मोदी की सुनामी में अनजान चेहरों ने बनाया जीत का कीर्तिमान

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०- अरुण पटेल

देश के साथ ही मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा के नये चेहरों ने जीत का कीर्तिमान रचने में कोई कसर नहीं छोड़ी बल्कि अनेक लोकसभा क्षेत्रों में तो भाजपा उम्मीदवारों ने अपने ही बनाये पुराने कीर्तिमानों को ध्वस्त कर दिया, इसका एकमात्र कारण यह है कि यह चुनाव मोदी को जिताने या मोदी को हराने वालों के बीच था जिसमें चेहरे बेमानी हो गये। दो तिहाई बहुमत से छत्तीसगढ़ विधानसभा में जीत हासिल करने वाली कांग्रेस केवल वहां दो ही लोकसभा सीटें जीत पाई तो मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में कम मत पाकर भी सरकार बनाने वाली कांग्रेस अपने दो मजबूत किलों में से एक गुना को नहीं बचा पाई। छिंदवाड़ा 1977 में भी कांग्रेस ने जीता था और आज भी उसने वहां कामयाबी हासिल की। हालांकि मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ बड़ी मशक्कत के बाद पसीने से लथपथ होकर यहां से लोकसभा पहुंच पाये तो वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया एक अनजान चेहरे जो कि हाल ही में विधानसभा चुनाव हारा था उससे लगभग सवा लाख से अधिक मतों के अन्तर से चुनाव हार गए। यह वह सीट थी जहां से अभी तक सिंधिया राजपरिवार या उनका कोई नुमाइंदा ही चुनाव जीतता था। यहां तक कि 1977 की जनता लहर में जब माधवराव सिंधिया कांग्रेस समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रुप में चुनाव लड़े तो उन्होंने जनता पार्टी उम्मीदवार को पराजित किया था। अब मुख्यमंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अपनी सरकार को बचायें और कांग्रेसजनों में जो हताशा घर कर रही है उसे दूर करते हुए उनमें नया आत्मविश्?वास पैदा करें।

वैसे राजा और रंक की लड़ाई में महाराजाओं के पराजित होने का यह कोई पहला मामला नहीं है मध्यप्रदेश में ही 1977 में जनता पार्टी उम्मीदवार यमुनाप्रसाद शास्त्री ने रीवा महाराजा मार्तण्डसिंह जूदेव को पराजित किया था। इसी प्रकार ज्योतिरादित्य सिंधिया केपी यादव से पराजित हो गए। कुल मिलाकर कहा जाए कि यह जनादेश दोनों राज्यों में राज्य सरकारों के खिलाफ नहीं है बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रखर राष्ट्रवाद पर मतदाताओं का भरोसा और मजबूर की जगह एक मजबूत प्रधानमंत्री के पक्ष में है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कांग्रेस एवं विपक्षी दलों के नकारात्मक प्रचार का भी विपरीत असर हुआ और इसने मोदी लहर को मोदी की सुनामी में तब्दील कर दिया। ज्योतिरादित्य सिंधिया का हारना एवं के.पी. यादव का जीतना यह बताने के लिए काफी है कि इस चुनाव में मतदाताओं ने केवल मोदी का चेहरा सामने रखकर वोटिंग मशीन का बटन दबाया और यह प्रचार महानगरों से लेकर दूरदराज गांवों तक मतदाता के मन में गहरे तक समा गया कि कमल के बटन को दबाने से सीधा वोट मोदी को जायेगा। यही कारण रहा कि भाजपा के जिन चेहरों से मतदाता नाराज थे वे भी भारी मतों से जीते और कांग्रेस के बड़े-बड़े चेहरे धराशायी हो गए। भोपाल में दिग्विजय सिंह का हारना, सीधी में अजय सिंह का हारना और जबलपुर में विवेक तन्खा का बुरी तरह हारना या इंदौर में शंकर लालवानी का सुमित्रा महाजन का रिकार्ड तोडऩा यही संकेत देता है कि उम्मीदवार को देखकर नहीं मोदी के चेहरे को देखकर लोगों ने कमल का बटन दबाया। इंदौर में कांग्रेस के पंकज संघवी को 5 लाख 47 हजार 754 मतों के भारी अन्तर से हराकर सुमित्रा महाजन के उस कीर्तिमान को भी लालवानी ने ध्वस्त कर दिया जिसमें ताई ने कांग्रेस के सत्यनारायण पटेल को 4 लाख 66 हजार 901 मतों के अन्तर से पराजित किया था। विदिशा में पिछले चुनाव में सुषमा स्वराज ने कांग्रेस के लक्ष्मण सिंह को 4 लाख 10 हजार 698 मतों से पराजित किया था जबकि इस बार भाजपा के रमाकांत भार्गव ने कांग्रेस के शैलेंद्र पटेल को 5 लाख से अधिक मतों के अन्तर से हराकर स्वराज का रिकार्ड तोड़ दिया। यही कारण रहा कि इस लोकसभा चुनाव में जो लोग उम्मीदवार को वोट नहीं देना चाहते थे उनको भी यह लगा कि यदि कमल को वोट नहीं देंगे तो अंतत: हारेंगे तो मोदी ही। इसी सोच के चलते इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन ने मोदी की सुनामी को जन्म दिया।

