मोदी शाह की नजर में: यॅू बढ़ा मध्यप्रदेश का सियासी ग्राफ

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०- अरुण पटेल
एक समय था जब केंद्र की राजनीति में कांग्रेस के सत्तारुढ़ रहते मध्यप्रदेश का दबदबा हुआ करता था। उसके बाद केंद्र में मोदी सरकार बनने के पश्‍चात मध्यप्रदेश को फिर से महत्व मिलना शुरु हो गया है। केंद्रीय सत्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दुबारा धमाकेदार वापसी के बाद जिन चेहरों को केन्द्र की राजनीति में तवज्जो मिली उसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि प्रदेश को केवल प्रतीकात्मक नहीं अपितु सत्ता व संगठन की राजनीति में अहम् हिस्सेदारी मिली है। मध्यप्रदेश देश के केंद्र में है और यहां के जिन भाजपा नेताओं को अहम् दायित्व सौंपे गए हैं उसका संदेश देश के दूसरे राज्यों में भी देने की कोशिश की गयी है। ग्रामीण विकास, खेती-किसानी के साथ ही दलितों व आदिवासियों के बीच भाजपा का जनाधार और मजबूत करने के रुप में इसे देखा जा सकता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नजर में मध्यप्रदेश का ग्राफ काफी बढ़ गया है। विपक्षी राजनीति में भी मध्यप्रदेश का दबदबा बना रहे इसकी शुरुआत डिनर डिप्लोमेसी के रुप में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने प्रारंभ की है और वह आगे चलकर कितना परवान चढ़ती है इस पर ही यह निर्भर करेगा कि राष्ट्रीय फलक पर कांग्रेस में मध्यप्रदेश के नेताओं को कितनी तवज्जो मिलती है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण विभागों के साथ नरेंद्र सिंह तोमर, थावरचंद गेहलोत, प्रहलाद सिंह पटेल और फग्गन सिंह कुलस्ते की मौजूदगी ने प्रदेश का महत्व बढ़ाया है। प्रधानमंत्री मोदी ने संसदीय दल के पदाधिकारियों की घोषणा करते हुए राज्यसभा का नेता थावरचंद गेहलाते को बनाकर पूरे देश में एक संदेश देने की कोशिश की है कि दलित वर्ग के लोगों को वह कितनी तवज्जो देती है। पूर्व मंत्री एवं सात बार लोकसभा सदस्य रहे डॉ. वीरेंद्र कुमार को लोकसभा का प्रोटेम स्पीकर बनाया गया है, ये दोनों ही दलित समाज से आते हैं और मध्यप्रदेश के हैं। उत्तरप्रदेश में तो भाजपा की पकड़ काफी मजबूत है लेकिन मध्यप्रदेश में इस समय कांग्रेस की सरकार है और उसके मुखिया कमलनाथ हैं। भाजपा नेतृत्व की कोशिश यह है कि मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनाव के बाद जो माहौल बना है उसे स्थायी किया जाए। भले ही उत्तरप्रदेश में महागठबंधन के कारण मायावती की सीटों में कुछ इजाफा हो गया हो लेकिन अन्य राज्यों में बसपा का जनाधार तेजी से खिसक रहा है, जिसकी चिन्ता मायावती भी कर रही हैं। उत्तप्रदेश में धीरे-धीरे दलित वर्ग में मायावती की पकड़ कमजोर हो रही है और लोग उनसे छिटक रहे हैं। मायावती से खिसकने वाला दलित मतदाता कांग्रेस में झोली में न जा पाए इसकी रोकथाम के लिए अरुण जेटली की जगह थावरचन्द गेहलोत को राज्यसभा का नेता बनाया गया है। पूरे देश में दलितों के बीच और अधिक मजबूत पकड़ बनाने तथा भाजपा की राजनीति में इस वर्ग को कितनी तवज्जो मिल रही है इसे रेखांकित करने की कोशिश की गयी है। भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी दलित वर्ग के ही प्रतिनिधि हैं। देश के उच्च सदन का अपना महत्व है और भाजपा दल के नेता के रुप में उस दलित चेहरे को चुना गया है जिसके पास इन्हीं वर्गों से संबंधित विभाग भी है। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि एक सोची-समझी दूरगामी रणनीति के तहत भाजपा ने अपनी बिसात बिछा दी है।

