भाजपा के लिए महागठबंधन का जाल बुन रहे शरद यादव

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०- अरुण पटेल

प्रखर समाजवादी नेता शरद यादव इन दिनों भाजपा को घेरने के लिए छोटे-छोटे दलों को मिलाकर और उन्हें कांग्रेस से जोड़कर मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए एक महागठबंधन का जाल बुनने में जुट गये हैं। शरद का मानना है कि कांग्रेस को आगे बढ़कर भाजपा विरोधी सभी मतों को एकजुट करने के लिए पहल करना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो फिर उन्हें भरोसा है कि भाजपा प्रदेश में चौथी बार सत्तारूढ़ नहीं हो पायेगी। आधा दर्जन छोटे दलों ने शरद यादव के नेतृत्व में एकसाथ आने का संकल्प लिया है। शरद की कोशिश है कि कांग्रेस इसके प्रति सकारात्मक रुख अपनाये ताकि एक मजबूत महागठबंधन मध्यप्रदेश में आकार ले सके। अपनी इसी मुहिम के तहत जहां एक ओर उन्होंने लोक क्रांति अभियान के तहत इन दलों को जोडऩे का काम किया तो वहीं दूसरी ओर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री तथा प्रदेश कांग्रेस की समन्वय समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ से भी उन्होंने चर्चा की। कमलनाथ ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए साफ कहा कि मध्यप्रदेश को सुरक्षित रखने के लिए सभी पार्टी के नेताओं से मुलाकात एवं बातचीत चल रही है। इस बार हर हाल में मध्यप्रदेश को भाजपा से मुक्त कराने का संकल्प कमलनाथ ने व्यक्त किया तो शरद यादव ने मुलाकात के बाद कहा कि यदि देश का संविधान बचाना है तो कांग्रेस सहित सभी पार्टियों को एकजुट होना पड़ेगा।
शरद यादव ने भोपाल प्रवास के दौरान जो कुछ कहा या किया उसका एकमात्र केन्द्रीय स्वर यही उभरकर निकलता है कि वे चाहते हैं कि कांग्रेस को साथ रखकर चुनावी समर में उतरा जाए। बहुजन संघर्ष दल के फूलसिंह बरैया ने भी कहा कि यदि प्रदेश में भाजपा की सरकार चौथी बार बनी तो इसकी जिम्मेदार केवल कांगे्रस पार्टी होगी। उन्होंने कहा कि हम लम्बे समय से कांगे्रस के बड़े नेताओं से समर्थन देने की बात कह चुके हैं लेकिन उन्होंने इस बारे में बात करने से मना कर दिया है जबकि हमें समर्थन देने वाली जातियों की आबादी 80 फीसदी है और यदि हम सब एकजुट हो गए तो भाजपा को हराना मुश्किल नहीं होगा। इससे यह साफ है कि छोटे दल एकजुट होकर कांग्रेस की अगुवाई में भाजपा को चुनाव में पराजित करने का सपना देख रहे हैं। शरद यादव इन छोटे दलों और कांग्रेस के बीच सेतु की भूमिका में हैं और यदि वे इसमें सफल रहते हैं तो इससे भाजपा के सामने चुनौतियां कुछ और बढ़ जायेंगी।
भाजपा की घेराबंदी के लिए महागठबंधन बनने की जो कोशिशें हो रही हैं उसका मुकाबला कैसे किया जाए, इसको लेकर भाजपा में भी चिन्तन-मनन का दौर चल रहा है। शुक्रवार 03 अगस्त की देर रात मुख्यमंत्री निवास पर हुई बैठक में अन्य मुद्दों के अलावा इस पर भी चर्चा हुई है कि कांग्रेस जो गठबंधन की राजनीति करने जा रही है उसका भाजपा पर पडऩे वाले प्रभाव और उससे निपटने की क्या रणनीति हो। दलितों और आदिवासियों को साधने के उपाय पर भी चर्चा की गयी। यदि प्रदेश में भाजपा विरोधी ताकतों का महागठबंधन बन जाता है तो भाजपा को अपनी रणनीति नये सिरे से बनानी होगी। पिछड़े वर्गों को साधने के अभियान में शरद यादव लगे हुए हैं और लोक क्रांति अभियान के राज्य स्तरीय सम्मेलन में उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार ने देश में संकट पैदा कर दिया है जिसके कारण संविधान खतरे में है। शिवराज की जन-आशीर्वाद यात्रा भी यादव के निशाने पर रही और उन्होंने कहा कि यह जन-आशीर्वाद नहीं जन अभिशाप यात्रा साबित हो रही है। सभी छोटे दलों को एकजुट होकर उन्होंने भाजपा सरकार के खिलाफ आवाज उठाने का आह्वान किया। मध्यप्रदेश शरद यादव की जन्मभूमि है और पहली बार जबलपुर से ही उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन के तहत जयप्रकाश नारायण समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लोकसभा में प्रवेश किया था और इसके साथ ही वे सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन में एक युवा चेहरे के रूप में उभरे थे। कांग्रेस से तालमेल की भले ही वे सीधे बात न कर रहे हों लेकिन इस बात को छुपा भी नहीं रहे हैं कि यदि भाजपा का मुकाबला करना है तो कांग्रेस को साथ रखना ही एकमात्र विकल्प है। उन्होंने राज्य स्तरीय लोक क्रांति सम्मेलन में स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाजपा से मुकाबला करने के लिए कांग्रेस बड़ी पार्टी है, हम सब उसके साथ हैं और उसे भाजपा को उखाडऩे के लिए बड़ा दिल रखना होगा। शरद का पूरा अभियान इस बात पर टिका हुआ है कि भाजपा 31 प्रतिशत वोट पाकर पूरे देश में राज कर रही है और 69 प्रतिशत वोट बिखरे हुए हैं, इसलिए हमें यही कोशिश करना है कि बिखरे हुए वोट एक हो जायें।
शरद के इस सम्मेलन में जो दल जुड़े थे उनमें राष्ट्रीय बहुजन संघर्ष दल, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, प्रजातांत्रिक समाधान पार्टी, राष्ट्रीय समानता दल तथा उनकी अगुवाई में जेडीयू से अलग हुआ दल शामिल थे। इस आयोजन के तार कहीं न कहीं कांग्रेस से जुड़े हुए थे इसका संकेत इसी बात से मिलता है कि दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र और कांग्रेस के पूर्व सांसद संदीप दीक्षित भी सम्मेलन में मौजूद थे। जहां तक महागठबंधन का सवाल है, बसपा और सपा से कांग्रेस का गठबंधन लगभग तय माना जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर कमलनाथ भी पहले ही कह चुके हैं कि भाजपा विरोधी दलों को एक छाते के नीचे लाने की कोशिश की जा रही है। कमलनाथ और शरद यादव के प्रयास कितना परवान चढ़ पाते हैं यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस बड़ा दल होने के साथ ही कितना बड़ा दिल रखकर दरियादिली दिखाती है। विधानसभा चुनाव में खासकर नर्मदा कछार में रेत उत्खनन का मामला भी एक अहम मुद्दा रहने वाला है। इसको लेकर जहां आने वाले समय में दिग्विजय सिंह शिवराज सरकार की तगड़ी घेराबंदी करने वाले हैं तो वहीं शरद यादव ने यह कहकर कि नर्मदा और तवा नदी तबाह हो गयी हैं, यह संकेत दे दिया है कि प्रदेश में नदियों में हो रहा अवैध उत्खनन एक अहम मुद्दा बनने वाला है। यह मुद्दा चम्बल संभाग में भी विपक्षी पार्टियां पूरी ताकत से उठायेंगी।

