बार-बार उपेक्षित फिर भी उमा लगायेंगी भाजपा की नैया पार

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। एक समय भाजपा की फायर ब्रांड नेत्री के नाम से चर्चित सुश्री उमा भारती का उपयोग भारतीय जनता पार्टी ने तब-तब किया जब-जब उस पर अपनी छवि बचाने की समस्या खड़ी हुई, तब उमा भारती ने भाजपा की संकट मोचक की भूमिका अदा कर भाजपा की छवि बचाने का प्रयास किया, लेकिन उमा भारती का जिस तरह से उपयोग भाजपा ने किया इसके साथ ही उनकी उपेक्षा भी भरपूर की गई फिर चाहे वह शिवराज के राजनैतिक गुरु स्वर्गीय सुन्दरलाल पटवा से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक जमकर उमा भारती की उपेक्षा की, तो वहीं भाजपा के लोग भले ही उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती और समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह के द्वारा लखनऊ के मीरा गेस्ट हाउस की घटना को याद दिलाकर माया और मुलायम या अखिलेश में दरार डालने का प्रयास करते हों लेकिन लखनऊ के मीरा गेस्ट हाउस की तरह घटना एक बार उमा भारती के साथ भी घटते-घटते बच गई जब छतरपुर के बड़ामलहरा चुनाव के दौरान शिवराज और उनके रणनीतिकारों ने उमा भारती को एक मन्दिर में घेर लिया था लेकिन समय पर उसकी सूचना छतरपुर के एक युवा पत्रकार ने राजधानी के एक पत्रकार को दी और उस पत्रकार ने तत्कालीन कानून व्यवस्था के आई.जी. को इसकी सूचना दी और उमा भारती के समर्थकों जिनमें प्रहलाद पटेल, उनके भतीजे सिद्धार्थ लोधी जैसे कई समर्थकों को जब मिली तो वह सब छतरपुर के उस बड़ामलहरा में जहां उमा भारती की घेराबंदी शिवराज के समर्थकों और स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने उसको तोडऩे में कामयाबी हासिल की लेकिन इसके बाद जो द्वंद्व बड़ामलहरा में शिवराज समर्थकों और उमा समर्थकों के बीच हुई उसके चलते शिवराज समर्थक वहां से नग्न अवस्था में वहां लगे बैनर-पोस्टरों से अपनी लाज बचाते हुए भाग खड़े थे, यदि समय रहते छतरपुर के उस युवा पत्रकार ने उमा भारती की घेराबंदी की सूचना संबंधितों को नहीं दी होती तो उमा भारती के साथ क्या होगा इसकी तो कल्पना ही की जा सकती है, ऐसे एक नहीं अनेकों उदाहरण हैं जब भी भारतीय जनता पार्टी की स्थिति कमजोर हुई तो उमा को मान मनौव्वल कर उनका सहारा लिया गया और जैसे ही भाजपा का स्वार्थ पूरा हुआ वैसे ही उनकी हर बार उपेक्षा की गई, फिर चाहे वह सुन्दरलाल पटवा का शासनकाल का हो, पटवा के शासनकाल में भी उमा की उपेक्षा करने का दौर भी खूब चला तो वहीं जब भाजपा को २००३ में उमा भारती की आवश्यकता प्रदेश के कथित कांग्रेसी कुशासन से मुक्ति दिलाने और सत्ता पर काबिज होने के लिये आवश्यकता पड़ी तो उनकी मान-मनौव्वल की गई उनको मनाने के प्रयास किये गये और आखिरकार अपनी आदत अनुसार वह पसीजकर २००३ के विधानसभा चुनाव में सक्रिय हुईं हालांकि इससे पूर्व इसी मध्यप्रदेश में कांग्रेस की तत्कालीन दिग्विजय सिंह की सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिये नरेंद्र मोदी को प्रदेश संगठन की कमान सौंपी गई थी लेकिन उस समय के तत्कालीन भाजपा नेता स्वर्गीय सुन्दरलाल पटवा, कैलाश, सारंग, लखीराम अग्रवाल और विक्रम वर्मा जैसे लोग जिनकी कार्यशैली के चलते भाजपा उस समय भाजपा-डी (दिग्विजय ङ्क्षसह) के नाम से जानी जाती थी क्योंकि उस समय भाजपा के नेताओं की सारा खर्चा दिग्विजय सिंह द्वारा वहन किया जाता था तो वहीं उसी दौर में चर्चाओं में आये तमाम पर्चों के माध्यम से यह भी खुलासा हुआ कि तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा भाजपा के नेताओं और भाजपा से समर्थित पत्रकारों को कितनी-कितनी राशि से उपकृत तो समय-समय पर किया गया ही तो वहीं भाजपा के कई समर्थित पत्रकारों को बेटा-बेटियों की शादी का भार