मायावती को वसूलनी है कीमत

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०-हरिशंकर व्यास
भाजपा को रोकने की विपक्षी राजनीति की असल धुरी मायावती की बहुजन समाज र्पाी है। समाजवादी पार्टी के बारे में सबको पता है कि वह भाजपा के विरोध में ही राजनीति करेगी। पर बहुजन समाज पार्टी चूंकि पहले भाजपा के साथ रह चुकी, सरकार बना चुकी है इसलिए उस पर सबकी नजर है। वह भाजपा के विरोध में बनने वाले मोर्चे में शामिल होती है तो खेल बदल जाएगा और अगर नहीं शामिल होती है तो विपक्ष का अभियान पिट जाएगा। अपनी इस स्थिति को मायावती को समझ रही हैं और इसलिए विपक्षी पार्टियों सेव भी पूरी कीमत वसूलने की राजनीति कर रही हैं। तभी उन्होंने कांग्रेस की बजाय छत्तीसगढ़ में जनता कांग्रेस के साथ तालमेल किया है। जैसे कर्नाटक में जेडीएस के साथ किया था उसी तरह जनता कांग्रेस को चुन लिया। जबकि कांग्रेस के नेता उनके साथ मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में तालमेल की बात कर रहे थे। उनको यह श्यिाकायत रही थी और उसी कम सीटें दे रही थीं ।र सवाल है कि अगर भाजपा को रोकना उनका भी उतना ही बड़ा सरोकार है, जितना कांग्रेस का है तो वे कैसे भाजपा को फायदा पहुंचाने वाला कदम उठा सकती है? उन्होंने मध्यप्रदेश में भी अपने २२ उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है और राजस्थान में भी जल्दी ही उम्मीदवारों के नाम की घोषणा होनी है। उनको पता है कि वे इन तीनों राज्यों में कांग्रेस से अलग अपने उम्मीदवार उतारती है तो उसका फायदा भाजपा को होगा। फिर भी ऐसा करती दिख रही हैं। इसके तीन कारण बताए जा रहे हैं। एक तो केंद्रीय एजेंसियों के जरिए उनकी कोई नस दबी हुई है और साथ ही भारी भरकम रकम थैलियां घूमी हुई हैं। बाकी दो चर्चाएं राजनीतिक हैं। एक तो संभव है कि वे कांग्रेस को दबाव मेमं लाने की राजनीति कर रही हों। उनकी महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री बनने की है और वह तभी संभव है, जब भाजपा और कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा सांसदों वाली पार्टी बसपा बने। इसके लिए वे कांग्रेस से उत्तरप्रदेश के बाहर लगभग सभी राज्यों में कुछ कुछ सीटें मांग रही हैं। उनकी रणनीति यह हो सकती है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को ताकत दिखाए और कांग्रेस की हार का कारण बने तब लोकसभा में कांग्रेस उसकी मांग मानेगी और मनमाफिक सीटें देगी। सो, वे कांग्रेस को हराने की राजनीति कर रही है। पर इसमें भी सवाल है कि अगर इन राज्यों के चुनाव में भाजपा जीत गई तो उसेस अगले चुनाव के लिए ऐसा माहौल बनेगा कि उसे रोकना नामुमकिन हो जाएगा। यह भी संभव है कि मायावती वास्तव में कांग्रेस से घबरा रही हैं। उनको यह अंदेशा है कि दलित वोट पारंपरिक रूप से कांग्रेस का रहा है, जो वापस कांग्रेस में जा सकता है। अगर उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ मिल कर लड़ी और भाजपा विरोध की राजनीति में दलित वोट एक बार कांग्रेस की ओर ट्रांसफर हुआ तो संभव है कि वह हमेशा के लिए कांग्रेस के साथ चला जाए। इस चिंता में वे कांग्रेस को निपटाने में लग गई है तो हैरानी नहीं होगी। मतलब उन्हें यह ख्याल या चिंता नहीं है कि इस समय दलित पूरे देश में भाजपा और केंद्र सरकार से नाराज है। इसलिए भाजपा कोक फायदा पहुंचाने वाली मायावती की कोई भी राजनीति उनके अपने लिए भारी पड़ सकती है। हो सकता है कि उनका कोर वोट अपने आप कांग्रेस की ओर शिफ्ट हो जाए।
०-(नया इंडिया के कालम ”रविवारी गपशप” से साभार)
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