओं का तो यहां तक कहना है कि 2018 के चुनाव इन्हीं दोनों नेताओं की मनमानी कार्यशैली के कारण पार्टी को सत्ता गंवाना पड़ी? तो वही ग्वालियर चंबल संभाग में भाजपा को जो नुकसान हुया उसके लिए भाजपा के अनेकों नेता तोमर को ही दोषी मानते हैं। पार्टी बुजुर्ग नेताओं का तो यहां तक कहना है कि यदि मोदी और शाह नरेन्द्र तोमर को अब भी लोकप्रिय नेता मानकर उन्हें इस चुनाव में उम्मीदवार बनाते हैं तो इसका खामिजा पार्टी एक नहीं उनकी आसपास की लोकसभा सीटों से पराजय का खामिजा भुगतना पड़ेगा। क्योंकि जिस तरह से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से लालकृष्ण आडवाणी के साथ जो दाव खेला है इसके परिणाम दूरगामी होगे? सबाल यह भी है जब भाजपा का हर छोटा बडा नेता से लेकर कार्यकर्ता यह मानकर चल रहा है कि मोदी है तो सब मुमकिन है फिर अपने आपको लोकप्रिय मानने बाले नरेंद्र तोमर जैसे मोदी मंत्रिमंडल के यह मंत्री सहित तमाम सांसद रणझोर जैसी भूमिका अपनाने में क्यों लगे हुए हैं?

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