भी दिग्विजय सिंह ने उठाया, इस तरह की घटनाओं का खुलासा उस समय पर्चों के खेल में चर्चा का विषय बनता रहा। यही वजह रही कि नरेन्द्र मोदी के प्रदेश के संगठन मंत्री होने के बावजूद भी राज्य में भाजपा के पक्ष में पर्याप्त माहौल होने के बावजूद भी तत्कालीन भाजपा के नेताओं की कार्यशैली के चलते नरेन्द्र मोदी १९९८ में भाजपा की प्रदेश में सरकार बनाने में असफल साबित हुए, मजे की बात तो यह है कि जो युवा भाजपा नेता विश्वास सारंग आज दिग्विजय सिंह के खिलाफ अनेक मुद्दों पर बयानबाजी करते नजर आते हैं वही विश्वास सारंग दिग्विजय सिंह के पूरे कार्यकाल के दौरान अपना अधिकांश समय सीएम हाउस में बिताकर राजनीति किया करते थे। नरेन्द्र मोदी के संगठन महामंत्री के रूप में प्रदेश में भाजपा नेताओं की बदौलत सत्ता पर काबिज होने की असफलता के बाद जब २००३ में विधानसभा का चुनाव आया तो उमा भारती से मान-मनोव्वल कर पार्टी ने सक्रिय किया तो जितनी मेहनत उमा भारती ने दिग्विजय सिंह की दस वर्षों की सतारूढ़ सरकार को बेदखल करने में नहीं की होगी, उतनी मेहतन उन्हें सुन्दरलाल पटवा के शासनकाल में उपेक्षित देव दुर्लभ और निष्ठावान नेताओं और कार्यकर्ताओं को बनाने में करनी पड़ी, क्योंकि पटवा के शासनकाल में जिस तरह से निष्ठावान और देवदुर्लभ कार्यकर्ताओं और नेताओं की दुर्दशा हुई ठीक इसी तरह की स्थिति शिवराज सिंह चौहान के शासनकाल में सत्ता के दलालों और हर प्रकार के माफियाओं के साथ-साथ उनके परिजनों द्वारा रेत माफिया और अन्य कारोबार में जमकर रुचि लेने के कारण देव दुर्लभ और निष्ठावान कार्यकर्ता पटवा की सरकार की तरह नाराज होकर घर बैठ गये यही कारण है कि भाजपा की स्थिति १९९८ के विधानसभा चुनाव की तरह प्रदेश के तत्कालीन भाजपा नेताओं की कार्यशैली की बदौलत हो गई तो वहीं भाजपा इस स्थिति पर आकर खड़ी हो गई कि उसे प्रदेश की २९ लोकसभा सीटों पर लड़ाने के लिये प्रत्याशियों का टोटा पड़ रहा है और जिनको पार्टी ने उम्मीदवार बनाया उनका जमकर विरोध उनकी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं द्वारा किया जा रहा है पार्टी की इस दुर्दशा के लिये भाजपा के निष्ठावान नेता और कार्यकर्ता शिवराज सिंह और नरेन्द्र तोमर के साथ-साथ उन भाजपा नेताओं को दोषी मान रहे हैं जो प्रदेश के अध्यक्ष बनते ही एक टेलर से हजारों के कपड़े तो सिलवा लेते हैं लेकिन उसके रुपये आज तक अदा नहीं कर पाये हैं? जब वह टेलर उनके यहां रुपये मांगने जाता है तो हवा-हवाई और बयानबाजी में महारथ अध्यक्ष महोदय का पुत्र यह जवाब देता है कि क्या नेताओं के कपड़ों और सिलाई के रुपये भी दिये जाते हैं। आखिरकार हवा-हवाई अध्यक्ष के बेटे से मिले इस जवाब से आहत टेलर रुपये की मांगने की जुर्रत तक नहीं कर पा रहा है? ऐसे भाजपा में एक नहीं अनेकों नेता हैं। इन्हीं सब नेताओं की कार्यशैली के चलते भाजपा की यह स्थिति हो गई कि वह आज दिग्विजय सिंह के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा करने में हर किसी को मनाने में लगा हुआ है और दूसरी ओर दिग्विजय सिंह फ्री स्टाइल कुश्ती के पहलवानों की तर्ज पर एक के बाद एक चुनौती देते धड़ल्ले से घूम रहे हैं तब आखिरकार भारतीय जनता पार्टी को अपनी परंपरागत सीट की लाज बचाने के लिये उमा भारती की शरण में फिर जाना पड़ा लेकिन सवाल यह उठता है कि जिन उमा भारती के २००३ में भाजपा को सत्ता पर काबिज कराने के बाद इन्हीं शिवराज और उनके वह नेताओं जिनपर २००३ के विधानसभा चुनाव में भय, भूख और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देने के वायदे के अनुसार शासन करने से भयभीत यह नेता उमा भारती के खिलाफ षडय़ंत्र करने में लगे हुए थे और आखिरकार इन नेताओं का षडय़ंत्र के चलते उमा भारती को दीनदयाल परिसर से राम रोटी यात्रा करने