मोदी-शाह ने कभी सोचा ऐसा ?

0
27

०-हरिशंकर व्यास
मैंने भी नहीं सोचा कि सीबीआई को ले कर ऐसी घटनाएं होंगी! सोचें, नरेन्द्र मोदी ने क्या सोच कर आधी रात को आलोक वर्मा को हटाने का फैसला लिया और उसके बाद कैसा नैरेटिव बना? सुप्रीम कोर्ट, राफेल की जांच की बातें होती रहेंगी। पूरे देश में सीबीआई की चर्चा है। नरेन्द्र मोदी की मंशा, आधी रात की इमरजेंसी की बातें हैं। आलोक वमा्र आरोपी साबित हों या न हों और भले सरकार के मनमाफिक राकेश अस्थाना, नोगश्वर राव सीबीआई को चलाने वाले बने तब भी अगले छह महीने मतलब अप्रैल २०१९ के आम चुनाव तक सीबीआई मुद्दा रहेगा। उसमें नरेन्द्र मोदी की बदनामी वाली बातें अधिक होंगी तो फायदे की कम। आगे अब नरेन्द्र मोदी और अमित शाह सीबीआई या ईडी के जरिए पी. चिदंबरम या किसी भी क्षत्रप विपक्षी नेता को बदनाम करने का हल्लाबोल कर सकेंगे। हिसाब से मोदी को सीबीआई ने आलोक वर्मा को मैनेज रखना था। कुछ भी हो डायरेक्अर भी जब उन्हें मोदी सरकार ने बनाया था तो नौबत नहीं आने देती थी जिससे आलोक वर्मा और उनके नीचे के गुजरात से लाए राकेश अस्थाना और एके शर्मा में रिश्ते ऐसे बने जिससे सरकार की परेशानी बने। नोट करें कि मूल लड़ाई गुजरात से आने के बाद राकेश अस्थाना बनाम एके शर्मा की है। अमित शाह के भरोसेमंद एके शर्मा थे। पहले राकेश अस्थाना था। अस्थाना क्योंकि नरेन्द्र मोदी के निजी वफादार और भरोसेमंद थे इसलिए प्रधानमंत्री दफ्तर की गुजराती लॉबी मतलब पीकेशर्मा, टोपने, भरतलाल, कुनबे आदि की राशि अस्थाना से अंतरंगता थी। राकेश अस्थापना की महत्वाकांक्षा और डायरेक्टर बननना तय माने होने से आलोक वर्मा ट्रांजिक् शन चेहरा माने गए। इस घमंड में सीबीआई में राकेश अस्थापना, गुजराती लॉबी ने राजनीति की। इसका नतीजा था जो आलोक वर्मा ने नंबर दो के बजाए नंबर तीन के एके शर्मा की अहमियत बनाई। हकीकत है कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने इसमें हर्ज नहीं माना। इसमें राकेश अस्थाना और घुटे। सीबीआई में नवम्बर दो और नवम्बर तीन में ठनी तो राकेश अस्थाना ने आलोक वर्मा के खिलाफ भी भ्रष्टाचार का हल्ला करवाया तो नंमबर तीन एके शर्मा को भी बदनाम कराया। हिसाब से नरेन्द्र मोदी और अमित शाह दोनों गुजरात के अपने दोनों भरोसेमंदों का झगड़ा सुलटाने में समर्थ थे। तभी अपने को समझ नहीं आया कि कैसे एके शर्मा के जरिए अमित शाह ने सीबीआई हैंडल किए रखी तो राकेश अस्थाना ने नरेन्द्र मोदी से बात करके क्यों नहीं एके शर्मा को पहले या तो हाशिए में डलवाया या खुद को जनवरी तक इंतजारी के मोड में रखा। बहरहाल जो हुआ वह नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के या तो वक्त खराब होने के चलते हैं या तो वक्त खराब होने के चलते है या विनाशाकारी विपरीत बुद्धि वाली बात है। हद तो यह है कि आलोक वर्मा की छुट्टी के साथ मोदी-शाह ने उन एके शर्मा को भी सीबीआई से बाहर फेंक खड्डे में डाला है जिनके पास अमित शाह-मोदी के कई राज हैं। सो आलोक वर्मा, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, दो-तीन सप्ताह सीवीसी से जांच का हल्ला अपनी जगह होत रहना है तो वही राकेश अस्थाना की जांच की पेचीदगी, एके शर्मा जैसे राजदार सीबीआई अफसरों के अंडमान तबादले से बनी खुन्नस और आज कल में राकेश अस्थाना याकि गुजराती लॉबी के ही कारण प्रवर्तन निदेशालय, ईडी में राजेश्वर सिंह पर होने वाली कार्रवाई से ऐसा रायता फैलेगा कि उसे रायते में एक तरफ नरेंद्र मोदी फिसले हुए होंगे तो दूसरी ओर अमित शाह और तीसरी तरफ अरुण जेटली अकेले डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ही इस रायते में कीचड़ भरी दिखाता देने वाले हैं। इस सबके अलावा फिर सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई और सड़कों पर फैल गया राफेल का कीचड़ हे। कल सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में राफेल का मामला है। चीफ जस्टिस आलोक वर्मा हाबड़तोड़ हथकड़ी दिखाए या धीरे-धीरे विचार करते-करते फैसले सुनाते जाए और कार्रवाई बढ़ाते जाए सबकी सुर्खियां तो बनती जाएंगी। क्या इस सबका नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के पूर्वानुमान लगाया था? इस सप्ताह अरुण जेटली की सलाह और सीवीसी के यहां नोट बनने और फिर आधी रात में अजित डोभाल से सीबीआई पर बिजली कड़काते वक्त नरेन्द्र मोदी ने जो सोचा था क्या उसके बाद वैसी घटनाएं व नैरेटिव बना? नहीं। तभी यह सब प्रमाण है कि अब मोदी राज के नियंत्रण मेें कुछ नहीं है। घटनाओं के भंवर में मोदी-शाह फंस गए हैं। और वक्त उनके नियंत्रण में नहीं।
०-नया इंडिया के कालम ”रविवारी गपशप” से साभार)
०००००००००००००

LEAVE A REPLY