संगठनात्मक स्तर पर भी भाजपा में मध्यप्रदेश का दबदबा बढ़ा है। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रुप में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, उमा भारती और प्रभात झा पहले से ही मौजूद हैं और अब सदस्यता अभियान प्रभारी शिवराज को बनाकर उनको एक चुनौतीपूर्ण लक्ष्य दिया गया है कि वे पार्टी में 2 करोड़ 20 लाख नये सदस्य बनायें। वैसे तो नये सदस्य पूरे देश में बनाये जायेंगे लेकिन पश्‍चिम बंगाल, तामिलनाडु, केरल, पांडुचेरी, लक्ष्यदीप, उड़ीसा, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और सिक्किम जैसे राज्यों पर पार्टी का फोकस ज्यादा है। अमित शाह भी कह चुके हैं कि अभी भाजपा अपने चर्मोत्कर्ष पर नहीं पहुंची है उसे उन क्षेत्रों में भी शिखर पर पहुंचना है जहां अभी उसकी उपस्थिति नाममात्र की है। शिवराज एक चतुरसुजान राजनेता हैं और वे इसके पीछे छिपे मंतव्य को भी भलीभांति समझ गए हैं। उन्हें नेतृत्व की इस कसौटी पर अपने आपको सफल साबित करना है जिसमें उस पार्टी के अंदर जो कि अभी तक 11 करोड़ सदस्य बनाकर सदस्यता के मामले में दुनिया में सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है उसमें 20 प्रतिशत और नये लोगों को जोड़ना है। शिवराज ने बिना एक क्षण की देरी किए अपने अभियान का रोडमैप तैयार कर लिया है ताकि पार्टी हाईकमान के पास यह मेसेज जाये कि वे पूरे मनोयोग से इस काम में भिड़ने जा रहे हैं। 17 जून को उन्होंने इसकी बैठक दिल्ली में आहूत की है जिसमें अपनी टीम के सदस्यों के साथ अमित शाह का मार्ग दर्शन लेते हुए विचार-विमर्श कर प्रदेश प्रभारियों की नियुक्ति की जायेगी। 24 जून को सभी प्रदेशों में प्रदेश स्तरीय बैठकें आयोजित की जायेंगी। जैसा कि किसी नये काम की शुरुआत प्रतीकात्मक रुप से ही सही लेकिन किसी अच्छे अवसर की तलाश कर प्रारंभ करने में शिवराज को महारत हासिल है, इसीलिए उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर सदस्यता अभियान की शुरुआत 6 जुलाई से प्रारंभ कर 20 अगस्त तक का समय मुकर्रर कर दिया है। जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का जन्मदिन 6 जुलाई है और उसी दिन से अभियान शुरु होगा। शिवराज का कहना है इस काम की शुरुआत के लिए इससे शुभ दिन और कोई नहीं हो सकता था। सर्वव्यापी और सर्वस्पर्शी भाजपा बनाने के लिए विभिन्न वर्गों के नये लोगों को उससे जोड़ने का प्रयास सदस्यता अभियान है तथा बूथ स्तर पर फोकस किया जायेगा। शिवराज को भरोसा है कि वे इस लक्ष्य को पार कर 20 प्रतिशत से भी अधिक नये सदस्य पार्टी में जोड़ेंगे।