और यह भी
अचानक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाये गये अरुण यादव अब एक प्रकार से कोपभवन से बाहर निकल आये हैं और उनके घावों पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जो मलहम लगाया उसका असर दिखने लगा है। पहले उन्हें कांग्रेस कार्यसमिति का विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया गया और अब राहुल गांधी के मध्यप्रदेश दौरे में उन्हें सारथी की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। इस नाते राहुल के हर दौरे में अरुण यादव इस भूमिका में नजर आयेंगे। उनका कहना है कि पार्टी ने उन्हें जो जिम्मेदारी सौंपी है उसे पूरी ईमानदारी के साथ निभायेंगे। राहुल की मध्यप्रदेश यात्रा का शुभारंभ उनके संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में आने वाले ओंकारेश्वर तीर्थस्थल से होने जा रहा है। उन्हें व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी सौंपी गयी है और वे राहुल के साथ पूरे समय रहेंगे जबकि अन्य नेता अलग-अलग जगहों पर नजर आयेंगे। अरुण यादव की समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से पारिवारिक संबंध होने और भोपाल में उनके घर आने के साथ ही अरुण की कांग्रेस में पूछ परख बढ़ गई है। राहुल की यात्रा तो सितम्बर में होगी लेकिन कांग्रेस के अन्य नेता अगस्त माह से ही मैदान में नजर आने लगेंगे। कमलनाथ एक अगस्त से चुनावी सभा की शुरुआत कर चुके हैं।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
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