बजट : विकास और विश्वास का कुशल गृहिणी के बजट का इंतजार … ?

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०-ओमप्रकाश मेहता
देश का बजट इस बार एक गृहस्थ राजनेत्री के हाथों में है, यद्यपि इस बार का बजट अपने आपमें बहुत बड़ी चुनौती है, क्योंकि देश की माली हालत ठीक नहीं है, आर्थिक क्षेत्र में राष्ट्रय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक चुनौतियां जिनसे निपटते हुए देश को सही आर्थिक पटरी पर लाना महिला वित्तमंत्री की प्रतिष्ठा से जुड़ा मामला है। अब उन्हें अपने घर के बाद देश का बजट तैयार करने की चुनौती मिली है, वे एक अग्रसोची व सूझ-बूझवाली महिला नेत्री हैं, इसलिए इसमें कोई शक नहीं कि वे हर चुनौती से बखूबी निपटेंगी और तूफानी मझधार में खड़ी हमारी आर्थिक नाव को विकास व समृद्धि के किनारे लाकर खड़ा करेंगी। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्याप्त मंदी है, जिससे हमारा देश भी अछूता नहीं है, देश में व्याप्त महंगाई से आज देश का हर परिवार पीडि़त व असहाय है, फिर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ती भीषण गर्मी। इस बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ का कहना है कि यह भीषण गर्मी भारत में २०३० तक तीन करोड़ चालीस लाख नौकरियों के बराबर नुकसान कर सकती है, यह सिर्फ भारत का ही आंकलन विश्वभर के देश के नुकसान का आंकलन तो हमसे भी हजारों गुना होगा, यह ग्लोबल वार्मिंग का असर है। जिसके कारण हमारा उत्पादन घटेगा, जो हमारी अर्थव्यवस्था को फिलहाल अगले ग्यारह साल तक भीषण रूप से प्रभावित करेगा। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र संगठन (आईएलओ) ने ‘ज्यादा गर्म ग्रह पर काम करना’ श्रम उतपादकता और निर्णय कार्य पर गर्मी से बढ़ते तनाव का असर शीर्ष से रिपोर्ट तैयार की है, इसमें कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण वर्ष २०३० तक दुनिया भर में कुल कामकाजी घण्टों का सालाना दो फीसदी से अधिक के बराबर नुकसान होने का अनुमान है, सीधे तौर पर इनकी दो वजह होगी काम करने के लिहाज से बहुत अधिक गर्मी या काम करने की रफ्तार। यह रिपोर्ट इसलिए भी चौंकाने वाली है, क्योंकि इसमें कहा गया है कि इस विषम स्थिति में हमारा देश भारत सर्वाधिक प्रभावित होगा, भारत में १९९५ में ४.५ फीसदी कामकाजी घण्टों का नुकसान उठाया और देश को इस कारण २०३० में ५.८ फीसदी कामकाजी घण्टों का नुकसान होने का अनुमान है। इस रिपोर्ट को देखते हुए हमें विशेष रूप से सावधान रहने की जयरत है। खैर, ऐसी रिपोर्ट तो पहले से सचेत रहने के लिए वास्तविकताओं पर आधारित होती है, जिनकी किसी भी देश का आर्थिक बजट तैयार करने समय उपेक्षा नहीं की जा सकती और न ही बजट पार्टी के हलवे की तरह इसे खाया जा सकता है, किंतु यह सही है, हमारे भविष्य, वर्तमान और अतीत तीनों ही कालखण्डों को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया जाना है, जिनमें सत्तारूढ़ पार्टी की आकांक्षाएं भी शामिल रहती हैं। यह तो हुई एक ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की चेतावनी भरी रिपोर्ट की बात। अब यदि हम हमारे अपने देश की चुनौतियों की बात करें, तो इस देश को ‘मोदी-बम’ सरकार के कुछ फैसलों के परिणामों से देश अभी भी उभर नहीं पाया है। नोटबंदी और जीएसटी जैसे आर्थिक फैसलों ने देश को आर्थिक दृष्टि से उबारा नहीं बल्कि आर्थिक गड्ढे में गिरने केा मजबूर किया है। जीएसटी जहां सरकार को मालामाल करने का नया माध्यम है, वहीं आकस्मिक नोटबंदी अनेक दुश्वारियों लेकर आई, जिससे देश का आम आदमी ढाई साल बाद भी उभर नहीं पाया है, इसके अलावा किसानों की कर्ज माफी का राजनीतिक नारा, बेरोजगारों को नौकरी देने का सब्जबाग दिखाकर पिछले चुनाव में वोट कबाडऩा इसी बजट में देश को महंगबा पडऩे वाला है। फिर इसके साथ ही माननीय प्रधानमंत्री जी के ‘सबका साथ-सबका विकास’ के साथ ‘सबका विश्वास’ के नारे की सफलता का राज भी इसी बजट के साथ जुड़ा है। क्योंकि बजट के साथ भी अंग्रेजी की एक कहावत -‘डॉट-ट्रॉय टू प्लीज एवरी वन’ (हर एक को खुश रखने का प्रयास मत करो) भी जुड़ी है, इसलिए बजट से सबको खुश नहीं रखा जा सकता, कोई न कोई वर्ग या तबका तो दुखी होता ही है, जिसका संभवत: वित्त मंत्राणी जी ने विशेष ध्यान रखा ही होगा? अर्थशास्त्र की दृष्टि से हमेशा घाटे वाला बजट ही श्रेष्ठ बजट माना जाता है, लाभ वाला बजट श्रेष्ठ नहीं माना जाता, क्योंकि बजट बनाते समय वित्तमंत्री को थोड़ा तो ‘निर्मम’ होना ही पड़ता है, फिर चाहे देश उन्हें कुछ भी कहे? अब इस बार देखना यह होगा कि एक ममतामयी माननीया वित्त मंत्राणी जी किस स्तर तक ‘निर्ममÓ होती है? किंतु उम्मीद तो यही की जानी चाहिए कि बजट के बाद बाजार में ‘बहार’ जरूर आएगी और देश में हर तरफ से चिंताएं दूर होकर हर क्षेत्र में नए निवेशों का माहोल् बनेगा साथ ही सरकारी नौकरी पेशा के वर्ग व अन्य वाणिज्यिक क्षेत्र में करों के बोझ को कम करने के ममतामयी क्षेत्र में करो के बोझ को कम करने के ममतामयी मां के प्रयास होंगे, क्योंकि देश के आर्थिक रथ पर स्वयं ‘लक्ष्मी’ जो सवार हैं?
०-नया इंडिया के कालम ”मुद्दा” से साभार)
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