भाजपा संगठन में कैलाश विजयवर्गीय का महत्व और अहमियत उनको सौंपे गये कार्यों को सफलता के अंजाम तक पहुंचाने के कारण अत्याधिक बढ़ गया है। अमित शाह के भरोसे के तो वे प्रारंभ से ही माने जाते रहे हैं और उनकी टीम में बतौर महासचिव शामिल होने के बाद से राष्ट्रीय फलक पर कैलाश विजयवर्गीय का कद इसलिए निरन्तर बढ़ता जा रहा है क्योंकि वे हर चुनौती का सामना करते हुए सफल रहे हैं और उन इलाकों में भाजपा का जनाधार बढ़ाया है जहां की राजनीति में भाजपा सहयोगियों के सहारे दूसरे या तीसरे नम्बर की पार्टी रही। हरियाणा की राजनीति में जाटों या विश्‍नोइयों का दबदबा रहा है, वहां भाजपा की कभी मजबूत पकड़ नहीं रही बल्कि सत्ता का सुख उसे लोकदल के सहारे मिलता रहा था। शाह ने पार्टी की कमान संभालने के बाद विजयवर्गीय को हरियाणा का प्रभारी बनाया और पहली बार हरियाणा में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। इसका श्रेय मोदी और शाह की जोड़ी के बाद यदि किसी एक व्यक्ति के खाते में जाता है तो वह विजयवर्गीय ही हैं। हाल के लोकसभा चुनाव में तो सभी दस सीटें हरियाणा में भाजपा ने जीतीं, यानी जो बीज भाजपा का विजयवर्गीय की मेहनत से वहां रोपा गया था वह पांच साल में बढ़कर एक बड़़ा वृक्ष बन गया है। पश्‍चिम बंगाल में ममता बनर्जी का अपना दबदबा और कार्य करने की मनमर्जी की शैली रही है। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने तक कोई भी यह कल्पना नहीं करता था कि भाजपा को वहां 18 सीटें मिल जायेंगी और ममता का किला डगमगा जायेगा। बंगाल में शेरनी समझी जाने वाली ममता की राजनीति को गहरा झटका यदि लगा है तो वह भी कैलाश विजयवर्गीय की मेहनत और प्रतिकूल परिस्थिति में डटे रहने की जीवटता ही है। ममता से लड़ने का जज्बा कार्यकर्ताओं में उन्होंने पैदा किया। यह तो सभी सोचते थे कि भाजपा की सीटों की संख्या शायद दहाई में पहुंच जाये लेकिन 18 सीटें जीतने की उम्मीद नहीं थी। लक्ष्य हमेशा ऊंचा रखा जाता है और शाह ने 23 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा था, 18 सीटें जीतकर 40 प्रतिशत वोट लेना पश्‍चिम बंगाल में कोई आसान काम नहीं था। इन सब प्रतिकूल परिस्थितियों में जूझने में महारत एवं चुनौतियां स्वीकार करने का जो माद्दा विजयवर्गीय में है उसी का नतीजा है कि भाजपा की केंद्रीय राजनीति में उनकी उपयोगिता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है और मोदी एवं शाह की नजर में मध्यप्रदेश का ग्राफ बढ़ता जा रहा है।

और यह भी
“सूत न कपास जुलाहों में लठ्ठमलट्ठा“ यह कहावत प्रदेश में भाजपा के कुछ नेताओं के महत्वाकांक्षी प्रशंसकों पर सटीक बैठती है। उनका अभियान अपने नेता का कद बढ़ाने वाला होता है या घटाने वाला, यह सोचे बिना वे अपने नेता को आराध्य बनाने की होड़ में भिड़ जाते हैं। मध्यप्रदेश में फिलहाल मुख्यमंत्री का पद खाली नहीं है और न ही कमलनाथ की कांग्रेस सरकार जल्द गिरने वाली है। भाजपा के नेता भी अब यह कहने लगे हैं कि हम कांग्रेस की सरकार गिराने का प्रयास नहीं करेंगे वह अपने बोझ से गिर जाये तो बात अलग है। केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति राज्यमंत्री प्रहलाद पटेल के कुछ प्रशंसकों ने फेसबुक पर ‘वी सपोर्ट प्रहलाद सिंह पटेल नैक्स्ट सीएम आफ मध्यप्रदेश‘ के नाम से एक पेज बनाया है और कुछ ही समय में इस अभियान के समर्थन में 6 हजार से अधिक लोग जुड़ गए हैं। अब यह तो पटेल को देखना है कि ऐसा अभियान छेड़ने वाले उनके शुभचिंतक हैं या नहीं।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
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