भाजपा की छवि मुस्लिम विश्वास जीतने में बाधक …।

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०-ओमप्रकाश मेहता
प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी ने ”सबका साथ, सबका विकास” के साथ ”सबका विश्वास” जोड़कर पूरे देश का विश्वास जीतने का अभियान तो शुरू किया है, किन्तु मुस्लिमों के विश्वास अभियान में सबसे अधिक बाधक भारतीय जनता पार्टी की ”हिन्दूवादी” छवि बन रही है। भाजपा व उसके संरक्षक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने काफी पहले से ”हिन्दू राष्ट्र” का नारा दे रखा है और इस पार्टी और संगठन के वाचाल सदस्य समय-समय पर मुस्लिमों के प्रति आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग कर उनके प्रति नफरत पैदा करने की भी कोशिश करते रहे हैं, अब ऐसे माहौल में अकेले नरेन्द्र भाई मोदी मुस्लिम समुदाय का विश्वास कैसे अर्जित कर सकते हैं? ऐसा कतई नहीं है कि मोदी जो सिर्फ राजनीतिक लाभ के लए यह मशक्कत कर रहे हैं, वे तो चाहते हैं कि हर वर्ग, समुदाय, जाति, सम्प्रदाय का हर शख्स उनके (मोदी के) साथ रहे इसीलिए मोदी जी ने अल्पसंख्यक वर्गों के लिए भी कई कल्याणकारी कदम उठाए जैसे तीन तकाल का खात्मा, मदरसों में पढऩे वाले बच्चों के लिए हितकारी योजनाए, मदरसों की किताबों के पाठ्यक्रमों व शिक्षकों की मानसिकता में परिवर्तन के प्रयास, मदरसों व छात्रों को आर्थिक मदद आदि किंतु इतना सब होने के बाद भी मुस्लिम समुदाय के विश्वास में कोई परिवर्तन परिलक्षित नहीं हो रहा है, इसका कारण सिर्फ और सिर्फ यही है कि भाजपा की हिन्दूवादी छवि बाधक बन रही है, अब यदि इस छवि को किसी भी तरह बदलने का प्रयास किया जाए तो उसकी प्रक्रिया काफी लम्बी होगी और इतना वक्त किसी के भी पास नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी ने संसद के सेन्ट्रल हॉल के सम्बोधन में स्पष्ट कर दिया था कि गरीबों व मुस्लिमों के साथ लम्बे अर्से से छल किया जा रहा है, उन्हें ‘वोटबैंक’ बताकर इनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ हो रहा है, इसलिए पिछले पांच साल के शासनकाल में उन्होंने गरीबों के साथ हो रहे छल को छेदने का प्रयास किया था और अब वे मुस्लिम भाईयों के साथ किये जा रहे छल को छेदने का प्रयास कर उनका विश्वास अर्जित करने का अथक प्रयास करेंगे। इसका सीधा-सीधा मतलब यह है कि मोदी जी को पता है कि इस समस्या की जड़ कहां है और उसका निदान क्या है? किंतु यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि आम गरीब और आम मुस्लिम में काफी फर्क है, जहां तक गरीब का सवाल है यद्यपि उसे ‘ऊंट के मुंह में जीरे’ जितना ही लाभ पहुंचाया गया, क्योंकि २०१४ के चुनावी वादों को जुमलों में बदल दिया गया था, किंतु यह सही है कि गरीबों की मद चाहे उतनी नहीं हकी गई हो, किंतु चिंता अवश्य की गई। अब जहां तक मुस्लिम समुदाय का सवाल है, गरीब का कोई धर्म नहीं होता किंतु मुसलमान का धर्म होता है और यह कौम अपने धर्म और रीति-रिवाजों के प्रति काफी संवेदनशील रहती है, जिसे ‘कट्टरपंथ’ कहा जाता है, इसलिए बिना इनकी धार्मिक संवेदनाओं केा आहत किए, इनका विश्वास अर्जित करनापड़ेगा और यह हुनर शायद मोदी जी भी अजमाने की कोशिश का रहे हैं, किंतु उनके ‘तीन तलाक’ खात्मे के प्रयास से जहां मुसिलम पुरुष वर्ग नाराज है, वहीं मदरसों में ‘शिक्षा क्रांति’ लाने के प्रयास से आम मुस्लिम वर्ग नाराज बताया जा रहा है, चूंकि मुस्लिम समुदाय उनके एकमात्र पवित्र ग्रंथ ‘कुरान पाक’ की आयातों में बंधा है, और भारत में मुस्लिम सुदाय के मदरसे कुरान व धार्मिक ज्ञान पर केन्द्रित हैं, जहां आधुनिक शिक्षा पद्धति का लोप है, इसलिए धार्मिक मामलों में यह कट्टरपंथी समुदाय मदरसों की शिक्षा पद्धति में किसी भी तरह की छेड़छाड़ पसंद नहीं करेगा, चाहे आप या सरकार कितनी ही आर्थिक सहायता का प्रयास क्यों न कर लें? इसलिए मुस्लिमों का विश्वास अर्जित करना भाजपा की हिन्दूवादी छवि और मुस्लिमों की धार्मिक कट्टरता के चलते काफभ् टेड़ी खीर है। फिर कई अन्य अयोध्या, राम मंदिर, जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील मामले भी हैं जो मुस्लिम कौम से जुड़े हैं, इसलिए आज मोदी जी के इरादे चाहे कितने ही नेक क्यों न हों? किंतु जब तक मुस्लिम समुदाय को सोच की इन सीमाओं के बंधन मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक मोदी जी के प्रयास सफल नहीं हो पाएंगे।
०-नया इंडिया के कालम ”मोदी और मुस्लिम” से साभार)
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