भ्रष्टाचार में कांग्रेस से भी आगे निकल गई भाजपा

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०-कमल मोरारका
चार सालों में भाजपा ने दिखा दिया कि वे तो कांग्रेस से भी बदतर है। कांग्रेस को भ्रष्ट और दुराचारी होने के कई साल लगे, लेकिन भाजपा ने चार साल में कांग्रेस से आगे निकल गई। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने जितना पैसा पिछले चार सालों में जुटाए हैं, मैं नहीं समझता उतना पैसा कांग्रेस ने २५ सालों में भी जमा किया होगा। कर्नाटक चुनाव में भाजपा ने कितना पैसा खर्च किया, यह मैं नहीं कहता, लेकिन जब बहुमत नहीं आया, तो भाजपा ने खरीदना शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन अमित शाह ने कहा कि विधायकों को खुला छोडि़ए हम सरकार बना लेंगे। एक चुनाव जीतते ही भाजपा सोचती है कि पता नहीं उसके हाथ क्या लग गया है। अगर इसका तीस ३० अहंकार भी कांग्रेस में होता, तो वह देश कब का बर्बाद हो चुका होता। जवाहरलाल नेहरु की जो लोकप्रियता थी और जिस तरह १९५२ के बाद कांगे्रेस लगातार जीतती रही, इस दौर में अगर कांग्रेस भाजपा जैसा नजरिया रखती, फिर तो यह देश बहुत पहले पाकिस्तान बन चुका होता। यह देश किसी के डंडे से नहीं चल सकता7 भले ही वो डंडा वामपंथियों का हो या आरएसएस का हो या किसी और का। आज आरएसएस को सोचने की जरूरत है। भाजपा का क्या है। भाजपा तो एक राजनीतिक पार्टी है। कुछ लोग मंत्री बनेंगे, पैसे कमाएंगे और चले जाएंगे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तो पिछले ९३ साल से काम कर रहा है। तथ्य यह है कि चार सालों में भाजपा ने दिखा दिया कि वे तो कांग्रेस से भी बदतर हैं। कांग्रेस को भ्रष्ट और दुराचारी होने में कई साल लगे, लेकिन भाजपा ने चार साल में कांग्रेस से आगे निकल गई। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने जितना पैसा पिछले चार साल में जुटाए हैं, मैं नहीं समझता कि उतना पैसा कांग्रेस ने २५ सालों में जमा किया होगा। कर्नाटक चुनाव में भाजपा ने जितना पैसा खर्च किया, यह मैं नहीं कहता, लेकिन जब बहुमत नहीं आया तो भाजपा ने कहा कि हम खरीद लेंगे विधायकों को। खरीदना शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन अमित शाह ने कहा कि विधायकों को खुला छोडि़ए, हम सरकार बना लेंगे। जिन चीजों के लिए भाजपा या संघ कांग्रेस की आलोचना करते हैं वो काम तो इन्हें नहीं करना चाहिए। उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी सीटें भाजपा हार गई। पहले गोरखपुर और अब कैराना। इस हार पर कभी पार्टी ने गौर किया? मतदाताओं की आकांक्षाओं और उम्मीदों के खिलाफ भाजपा ने उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना दिया। भाजपा को पिछड़े वर्ग के लोगों ने वोट दिया था, इस उम्मीद से कि केशव प्रसाद मौर्य आदि में से कोई मुख्यमंत्री बनेगा। लेकिन योगी मुख्यमंत्री बन गए, जो ऊँची जाति से संंबंध रखते हैं। उनका नाम अजय सिंह बिष्ट है। वे ठाकुर हैं। लिहाजा, आज यहां पिछड़े वर्ग के लोग यह महसूस करते हैं कि भाजपा ठाकुरों और ब्राह्मणों की पार्टी रह गई है। भाजपा के संगठन मंत्री सुनील बसंत हैं। लखनऊ में वे आरएसएस के नुमांदे हैं। यहां सबाको पता है कि यदि आपको कोई सरकारी काम कराना है तो पहले सुनील बंसल के यहां जाइए, जां फीस है वो दीजिए, अगले दिन आपका काम होना शुरू हो जाएगा। यह गवर्नेंस का नया