‘मी-टू’ ; सत्तर साल से प्रताडि़त ‘जनता’

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०-ओमप्रकाश मेहता
‘मी-टू’ के इस दौर में पिछले सत्तर सालों से हर तरीके से प्रताडि़त देश की अबला जनता अब अत्याचारी (राजनेताओं) से ही पूछ रही है कि वह अपने साथ ज्यादती की रिपोर्ट कहां जाकर दर्ज करायें? या बिना किसी कोर्ट, वकील या जिरह के खुली अदालत (चुनाव) में अत्याचारियों को सजा सुना दें? साथ ही पीडि़त जनता की यह भी सोच है कि किसी एक ही वर्ग या दल के तो शोषक अत्याचारी हैं नहीं, इसलिए उसे धीरज रखकर कई किश्तों (कई चुनावों) में सजा सुनाने का काम करना पड़ेगा। और इसी कारण अब देश की निरीह जनता को न सिर्फ राजनीति बल्कि प्रजातंत्र की व्यवस्था से ही विश्वास खत्म हो गया है, उसे (जनता) को ऐसा लगता है जैसे चुनाव जीतने के बाद देश सेवा की नहीं बल्कि जनता पर अत्याचार करने की ही शपथ ले जाती है, क्योंकि अब सत्तर सालों में देश में ‘प्रजा’ का ‘तंत्र’ नहीं ‘राजनेता तंत्र’ स्थापित हो गया है, जिसने सत्ता का संकल्प ही बदल कर रख दिया है पहले सत्ता प्राप्ति के समय जनसेवा का संकल्प या शपथ ली जाती थी, किंतु अब शपथ के बाद जन शोषण के तरीकाकें पर शोध की जाती है और नए-नए तरीके खोज कर जनता को शोषित किया जाता है, हर पांच साल में एक बार राजनेता जनता के पास वोट प्राप्ति की अपनी गरज से जाता है और उसके बाद पांच साल तक प्रजा या जनता खुद प्रताडि़त होने के लिए राजनेताओं के पास जाती है। अब ‘प्रजातंत्र’ को ‘राजतंत्र’ में बदलने के लिए मूलत: दोषी कौन है? यह तो नहीं कहा जा सकता, संभव है अंग्रेजों से जिस दल ने सत्ता छीनी, वही उसकी मूल दोषी हो? क्योंकि देश पर राज करने का तरीका तो उस दल के नेताओं ने अंग्रेजों से ही सीखा था, और शायद इसी आशंका के चलते देश की आजादी का लक्ष्य पूरा हो जाने के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कांग्रेस को भंग या खत्म करने की राय दी थी, क्या किया जाए बूढ़े और वरिष्ठ राजनेतााअें की सही बात नहीं सुनने और उनकी उपेक्षा करने की परम्परा तो हमारे यहां गांधी से लेकर अडवानी तक चली आ रही है और हर जाने वाली पीढ़ी अपने आने वाली पीढ़ी को वही वसीयत देकर जा रही है, इसलिए आज के राजनेताओं का भी कुछ वर्षों बो वही हश्र होना है, जो गांधी से लेकर आडवानी तक हुआ। हाँ, तो चर्चा की शुरुआत ‘मी-टूष्ठ से हुई थी, इस ‘मी-टूष्ठ ने तो ‘प्याज’ का रुख अख्तियार कर लिया है, प्रतिदिन इसके छिलके निकलते ही जा रहे हैं और ज्यों-ज्यों छिलके निकलते हैं, देश की चिंतित जनता की आंखों में अविरल अश्रुधार बहने लगती है और चाहे इस अश्रुधार के दोषी जिन रूलाने वाले ‘प्याज’ को खुद रोना चाहिये ये बड़ी बेशर्मी से मुस्कुरा रहे हैं। उनमें लोक लाज या शरम जैसी कोई बात है ही नहीं? खैर, अभी तो यह प्याज से छिलकों को निकालने की शुरुआत भर है, अभी तो राजनीति को छोड़ अन्य (पूर्व या वर्तमान दिग्गज पत्रकारों या बॉलीवुड के कलाकारों) के ‘प्याज’ के छिलके निकालना शुरू ही हुए हैं, ‘कद्दू’ के आकार वाले राजनीति के प्याज के छिलके निकलना अभी शेष हैं, धीरज रखिये ये सबसे बड़े आकार के प्याज भी इस दौर में सुरक्षित नहीं रह पाएंगे और जिस दिन इन प्याजों के छिलके निकलना शुरू होंगे पूरे देश की अब तक प्रताडि़त जनता ही शिकायत करने वाली होगी और ख्ुाली कोर्ट (आज चुनाव) के सामने ये मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहेंगे, क्योंकि यह सिलसिला पिछले सत्तर सालों से चल रहा है। मूलत: इस लम्बी जिरह का खास मकसद यही है कि देश में ‘मी-टू’ के माध्यम से जो चरित्र हनन का अभियान शुरू हुआ है, यह किसी ‘खास’ तक सीमित नहीं रहेगा, देश की जनता जो हर तरीके से ‘बलात्कार’ से पीडि़त रही है, वह भी इस ‘मी-टू’ को शिकायत करने वालों में अब शामिल होने जा रही है, क्योंकि अब अगले छ: महीने के लिए ‘खुली कोर्ट’ (चुनाव) शुरू होने वाले हैं, जिसमें पीडि़ता खुद अत्याचारियों को दण्डित करेगी।
०-(नया इंडिया के कालम ”मुद्दा’ से साभार)
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