भाजपा को दुश्मनों की जरूरत है क्या?

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०-राघवेन्द्र सिंह
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव हारने के बाद भाजपा नेतृत्व सदमे से उबर नहीं पाया है। बदहवासी का आलम यह है कि आलाकमान जितनी दवा कर रहा है मर्ज उतना ही बढ़ता जा रहा है। भाजपा की ताकत रहे मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के साथ तेलंगाना व मिजोरम में भी हालत खराब हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने एक समय मध्यप्रदेश में कहा था अबकी बार २०० पार। यह नारा तब भी भाजपा नेता और कार्यकर्ताओं समेत किसी के गले नहीं उतरा था। इसे जनता ने भी गप्प माना था। जब पाँचों राज्यों के नजीते जाए तो कुल मिलाकर भाजपा की सीटें २०० पार भी नहीं पहुंच पाई थीं। हवाबाजी की यह आदत को पहला उदाहरण नहीं है। गुजरात में भाजपा के छोटा भाई (अमित शाह, मोटा भाई याने नरेन्द्र मोदी) ने कहा था, अगर १५० से एक सीट भी कम आई तो हम जीत का उत्सव नहीं मनाएंगे। दावा १५० का था और गुजरात में सीटें आई ९९… इसके बाद मध्यप्रदेश में २०० सीटों का दावा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की सच्चाई से जुड़ी जानकारी के खिलाफ था। खैर यह राष्ट्रीय अध्यक्ष केनारों और दावों की जमीनी हकीकत को निर्वस्त्र करेन के कुछ उदाहरण हैं। खास बात यह है कि तीन राज्यों में सत्ता से बेदखल होने के बाद भी इस तरह की गप्पों में कोई कमी नहीं आई है। भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में छोटा भाई का यह कहना कि उत्तरप्रदेश की ८० में से ७४ लोकसभा सीटें जीतेंगे। अब इस पर कोई लिहाज में भले न हंसे, लेकिन भरोसा तो अधिवेशन में बैठै लोग भी नहीं कर पा रहे होंगे। शायद हंसते होंगे अपने अध्यक्ष के इन दावों पर। क्योंकि गुजरात और मध्यप्रदेश में वह हकीकत से कोसों दूर थे। ये तो थी दावों के संसार की कुछ बानगी। अब हम आते हैं मप्र समेत राजस्थान औरे छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्रियों को रातों-रात की राजनीति से रुख्सत कर राष्ट्रीय राजनीति में उपाध्यक्ष बनाने के मुद्दे पर। हालांकि इस पर काफी कुछ कहा और सुना जा चुका है। मप्र को ही लें तो पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी मंशा राज्य में रहने की जता चुके थे। उन्होंने कहा था, वह प्रदेश छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। इसके चलते वह लोकसभा चुनाव के लिहाज से आभार यात्रा के रूप में सक्रिय भी हो रहे थे। उन्होंने जनता और कार्यकर्ताओं से कहा था कि वह संख्या में कम जरूर हैं, मगर कमजोर नहीं हैं। एक बात याद रखनी होगी कि कांग्रेस अगर भाजपा में किसी से डरती है तो वह नेता है शिवराज। और इसके साथ दूसरा सच यह भी है कि अगर भाजपा कांग्रेस में अगर किसी से डरती है तो वह हैं दिग्विजय सिंह। दोनों पार्टियों के अंदरखानों में यह सत्य पूरी तरह स्थापित है। चुनाव के पहले कांग्रेस चाहती थी कि किसी तरह शिवराज की छवि भंग की जाए। पार्टी नेतृत्व ने उन्हें एक झटके में जिस तरह सूबे की सियासत से दूर करने की कोशिश की है वह कांग्रेस की मंशा के अनुरूप है। अब तीन महीने बाद लोकसभा चुनाव हैं और प्रदेश में शिवराज के बाद कौन कांग्रेस से मुकाबला करेगा, यह अभी तक तय नहीं है। एक और बात भाजपा संगठन भोपाल से लेकर दिल्ली तक आज से दस साल पहले जितना मजबूत नहीं है। वरिष्ठ नेताओं को मार्गदर्शक बनाकर हाशिए पर डाल दिया गया है। अब यही स्थिति शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे और रमन सिंह को उपाध्यक्ष बनाकर पैदा कर दी गई। शिवराज सिंह का विकल्प समय पर तैयार नहीं किया गया है और अब उन्हें हटाकर नए की तलाश की जा रही है। सवाल यही है कि इन नेताओं को रिप्लेस प्रभावी नेता ने नहीं किया तो हिंदीभाषी राज्यों में लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टीे की भैंस पानी में जाना तय है। आने वाले दिनों में भाजपा के भीतर चुनाव के पहले भारी उठापटक देखने को मिल सकती है। तीनों राज्यों में पूर्व मुख्यमंत्री सर्वशक्तिमान थे तब पार्टी नेतृत्व ने सेकंड लाइन पर कोई ध्यान नहीं दिया। यह चूक भी हाईकमान की थी जिन्हें राज्यों ने पहले भुगता और अब भी भुगतने के हालात हैं। प्रदेशों के संगठन की स्थिति बहुत ही गई गुजरी है। अध्यक्ष और संगठन मंत्रियों से लेकर सबको बदले बिना कुछ अच्छा होने का अनुमान नहीं है। भाजपा की पूरी स्थिति को देखकर देवर्षि नारद और कंस के बीचव का संवाद याद आता है। आकाशवाणी हुई थी कि देवकी का आठवां पुत्र मामा कंस की मौत का कारण बनेगा। इस पर कंस ने तय किया कि वह अपनी बहन देवरी की आठवीं संतान को मार देगा। यह देखकर देवताओं ने माना कि जब तक कंस अपेन सातों भांजों को नहीं मारेगा तब तक उसके पाप का घड़ा नहीं भरेगा। तब नारदजी ने कमल के फूल की पंखुडिय़ां गिनते हुए कंस से पूछा था कि इसमें पहली और आखिरी कौन सी है। भ्रमित हुए कंस ने बाद में अपनी बहन की सभी संतानों को मारने का फैसला किया। इसके बाद कंस को मारने के लिए कृष्ण का जन्म हुआ। भाजपा हाईकमान भी भ्रमित है। वह समझ नहीं पा रहा है कि राज्य में पार्टी की हार मुख्यमंत्रियों के कारण हुई या मोदी सरकार की नीतियां भी उसमें जिम्मेदार थीं। मसलन एट्रोसिटी एक्ट, महंगा डीजल-पेट्रोल, कुकिंग गैस, जीएसटी और रोजगार की कमी भी बड़ी वजह हार की। अगर यह सब नियंत्रित होते तो तीन राज्यों में से राजस्थान और मध्यप्रदेश में भाजपा वापसी कर सकती थी। लेकिन मोदी और अमित शाह पर कोई उंगली न उठाए इसलिए तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों से हार की जिम्मेदारी उठवाई गई। एक तरह से तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों के राजनीतिक कद घटाने के लिए उन्हें दिल्ली रवाना कर दिया गया। अब होगा यह कि इन तीनों के जो समथ्रक राज्यों में हैं लोकसभा चुनाव के दौरान जाहिर है वह उतनी ताकत से सक्रिय नहीं होंगे जितनी पार्टी को जरूरत है। कुल मिलाकर भाजपा ने एक बार फिर खुद अपना नुकसान किया है। ऐसे में उसे कांग्रेस की क्या जरूरत है?
०-नया इंडिया के कालम ”ना काहू से बैर” से साभार)
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