‘मोदी का गांधी-तत्व’ बनाम ‘गुजरात’ और ‘गुजराती’ की महत्ता

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०-उमेश त्रिवेदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ड्योढ़ी पर केशरिया बाने में भाजपा की पगड़ी धारण करने के लिए तैयार अमर सिंह की पहली प्रस्तुति की थीम यह है कि महात्मा गांधी की ‘बेसिक थ्योरीज’ को मोदी इसलिए बेहतर समझते हैं कि वो जन्मना ‘गुजराती’ है। प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के अवतरण के बाद ‘गुजरात’ और ‘गुजराती’ की महत्ता में ‘आल्हा-ऊदल’ की किवंदतियों जैसा इजाफा हुआ है। ‘आल्हा-ऊदल’ के प्रसंगों में ‘चिटिया के घर में चोरी हो गई, चिटा ने ली ढाय तलवार’ याने चिटी के घर चोरी होने पर चिटा और चोरों के बीच तलवार के जंगी मुकाबले की मनोरंजक कहानियां सुनने को मिलती है। अमर सिंह भी ‘आल्हा’ के अल्हड़ अंदाज में ही मोदी के बचाव में सामने आए हैं। ‘चिंटा-चिटी’ प्रसंग बयां करता है कि अमर सिंह की ‘गुजरात केन्द्रित परिकल्पनाएं’ गांधी के व्यक्तित्व को ‘चतुर-परिकल्पनाएं’ जैसे नए अलंकरणों से विभूषित करने वाली है। बकौल अमर सिंह वो ‘गुजराती’ महात्मा गांधी तो हो गए हैं। अमरसिंह की अजब-गजब परिकल्पना मोदी के लखनऊ भाषण के संदर्भ में सामने आई है। मोदी ने कहा था कि ‘वो देश के उद्योगपतियों और व्यापारियों के साथ फोटो खींचाने और खड़े रहने में डरते नहीं है।’ ‘जब नीयत साफ हो, इरादे नेक हों तो किसी के साथ खड़े होने का दाग नहीं लगते हैं। महात्मा गांधी का जीवन इतना पवित्र था कि बिड़ला परिवार में जाकर रहने में उन्हें कभी भी संकोच नहीं होता था।’ उल्लेखनीय है कि राहुल गांधी ने रफाल-डील में आरोप लगाया है कि मोदी ने अपने मित्र अंबानी से सांठ-गांठ कर अरबों रुपये का घोटाला किया है। गांधी-बिड़ला का उल्लेख विवादों के केन्द्र में आ गया है। अंबानी से अपने संबंंधों को गांधी-बिड़ला के संबंधों से तौलकर खुद को गांधी जितना वजनदार सिद्ध करना मोदी के लिए मुनासिब नहीं है। बिड़ला ने ब्रिटिश सल्तनत के खिलाफ गांधी के सत्याग्रह और आंदोलन में साथ खड़े होने का साहस दिखाया था। अंबानी परिवार के सामने ऐसी कोई परिस्थिति मौजूद नहीं है। एक फकीर स्वतंत्रता सेनानी और गुलामी की चुनौतियों से जूझते एक कारेाबारी के संबंधों की तुलना मोदी-अंबानी की राजनीतिक और व्यवसायिक रिश्तों से करना अन्याय है। मोदी-अंबानी के रिश्तों में ‘एक राजा’ और ‘एक कारोबारी’ की नजदीकी बयां होती है। इस मित्रता की तस्वीर की समीक्षा में कैनवास पर काले धब्बों की भरमार नजर आती है। अंबानी के तलबगार मोदी को अपनी ‘प्रगाढ़ मैत्री’ की तुलना गांधी-बिड़ला के स्वच्छ स्वदेशी रिश्तों से नहीं करना चाहिए। गांधी से रिश्तों की एवज में बिड़ला को एक आदर्श संतोष के अलावा शायद कुछ भी हासिल नहीं हुआ होगा, लेकिन राजा और कारोबारी की वर्तमान रिश्तेदारी सोना उगल रही है। राहुल गांधी का यही आरोप तो महात्मा गांधी को विवाद में खींच लाया है कि रफाल-डील में मोदी ने अंबानी को बगैर किसी तजुर्बे के एक लाख ३० हजार करोड़ का फायदा पहुंचाया है। इस घटनाक्रम में अमर सिंह के शब्दों का प्रवाह लोगों के सामने एक नई दिलचस्प ‘राजनीतिक तकनीक’ पेश कर रहा है। यह ‘तकनीक’ मोदी की शख्सियत में ‘गांधी-तत्व’ घोलती है। मोदी के वक्तव्य के अनुमोदन में अमर सिंह गांधी का जिक्र करते हैं कि ‘वर्धा स्थित गांधी आश्रम में रखी बापू की हस्तलिखित पत्रिका में कहा गया है कि नेहरु के भारत में रजवाड़ो, उद्यमियों और पैसे वालों का स्थान कम होगा, लेकिन वे भी समाज के उपयोगी अंश है। अमर सिंह ने गांधी के अपुष्ट कथन को यों समाप्त किया है कि दशकों पूर्व के ‘एक गुजराती’ महात्मा गांधी की बात को मूलरूप से ‘एक गुजराती’ पीएम ने अब समझा है। गांधी को समझाने-समझने के रोचक प्रसंग का मूल-भाव यह है कि देश में सभी गैर-गुजराती प्रधानमंत्रियों की नासमझी के कारण देश में गांधीवाद विलाप करता रहा है। गुजराती मूल के मोदी अब इसे थामने का काम करने वाले हैं। वैसे भी ‘गांधी’ या ‘गांधी जैसा’ होना मोदी की पुरानी मुराद रही है। अनुयायी उनमें गांधी-भाव देखने भी लगे हैं। कैबिनेट मंत्री महेश शर्मा ने जुलाई २०१७ में ही कहना शुरू कर दिया था कि ‘हम धन्य भाग हैं कि गांधी जैसी प्रेरणा देने वाला प्रधानमंत्री मोदी देश में मौजूद है।’ केन्द्रीय खेलमंत्री विजय गोयल ने मई २०१७ के अंतिम सप्ताह में रायपुर में लोगों को यह कहकर अभिभूत कर दिया था कि ‘मोदी देश के दूसरे महात्मा गांधी हैं।’ हैरत यह है कि गांधी-बिड़ला जैसे प्रसंगों को अद्भुत करके मोदी को खुद गांधी से तौलने लगे हैं। अमर सिंह को भी उनमें गांधी दिखने लगे हैं… आगे-आगे देखिए होता है क्या… ?
०- लेखक सुबह सवेरे के संपादक हैं, (सुबह सवेरे से साभार)
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