नक्शा है कि सरकार कहीं है, नियंत्रण कहीं और है। अब यहां चुनाव में हार के बाद बहस चल रही है कि गलती किसकी है। बंसल की है या योगी की। फिलहाल यहां एक दूसरे पर दोषारोपण का दौर चल रहा है। दरअसल, अब हम छोटे स्तर की राजनीति पर आ गए हैं। देश की बात तो भूल जाइए। मोदी सरकार ने पिछले चार साल में जो किया है, उसे देखते हुए तो अब कांग्रेस अच्छी लगने लगी है। हर मामले में इस सरकार ने कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया है। मिसाल के तौर पर कश्मीर। कश्मीर में कांग्रेस ने कभी भी नीति नहीं अपनाई। कभी समस्या का राजनीतिक हल नहीं तलाशा। स्वायत्ता को कमजोर कर दिया। लेकिन भाजपा तो कांग्रेस से भी आगे निकल गई। पीडीपी के खिलाफ बोलने वाली भाजपा ने मिलकर सरकार बना लिया। कश्मीर में जेब गरम करने के अलावा कुछ भी नहीं रहा है। मैं अभी नौ दिन तक कश्मीर रह कर आया हूं। यहां हर कोई कह रहा है कि अगले चुनाव में उमर अब्दुल्ला फिर से मुख्यमंत्री बन जायेंगे। भाजपा की कोई साख नहीं है यहां। यहां तक कि जम्मू में भी भाजपा को नुकसान होने वाला है। यहां सभी निराश हैं, चाहे हिंदू हो या मुसलमान। भ्रष्टाचार में तो कांग्रेस से आगे ही है भाजपा। इंदिरा गांधी चार-पांच औद्योगिक घरानों की तरफदारी करती थीं, मोदी सरकार भी चार पांच घरानों की तरफदारी कर रही है। अभी इसॉलवेंसी कानून के बाद जो सिलसिला शुरू हुआ उसमें भी भ्रष्टाचार देखने को मिल रहा है। अभी बिनानी सीमेंट की नीलामी हो ही रही थी। इस कंपनी को बिड़ला और डालमिया खरीदना चाहते हैं। डालमिया भाजपा के करीबी हैं, इसलिए बिड़ला की ऊँची बोली के बावजूद कोशिश हो रही है कि डालमियां को बिनानी मिल जाए। दरअसल, ऐसे लोगों के हाथों में सरकार चली गई है, जिन्हें सरकार चलाना तो आता ही नहीं, सरकार की गंभीरता भी नहीं समझ पा रहे हैं। नरेन्द्र मोदी जीत कर आये हैं, इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती है। लेकिन यह जीत कर बड़ा ओहदा संभालना है, जो विनम्र हो जाता है और अहम मुद्दों पर अनुभवी लोगों की सलाह लेता है। लेकिन प्रधानमंत्री ने खुद की पार्टी के सीनियर लोगों, जैसे आडवाणी जी हैं, मुरली मनोहर जोशी से कभी सलाह नहीं ली। संचार के तंत्र पर सरकार का पूरा नियंत्रण है। प्राइवेट टीवी और अखबार मालिकों को या तो डरा दिया है या पैसा दे दिया है… इसलिए सब सरकार की भाषा बोल रहे हैं। लेकिन जनता पर इसका कोई असर नहीं है। यदि ऐसा करने में सत्ता पर बने रहना आसान होता तो इंदिरा गांधी कभी हारती ही नहीं। उस समय टीवी नहीं थे, अखबारों पर सेंसर था, लेकिन जनता ने उन्हें हराया। मोदी को एक बार विनम्र होना चाहिए और लोकतंत्र को बचाना चाहिए। यदि इंदिरा गांधी की तरह एक बार हारना पड़े, तो हारना भी चाहिए। इनके पास पार्टी है, संगठन है, नेता हैं, फिर से सत्ता में आ जाएंगे। लेकिन मोदी और अमित शाह की जो शारीरकि भाषा है… वो बाहर जाने का रास्ता बनाती है। सत्ता बचाने का रास्ता नहीं बनाती है। भाजपा के अन्दर ऐसा माहौल बन गया है कि इनके सांसद ही इनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि भाजपा जीते लेकिन कम सीटों से, ताकि मोदी और अमित शाह का एकाधिकार खत्म हो। यह स्थिति कैसे आ गई। सरकार के मंत्री जो भाषण दे रहे हैं, उसे सुनकर लोग हंस रहे हैं।
०-साभार-चौथी दुनिया.काम)
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