भावांतर से ज्यादा लाभ में आड़तिया और व्यापारी रहे

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०-दिनेश गुप्ता
उम्मीदवार चुनाव प्रचार में व्यस्त थे और किसान खेत में फसल की तैयारी में लगा हुआ था। प्रदेश के हर हिस्से में नहरें चालू थीं। कहीं भी ऐसी स्थिति दिखाई नहीं दी कि किसान पानी न मिलने के कारण नाराज हैं। खेतों की हरियाली बता रही थी कि किसान को आवश्यकता के अनुसार पानी मिल रहा है। बिजली की शिकायत भी कहीं-कहीं सुनने को ही मिली। इसकी प्लानिंग सरकार में बैठी पार्टी ही कर सकती है। चुनाव के मुद्दों की हवा निकालने का बड़ा स्कोप भी सत्ताधारी दल के पास ज्यादा होता है। किसानों की कर्ज माफी के मुकाबले में भावांतर योजना चुनाव में कितनी असरकार रही वह आकलन करना थोड़ा मुश्किल काम है। भावंातर योजना को लागू हुए एक साल से भी अधिक का समय बीत चुका है। भावांतर योजना के लागू होने के बाद किसानों के सामने अधिकतम समर्थन मूल्य मिलने को लेकर कोई भ्रम की स्थिति दिखाई नहीं दी। जैसे हर सरकारी योजना के क्रियान्वयन में विकृतियां देखने को मिलती हैं, उससे भावांतर अलग नहीं है। जिस स्वरूप में सरकार ने भवांतर योजना को लागू किया है, नीचे वह विस्तारित रूप में दिखाई देती है। योजना का लाभ ऐसे किसानों के नाम भी दर्ज हुआ है, जिन्होंने अपनी जमीन पर योजना में शामिल फसल को लिया नहीं। राजस्व अधिारियों, मंडी कर्मचारियों, आड़तिया और कथित किसानों का एक ऐसा गठबंधन योजना में विकसित हुआ है, जो कागजों पर ही उपजा दिखाता है और कागजों पर ही बिक जाता है। मंडी में पर्ची बनने में भी कोई दिक्कत नहीं होती। इस विकसित व्यवस्था में हर कोई खुश है। आड़तिया को अपना हिस्सा मिल जाता है और कथित किसान को भावांतर योजना के तहत अंतर की राशि का हिस्सा मिल जाता है। संगठित रूप से यह व्यवस्था चल रही है। इस मामले का एक सिरा शिवपुरी में दिखाई देता है तो दूसरा मंदसौर की मंडी से जुड़ जाता है। शिवपुरी के घोटाले की जांच के बाद एफआईआर भी हुई लेकिन गिरफ्तारी किसी की नहीं हुई। भाजपा नेताओं के नाम भी एफआईआर में हैं, इस कारण गिरफ्तारी नहीं हुई। चना, खरीदना सभी कुछ कागज पर हुआ था। शिवपुरी के इस घोटाले में सूत्र मंदसौर से जुड़ा होना अचानक ही सामने आया। मंदसौर की मंडी में भावांतर को समझाने वाले आड़तिया ने बताया कि किसान को यह स्वतंत्रता मिली हुई है कि वह अपनी उपज राज्य की किसी भी मंडी में बेच सकता है। शिवपुरी का नाम उन्होंने अनजाने में लिया था। शिवपुरी की मंडी में प्याज का घोटाला हुआ है इसकी जानकारी पहले से होने के कारण घोटाले कैसे हुआ होगा, यह समझ आ गया था। शिवपुरी की मंडी में दो पहिया वाहनों के नंबरों को ट्रक का नंबर बताकर प्याज आने और जाने का रिकार्ड है। टनों प्याज चार पहिया वाहनों से आना दर्ज किया गया। जांच में नंबर मोटर साईकल कि निकले। शिवपुरी मंडी में उन किसानों के भुगतान भी नहीं हुए हैं, जिन्होंने वास्तविक खरीदी-बिक्री की थी। स्थिति गेहूं के साथ घुन पिसने जैसी है। घोटाले में हिस्सेदारी सभी संबंधित विभागों की होती है, इस कारण कोई गौर भी नहीं करता है। मुख्य सचिव को हुई झूठी शिकायत में मामला खुला। यह मामला भावांतर का इफेक्ट समझने के लिए हांडी का एक चावल है। पसीना बहाकर उपज का भुगतान लेने के लिए भटकते किसान के लिए भावांतर तकलीफदेह है। उपज को कमजोर बताकर व्यापारी जानबूझकर दामों को गिरा देते हैं। किसान को कहा जाता है कि तुम्हें तो एकएसपी का लाभ मिल ही जाएगा? सबसे ज्यादा मजे में आड़तियां और व्यापारी है। राजनीतिक नक्शे में, मध्यप्रदेश को अलग-अलग हिस्सों में बांट कर देखा, जाता है। विंध्य, बुंदेलखण्ड, मालवा-निमाड़, ग्वालियर-चंबल और महाकौशल भोपाल-होशंगाबाद संभाग। हर संभाग में सामान्य तौर पर लोगों को यह कहते सुना गया कि कांग्रेस बढ़त बना रही है। कांग्रेस के कार्यकर्ता नेताओं के आपसी झगड़े की चिंता किए बगैर चुनाव प्रचार में जुटे हुए दिखाई दिए। पिछले चुनावों में भितरघात की जो शिकायतें कांग्रेस में सुनने को मिलती थीं, उस तरह का माहौल इस बार जमीन पर दिखाई नहीं दिया। जो नाराज थे वे चुनाव में बागी होकर डंटे हुए थे। रायसेन जिले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेश पचौरी भोजपुर की विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। उनके खिलाफ पर्यटन मंत्री सुरेन्द्र पटवा हैं। पटवा से क्षेत्र की जनता बेहद नाराज दिखाई दी। इसके साथ ही लोग यह भी कह रहे थे कि पचौरी भाई की कुंडली में चुनाव जीतने का योग नहीं है। चुनाव के अंतिम दौर में कई विधानसभा सीटों पर तस्वीर में बदलाव भी देखने को मिला। विदिशा-रायसेन जिले में रघुवंशी समाज का वोट इकतरफा कांग्रेस के पक्ष में दिखाई नहीं दिया। रायसेन जिले के सांची विधानसभा क्षेत्र में चुनाव के दौरान भी सड़क निर्माण का कार्य तेजी से चल रहा था। सांची-विदिशा की यह रोड सालों से उखड़ी पड़ी थी। जबकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने फार्म हाउस जाने के लिए इसी सड़क मार्ग का उपयोग करते हैं। मध्यप्रदेश के इस विधानसभा चुनाव को जीतने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने काफी मजबूत प्लानिंग की थी। सड़कें आचार संहिता के दौरान भी बनाई जा सकें, इसके लिए निविदाएं सितम्बर माह में जारी की गई थी। कई वर्क आर्डर तो आचार संहिता लगने के बाद जारी किए गए। चुनाव आयोग कुछ कर इसलिए नहीं सका क्योंकि निविदाएं पहले की थीं।
०-सुबह सवेरे से साभार)
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