सुनामी में छह मंत्रियों ने कांग्रेस को दिलाई बढ़त
मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपने मंत्रियों को चुनाव प्रचार के दौरान हिदायत दी थी कि जिसके भी विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस उम्मीदवार को बढ़त नहीं मिलेगी वह अपनी जेब में इस्तीफा लेकर भोपाल आये। चुनावी समर के दौरान देश में चली मोदी की सुनामी में हालात यह हो गए कि सरकार के 6 मंत्री ही इस तूफान में अपने-अपने क्षेत्रों में कांग्रेस को बढ़त दिलाने में सफल हो सके जबकि 22 मंत्री टिक भी नहीं पाये और बढ़त दिलाने की बात तो दूर उन्होंने पिछडऩे का कीर्तिमान बना डाला। यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के गृह निर्वाचन क्षेत्र राधौगढ़ में जयवर्धन सिंह भी अपनी पुश्तैनी सीट पर कांग्रेस को बढ़त नहीं दिला पाये और वहां भी कमल खिल गया और यही असली खतरे की घंटी तेजी से बजी है कि जयवर्धन को अब और अधिक मुस्तैद होना होगा, क्योंकि राघवगढ़ विधानसभा क्षेत्र में कमल शान से खिला है जबकि यह दिग्विजय सिंह का अजेय गढ़ रहा है। राधौगढ़ में कांग्रेस लगभग 45 हजार से अधिक मतों से पिछड़ गई है।छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल वरिष्ठ मंत्री टी एस सिंहदेव और ताम्रध्वज साहू जैसे नेता अपने गढ़ों में भाजपा को बढ़त लेने से नहीं रोक पाये तो वहीं दूसरी ओर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत की पत्नी ज्योत्सना महन्त कोरबा सीट से चुनाव जीत गयीं और इस प्रकार महंत ने अपनी मजबूत पकड़ का परिचय दिया। हालांकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस एक सीट बढ़ाने में सफल रही और बस्तर सीट पर उसके उम्मीदवार दीपक वैज 40 हजार मतों से चुनाव जीत गये। इस प्रकार पिछले लोकसभा चुनाव से छत्तीसगढ़ में एक सीट ज्यादा मिली।

