महाभियोग त्रयी : लोकतंत्र में नायडू का विवादास्पद फैसला

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०-विजय तिवारी
राज्यसभा के सभापति और देश के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने विरोधी दलों द्वारा प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग प्रस्तुत को नामंजूर करते हुए कहा कि प्रस्ताव में कोई मेरिट नहीं है। हालांकि इस प्रकार उन्होंने संवैधानिक परंपरा का पालन नहीं किया है। न्यायिक इतिहास में इससे पहले छह बार महाभियोग प्रस्ताव विभिन्न सभापतियों के सामने आया है। पांच बार सभापति ने जांच समितियां गठित की हैं। आखिरी मामले में जज ने पैनल बनने के पहले ही अपने को संशोधित कर लिया था परंतु जिस तत्परता से तीन दिन के अंदर ही इतने बड़े संवैधानिक प्रक्रिया का निपटारा किया गया है उसके बारे में बस यही कहा जा सकता है कि अद्भुत। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ जांच कार्रवाई चल रही है। उन्हें यह अधिकार है कि वे इस जांचकर्ता को पद से हटा दें, परंतु सीनेटरों और जनसमूह के दबाव में अभी तक उन्होंने ऐसा नहीं किया है। हालांकि जांच की कार्रवाई के बारे में पिछले १५० दिनों में शताधिक बार वे ट्वीट कर अपना गुस्सा जता चुके हैं। यहां तक कि वे अपने मंत्रिमण्डल के एटार्नी जनरल जेफ सेशन्स को भी उल्टा-सीधा कह चुके हैं परंतु जेफ ने अभी हाल में बयान देकर जांचकर्ता को बर्खास्त करने की संभावनाओं पर राष्ट्रपति को धमकी दी है कि यदि रॉबर्ट मुल्लर, विशेष जांचकर्ता पद से हटे तो विरोध स्वरूप वे भी पद त्याग देंगे। एक और देश के सर्वोच्च पद पर आसीन के खिलाफ जांच के बारे में न्याय के प्रति यह जज्बा दूसरी ओर सरकार आरोपों की जांच के लिए तैयार नहीं। नायडू ने अपने फैसले से एक नया अध्याय भारत के लोकतंत्र में लिखा है जो बहुत ही विवादास्पद रहेगा। अब दूसरा कदम न्यायालय का ये होगा कि जजों के मामलों में कोई भी खबर नहीं छापी जाये अथवा ्रपसारित की जाये जिससे न्यायमूर्ति के बारे में कोई तथ्य भी लिखना, गौहत्या के समान पाप बन जाए। फिर लिखने वाले के साथ गौ रक्षक जैसा चाहे व्यवहार करे। क्या महाभियोग हथियार है, जिसे विपक्ष इस्तेमाल कर रहा है? अथवा ये एक संवैधानिक प्रावधन है, जिसको प्रस्ताव के रूप में प्रस्तुत किया गया है? क्या विपक्ष प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर अविश्वास जता कर कोई गौ हत्या जैसा अक्षम्य अपराध कर दिया है? क्या महाभियोग सिर्फ न्यायाधीश के विरुद्ध ही लाया जाता है अथवा यह उन सभी पदों पर बैठे लोगों के विरुद्ध लाया जा सकता है जो संविधान में उल्लखित पदों पर आसीन है, क्योंकि यही रास्ता संविधान में दिया गया है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के प्रति अविश्वास व्यक्त करते हुए संविधान के अनुच्छेद ६१-१२४(४)-(५), २१७ एवं २१८ के अन्तर्गत महाभियोग प्रस्ताव राज्यसभा के सभापति को प्रस्तुत कर दिया है। प्रस्ताव में पांच कारख लिखे गए हैं, जिसमें दो कारण तथ्यात्मक हैं और तीन कारण हाल की घटनाओं के संदर्भ में हैं। इस प्रस्ताव की सूचना पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे राजनीतिक हथियार निरूपित किया। उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव को पारित करने के लिए विरोधी दलों के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं है। यहां पर एक तथ्य देखना होगा कि संसद में प्रधानमंत्री के विरुद्ध जब अविश्वास प्रस्ताव पेश किया जाता है, तब भी उसके पारित होने की उम्मीद नहीं हुआ करती, परंतु उस प्रस्ताव में विपक्ष अपने बिन्दुओं पर चर्चा करता है। परिणाम तो पांच मिनट में आ जाता है। इस संदर्भ में वित्त मंत्री का बयान अप्रजातांत्रिक ही कहा जाएगा कि वे इस प्रस्ताव को पेश करने पर ही आपत्ति उठा रहे हैं। कुछ कुछ ऐसा ही लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के ाबरे में हुआ, जिसे विपक्ष की लाख कोशिशों के बाद सदन मतें प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं मिली। वह तब जब सत्ताधारी गुट के पास सदन में पर्याप्त संख्या बल है। इस बयान को इस संदर्भ में भी लिया जा सकता है कि संसदीय और असंवैधानिक प्रक्रिया जो सरकार को अखरने वाली हो उसे सामने ही आने नहीं दिया जाए। आखिर ऐसा क्या भय है? अखबारों और चैनलों में भी इसी प्रकार की बहसों में एक आरोप आम तौर पर लगाया जा रहा है कि जज लोगया की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत की स्वतंत्र जांच की मांग को प्रधान न्यायाधीश की पीठ द्वारा नामंजूर किए जाने के बाद कांग्रेस ने यह हथियार चलाया है। सवाल यह उठता है कि अगर प्रधान न्यायाधीश के प्रति अविश्वास है तो उसका क्या निराकरण हो? सत्ताधारी नेताओं का बयान है कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी को इस फैसले के बाद माफी मांगनी चाहिए क्योंकि वे ही इस याचिका के पीछे हैं। बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन की ओर से दाखिल इस याचिका को कांग्रेसी बताकर वो उन सभी वकीलों को भी कांग्रेसी कह रहे हैं। जबकि तथ्य ऐसे नहीं हैं। बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन के अनेक सदस्य भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना से सहानुभूति रखते हैं। सत्ताधारी दल के नेताओं के अनुसार उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू जो राज्यसभा के सभापति भी हैं वे इस प्रस्ताव को खारिज कर देंगे क्योंकि प्रस्ताव में दिये गए तथ्य आधारहीन हैं। अब सवाल ये खड़ा होता है कि क्या ये निष्कर्ष बिना जांच के ही निश्चित हो गया है? क्योंकि अभी तो प्रस्ताव सौंपा गया है। प्रस्तुत: इन्हीं तथ्यों की छानबीन के बाद ही तो जजेस एक्ट के तहत जांच समिति का गठन किया जाएगा। तब तक इंतजार क्यों नहीं? जो नेता ऐसे बयान दे रहे हैं उनमें से अनेक ऐसे हैं जो कठुआ कांड के तथाकथित मीडिया ट्रायल से बहुत नाराज भी हैं फिर भी वे खुद क्यों बयान देकर मीडिया में ट्रायल की एकतरफा कार्रवाई कर रहे हैं? क्या ये वही सिद्धांत नहीं है कि जब हमारे कुछ माफिक हो तो वह खबर सही है। जब कोई आलोचनात्मक खबर हो तो उसे तिल का ताड़ बनाए जाने का आरोप लगता है। अभी एक केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि बलात्कारी को रोका नहीं जा सकता एक घटना को लेकर इतना बवाल क्यों? बाद में उन्होंने अपने बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किए जाने का ठीकरा भी मीडिया के सर फोड़ा। …. निरन्तर जारी
०- लेखक मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं (साभार नया इंडिया)
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