पर मजबूर कर दिया साथ ही शिवराज सिंह के शासनकाल में उनकी और भाजपा नेताओं की यह रणनीति रही कि उमा भारती की मध्यप्रदेश में नेतागिरी पर वीटो लगा दिया और आखिरकार जब भाजपा को जरूरत पड़ तो उन्हें उत्तरप्रदेश के झांसी लोकसभा से चुनाव मैदान में उतारा गया और इसके बाद जब नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमण्डल में शामिल किया गया तो उमा भारती की जनहितैषी और लोककल्याणकारी नीति की टकराहट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से होने की चर्चा है पार्टी सूत्रों का यह कहना है कि जिस गंगा सफाई की जिम्मेदारी उमा भारती को दी गई थी उसके विभाग के द्वारा गंगा सफाई के लिये जो टेंडर निकाले गये उसमें एक कम्पनी का टेण्डर कम दर पर था और नरेन्द्र मोदी के उस साबरमती के सफाई का कार्य करने वाली कम्पनी की दर कुछ ज्यादा थी जिस पर उमा भारती ने दोनों ठेकेदारों को बुलाया और उनसे पूछा कि भाई इसके पास क्या कम गुणवत्ता वाली और आपके पास जो सोने-चांदी की मशीनें हैं जो आप महंगी दरों पर गंगा की सफाई कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी की पार्टी से समर्थित ठेकेदार को जब उमा ने ठेका नहीं दिया तो उमा से गंगा सफाई का कार्य न करने देने की मोदी और उनके समर्थकों द्वारा समस्या खड़ी की गई और उमा भारती की उपेक्षा की गई। इस तरह की भाजपा नेताओं की कार्यशैली के चलते एक के बाद एक उमा भारती की बार-बार उपेक्षा की गई लेकिन जब-जब भाजपा को अपनी छवि बचाने का संकट आया तो उमा भारती को मनाने के भी भरसक प्रयास किये गये ऐसा ही अब भोपाल लोकसभा सीट की लाज बचाने के लिये उमा भारती की मान मनौव्वल की जा रही है इस तरह की भाजपा नेताओं की कोशिशों के चलते अब प्रदेश में उमा समर्थकों और जिस प्रदेश की आम जनता ने उमा भारती की २००३ में सत्ता पर काबिज होने के बाद जो उपेक्षा का दौर देखा है उन सबमें यह चर्चा का दौर चल निकला कि आखिर कब तक भाजपा के वह नेता जो अपने आपको भाजपा का प्रबल समर्थक और भाजपा के लिये जीने-मरने का दावा करने वाले अपने आपको राजनीति में दरिद्र नारायण की सेवा करने का व्रत लेने का जुमला सुनाते नजर आते हैं लेकिन उनके ही शासन में भाजपा के उन नेताओं जिनकी हैसियत उमा भारती के शासनकाल में टूटी साइकिल तक खरीदने की नहीं थी आज वह आलीशान भवनों और लग्जरी वाहनों में फर्राटे लेते नजर आ रहे हैं। मजे की बात तो यह है कि २००५ के दौर में जिन नेताओं ने उमा भारती को एक सुनियोजित षडय़ंत्र रचकर पार्टी से बाहर किया था आज वही उमा भारती के भोपाल लोकसभा से पुन: भाजपा प्रत्याशी बनाये जाने को लेकर उमा के साथ रद्दीन में पड़े फोटो को झाडफ़ूंककर सोशल मीडिया पर शेयर कर यह लिखने लगे कि उमा जी संत हैं दिग्विजय सिंह का अंत है, ऐसे नेताओं की सोशल मीडिया पर इस तरह की पोस्ट को देखकर लोग तरह-तरह की कयास लगा रहे हैं तो वहीं उमा समर्थक और उमा की जब-जब उपेक्षा से नाराज आम जनता में यह चर्चा का दौर भी अब जमकर चल निकला कि अब यह वही भाजपा के वह नेता जो उमा भारती को पार्टी से बाहर करने के लिये इसलिये सक्रिय थे क्योंकि इनकी उमा के शासनकाल में भ्रष्टाचार की चाल कामयाब नहीं हो रही थी इन नेताओं की इस तरह की पोस्टों को लेकर उमा समर्थक यह कहते नजर आ रहे हैंं कि उमा जी हम शर्मिंदा हैं आपकी उपेक्षा करने वाले आज भी… ? तो वहीं अब भाजपा नेताओं के साथ-साथ पार्टी और उन उमा समर्थकों में यह चर्चा भी जोरों से चल निकली है कि यदि उमा भारती को विधानसभा, लोकसभा चुनाव में उतार दिया गया तो अपना उद्देश्य पूरा होने के बाद यही शिवराज और उनकी मण्डली और वह भ्रष्ट नेता जो उमा भारती को पार्टी से हटाकर फले फूल हैं कब उमा भारती की उपेक्षा कब करेंगे ?

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