मध्यप्रदेश में सबसे अधिक बढ़त सुरेंद्र सिंह बघेल ने अपने क्षेत्र कुक्षी में 35351 मतों की दिलाई जबकि आरिफ अकील भोपाल उत्तर दूसरे नम्बर पर रहे और उनके क्षेत्र में दिग्विजय सिंह को 24760 मतों की बढ़त मिली। तीसरे नम्बर पर इमरती देवी डबरा रहीं जिन्होंने 18780 और उसके बाद ओंकार सिंह मरकाम डिंडोरी 18245, उमंग सिंघार गंधवानी में 11216 और लाखनसिंह यादव भितरवार में 3214 मतों की बढ़त दिलाने में सफल रहे। जहां तक मंत्रियों के क्षेत्र में कांग्रेस के पिछडऩे का सवाल है तो उसमें वित्त मंत्री तरुण भानोत का जबलपुर पश्?चिम क्षेत्र है जहां कांग्रेस प्रत्याशी 84252 मतों से पिछड़ा तो वहीं कांग्रेस उम्मीदवार सबसे कम मतों से जहां पिछड़ा वह क्षेत्र है गृहमंत्री बाला बच्चन का राजपुर क्षेत्र जहां केवल 3144 मतों से कांग्रेस पिछड़ी। बाला बच्चन प्रदेश कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष होने के साथ ही मुख्यमंत्री कमलनाथ के अत्यन्त करीबी व भरोसे वाले नेता हैं। कांग्रेस उम्मीदवार के सर्वाधिक मतों से पिछडऩे का दूसरे नम्बर का रिकार्ड सबसे बड़बोले मंत्री जीतू पटवारी राऊ का रहा, जहां कांग्रेस 79931 मतों से पिछड़ी तो तीसरे पायदान पर तुलसी सिलावट का क्षेत्र सांवेर रहा जहां कांग्रेस प्रत्याशी 67646 मतों के अन्तर से पिछड़ा। पिछडऩे का रिकार्ड बनाने वालों में कमलनाथ के नजदीकी तरुण भानोत, राहुल गांधी के नजदीकी जीतू पटवारी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के नजदीकी तुलसी सिलावट शामिल हैं। इनके अलावा जिन मंत्रियों के क्षेत्र में कांग्रेस पिछड़ी उसमें अपने बयानों के कारण हमेशा सुर्खियों में रहने वाले सज्जन सिंह वर्मा सहित डॉ. विजयलक्ष्मी साधौ, हुकुमसिंह कराड़ा, डॉ. गोविंदसिंह, पी.सी. शर्मा, बृजेंद्रसिंह राठौर, प्रदीप जायसवाल, गोविंदसिंह राजपूत, प्रियव्रत सिंह, सुखदेव पांसे, हर्ष यादव, कमलेश्?वर पटेल, लखन घनघोरिया, महेंद्र सिंह सिसोदिया, प्रद्युम्नसिंह तोमर, सचिन यादव भी शामिल हैं।

और यह भी
राष्ट्र और राज्य की सरकार चुनते समय मतदाताओं का मानस अलग-अलग होता है और यदि वह एक साथ ही दोनों के लिए वोट डाल रहा हो तो भी वह अलग-अलग वोट डालता है। उड़ीसा में विधानसभा और लोकसभा के एक साथ चुनाव हुए लोकसभा में भाजपा ने सात सीटें जीतीं लेकिन विधानसभा में पांचवीं बार बीजू जनता दल ने सुप्रीमो नवीन पटनायक की अगुवाई में शानदार जीत दर्ज की। छिंदवाड़ा में लोकसभा के साथ ही विधानसभा का उपचुनाव हुआ यहां भी मतदाताओं ने एक साथ वोट डाले। यहां भी कमलनाथ को जितने मत मिले उसकी तुलना में उनके बेटे नकुलनाथ को कमलनाथ से लगभग 7 हजार मत कम ही मिले। तामिलनाडु में लोकसभा चुनाव में डीएमके गठबंधन को एकतरफा जीत मिली जबकि 22 विधानभा क्षेत्रों में उपचुनाव हुए उनमें से 9 क्षेत्रों में एडीएमके उम्मीदवार सफल रहे। इस प्रकार मतदाता ने केंद्र व राज्य के लिए अलग-अलग दलों को वोट दिये। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जो भाजपा को भारी समर्थन मिला वह जनादेश राज्य सरकारों की उपलब्धियों से उपजी नाराजी का परिणाम नहीं है, बल्कि इससे यह पता चलता है कि मतदाता केंद्र में अलग और राज्यों में सरकार चुनते समय अलग मतदान करता है।

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