मध्यप्रदेश में फैल रहा रायता…

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०-राघवेन्द्र सिंह
चुनाव के वक्त सभी पार्टियां अपनी नीति, रणनीति और कार्यकर्ताओं में लगी धूल को साफ कर मैदान में उतरेती हैं। अभी तक बिल्कुल साफ रहता था कि कांग्रेस की तुलना में भाजपा भ्रम की स्थिति में कम रही है। उसके नेता तय होते हैं और चुनावी हमलों में अस्त्र-शस्त्र भी निश्चित होते हैं। अब जमाना मिसाइलों का है, बशर्ते वे गाइडेड हों। अभी की स्थिति में कांग्रेस को लोग बिखरा हुआ कहते हैं, लेकिन संगठित दिखने वाली भाजपा में भी इन दिनों रायता कम नहीं फैला है। इसमें पार्टी हाईकमान से लेकर संघ परिवार के वे लोग भी गुनाह में शामिल हैं, जिनकी जिम्मेदारी भाजपा नेताओं को बिगडऩे से बचाने की थी। भाजपा में मध्यप्रदेश इकाई के साथ मिहैंडलिंग धोखे से ही सही राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के हाथों ही हो गई। थोड़ा सा फ्लैशबैक में जाएंगे तो पता चलेगा कि शाह साहब ने सार्वजनिक एलान किया था कि इस बार चुनाव में कोई चेहरा सामने नहीं होगा बल्कि संगठन चुनव लड़ेगा। लेकिन कुछ दिनों बाद ही उन्हें अहसास हो गया कि वो गलती पर हैं। लिहाजा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की जनआशीर्वाद यात्रा शुरू हुई और इसमें वो पार्टी का चेहरा बने और संगठन उनके पीछे रहा। इसके बाद शाह ने कहा कि अब वह भोपाल में केम्प करेंगे। लेकिन अभी तक शाह कहां कैम्प कर रहे हैं, पता नहीं चल पाया। इसके बाद अमितजी का माइक्रोमैनेजमेंट वाला फंडा भी यहां ज्यादा चलता नहीं दिखा। दरअसल, दिल्ली में जो लीडर भाजपा को चला रहे हैं, वो मध्यप्रदेश भाजपा को समझ नहीं पा रहे हैं। यहां के कार्यकर्ताओं को वह देवदुर्लभ तो कहते हैं लेकिन उनके साथ लगातार न तो सम्पर्क रखते हैं और न ही उनकी परेशानियों को सरकार से दूर करवाते हैं और न ही सत्ता में असली भाजपाई की भागीदारी करवा पाते हैं। पिछले १५ सालों में देवदुर्लभ कार्यकर्ताओं की जितनी उपेक्षा हुई और इसकी जानकारी के बाद भी जब कोई उपाय नहीं हुए तो फिर भाजपा को कांग्रेस की जरूरत नहीं हे। प्रत्याशी चयन के कुछ दिन पहले अमित शाह का संघ के प्रदेश मुख्यालय समिधा में जाकर मदद की दरकार करना साबित करता है कि सक्षम, संजीदा और देवदुर्लभ कार्यकर्ता वाली मध्यप्रदेश भाजपा अब चुनाव जीतने में सक्षम नहीं है। ये हालात एक दिन में नहीं बने। भाजपा हाईकमान और संघ को समय-समय पर सरकार और संगठन को लेकर जो फीडबैक मिला उस पर कार्रवाई नहीं करना, भाजपा की दुर्गति के लिए जिम्मेदार है। प्रदेश भाजपा के लिए फुल टाइमर इंचार्ज नहीं होना भी एक बड़ी गलती साबित हुआ। चुनाव के एनपहले अध्यक्ष के रूप में शाह ने योग्यता की बजाय एक संभावनाशील लेकिन अध्यक्ष के रूप में कम अनुभवी सांसद राकेश सिंह को कमान सौंपी। इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। भले ही इसे जिम्मेदार लोग स्वीकार न करें। यह राकेश सिंह के भविष्य के लिए भी ठीक नहीं है। अमित शाह ने संघ की शरण में जाकर संकेत दिया कि अध्यक्ष, संगठन महामंत्री और पार्टटाइमर प्रभारी सभी चुनाव के मामले में असफल हुए। कमजोर नेताओं की फौज ने अपनी खवशिों को पूरी करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को घेरने की कोशिश की। बेशक चौहान में गलतियां हैं लेकिन उनके विकल्प बनने वाले उनसे भी ज्यादा कमजोर हैं। चौहान के विरोधी भी एक बात स्वीकार करते हैं कि जनता से संवाद, संपर्क, सरलता और सहजता के साथ दिन-रात दौरे करने के मामले में उनका कोई तोड़ नहीं है। उनके परिश्रम की चर्चा तो कांग्रेस तक में होती है। भाजपा में मुख्यमंत्री बनने की ख्वाहिश रखने वाले उनसे बड़ी लाइन खींचने की बजाय साजिश कर विकल्प बनने के चक्कर में लग गए। नतीजा फिर सामने है जनता में अभी भी शिवराज के अलावा कोई दूसरा दमदार चेहरा पार्टी पेश नहीं कर पाई। उनके साथ कदमताल करने वालों में केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर और हाईकमान की तरफ से कैलाश विजयवर्गीय का नमा सामने आता है। लेकिन बिखरी पार्टी के हाल यह हैं कि लाखों की लागत से बने प्रदेश कार्यालय के बजाय चुनाव में भाजपा का मीडिया सेंटर एक होटल में शिफ्ट करना पड़ रहा है। कुल मिलाकर भाजपा में चुनाव के समय तो रायता तो पहले भी फैलता था लेकिन तब समेटने वाले वजनदार विशेषज्ञ भी होते थे। अब टिकटों का चयन एनवक्त पर संघ के प्रवक्ताओं से कराया जाएगा तो जीत कितनी मिलेगी, उसे रामभरोसे ही कह सकते हैं। भाजपाई कांग्रेस को जब कमहोर मानते हैं तब इतनी घबराहट अगर कांग्रेस संगठित और आक्रामक होगी तब क्या होगा। इसलिए मुंबई की तर्ज पर कह सकते हैं कि यह मध्यप्रदेश है मेरी जान…
०-नया इंडिया के कालम ”बाखबर रोजाना” से साभार)
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