महानगरों में मुश्किल में भाजपा

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०- देवदत्त दुबे
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। अंतत: गिरते पड़ते भाजपा ने सभी २९ सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर ही दिए। रविवार शाम को पार्टी ने इन्दौर लोकसभा सीट से शंकर लालवानी को प्रत्याशी घोषित कर दिया। यहां कांग्रेस की ओर से पंकज संघवी प्रत्याशी हैं। दरअसल प्रदेश के महानगर भोपाल, इन्दौर, ग्वालियर और जबलपुर ना केवल भाजपा के मजबूत गढ़ वरन महानगरों के प्रभाव में आने वाले आसपास के जिलों में भी भाजपा मजबूत स्थिति में थी। लेकिन इस समय इन महानगरों में भाजपा और कांग्रेस प्रत्याशियों में ऐसी तुलना की जाए तो कांग्रेस के प्रत्याशी भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं। महानगरों में मुश्किल में दिखाई देती भाजपा के लिए अब एकमात्र मोदी का सहारा है जिससे वो अपने गढ़ों को ढहने से बचा सकें। भोपाल में दिग्विजय सिंह और इन्दौर में पंकज संघवी के रूप में कांग्रेस ने अधिकतम अच्छे प्रत्याशी मैदान में उतारे, जबकि भाजपा ने भोपाल में प्रज्ञा ठाकुर, ग्वालियर से विवेक शेजवलकार, जबलपुर में राकेश सिंह और इन्दौर में शंकर लालवानी को प्रत्याशी बनाया है। जबलपुर में प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह को बेहतर प्रत्याशी मान भी लिया जाए तो बाकी तीन सीटों पर भाजपा और भी बेहतर प्रत्याशी मैदान में उतार सकती थी, लेकिन उम्र और परिवारवाद के कारण पार्टी ने बेहतर प्रत्याशी नहीं उतारे। बहरहाल इन्दौर में भाजपा प्रत्याशी की घोषणा के बाद अब प्रदेश की सभी २९ सीटों पर दोनों ही प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशी घोषित हो चुके हैं। चुनाव अभियान भी गति पकड़ चुका है लेकिन अधिकांश सीटों पर विरोध का सिलसिला अब भी थमा नहीं है। २९ अप्रैल को होने वाले प्रदेश में पहले चरण के मतदान के लिए अब केवल पांच दिन शेष बचे हैं अब तक राष्ट्रीय नेताओं के दौरे प्रदेश में शुरू नहीं हो पाए हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आज तीन स्थानों पर सभाओं को संबोधित किया जबकि भाजपा के अधिकांश नेता डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं। पार्टी ने प्रत्याशी चयन में जो गलतियां की हैं उसे सुधारने में अब दिग्गज नेताओं को पसीना बहाना पड़ रहा है। इन्दौर महानगर में जहां से सुमित्रा महाजन लगातार आठ लोकसभा के लिए चुनी गई उनका टिकट काटकर पार्टी ने मानो अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली हो। प्रत्याशी चयन में पार्टी को एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा और लगभग एक पखवाड़े की कसरत के बाद अंतत: शंकर लालवानी को प्रत्याशी बनाना पड़ा जो कांग्रेस के पंकज संघवी के मुकाबले दामदारी से चुनाव लड़ पाएंगे इस पर संशय है। वैसे तो प्रत्याशी चयन के कारण प्रदेश की अधिकांश आसान सीटें भाजपा ने मुश्किलों भरी बना दी हैं लेकिन जिस तरह से महानगरों में वह अब जीत के लिए जद्दोजहद कर रही है उससे पूरे प्रदेश में उसका वातावरण बिगड़ रहा है। भाजपा प्रत्याशियों को अब जीत के लिए मोदी के नाम का ही सहारा है। पार्टी का संगठन भी इस समय लचर है और मैनेजमेंट में कसावट भी नहीं दिखाई नहीं दे रही है। पार्टी के बड़े नेता अपनी अपनी सीटों को बचाने में लगे हैं। कुल मिलाकर प्रदेश में पार्टी इस समय कड़े मुकाबले में है। महानगरों में जो भाजपा के लिए सुरक्षित गढ़ माने जाते थे वहां पार्टी की मुश्किलें बढ़ी हुई हैं।
०-नया इंडिया के कालम ”राजनैतिक गलियारा” से साभार)
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