प्रदेश लचर तंत्र में राज्यपाल के सजग होने के मायने

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०-कैलाशचंद्र पंत
आमतौर पर राज्यपाल का पद शोभा का समझा जाता है। वह राज्य की नियमित गतिविधियों से तटस्थ रहता दिखाई देता है। ऐसी मान्यताओं के बीच जब कोई राज्यपाल सक्रिय दिखाई देता है, तो राजनीतिक क्षेत्रों में कयास लगाए जाने लगते हैं। जरूरी नहीं कि राज्यपाल की सक्रियता के पीछे कोई राजनीतिक निहितार्थ ही हो। लेकिन जन-धारणाएं अक्सर रूढ़ हो जाती है और तनिक भी विपरीत परिस्थितियों में स्पंदित होने लगती है। मध्यप्रदेश के आनंदीबेन पटेल के रूप में नई राज्यपाल मिल गई है। वे शिक्षा से जुड़ी रही, उन्हें प्रशासन का काफी लंबा अनुभव है और गुजरात की मुख्यमंत्री भी रही हैं। वे जानती हैं कि राज्यपाल राज्य के प्रशासन का संवैधानिक प्रमुख भी होता है। इसलिए प्रशासन-तंत्र की बारीकियों से भी वे खूब परिचित हैं। पदभार ग्रहण करने के बाद वे भोपाल स्थित बाल निकेतन के अनाथ बच्चों से मिलने गई। बाल सुधार-गृह गई। यह उनके भीतर माँ की ममता और संवेदनशीलता का साक्ष्य है। इतना ही नहीं, उन्होंने कुछ प्रतिभावान बच्चों को राजभवन बुलाकर प्रोत्साहित किया। इसी के साथ उन्होंने विभिन्न अधिकारियों से भेंट कर उनके विभागों की कार्य पद्धति को समझने की कोशिश की। प्राप्त जानकारी के अनुसार उन्हें आश्चर्य हुआ कि मध्यप्रदेश के अधिकारी अपने विभागों की डिजिटल प्रस्तुति नहीं दे सके। निश्चित ही इस बात से उन्हें धक्का पहुंचा होगा। उन्हें अपने गुजरात की याद आई होगी- जो प्रगति के शिखर पर पहुंच चुका है। आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्वकाल में गुजरात में तरक्की के नए आयामों को छुआ। आज की दुनिया में प्रगति की संभावनाएं तकनीक पर आश्रित हो चुकी है। प्रशासन में पारदर्शिता, क्रियान्वयन में शीघ्रता और चुस्ती लाने के लिए तकनीक की सहायता जयरी है। गुजरात ने प्रगति की नई इबारत लिखने में हर दिशा में तकनीक का सहारा लिया। ऐसे में मध्यप्रदेश के पिछड़ेपन के कारण का अंदाजा राज्यपाल को लग गया होगा। अगर उन्होंने अधिकारियों को इस बुनियादी बात की उपेक्षा न करने की सलाह भी दी होगी। इससे राजनीतिक क्षेत्रों में विशेष अर्थ में लेना भी स्वाभाविक है। सभी जानते हैं कि आनंदीबेन पटेल का प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से सीधा संपर्क है। अब प्रदेश की प्रशासनिक स्थिति से पार्टी हाईकमान सीधे जुड़ गया है। प्रशासन का लचरपन छिपाना अब मुश्कि ल होगा। प्रदेश का दुर्भाग्य रहा है कि उसके मुख्यमंत्री जो अपेक्षा करते हैं, जो घोषणाएं करते हे,ं वे नीचे के स्तर पर बस्ता खामोशी में बंद हो जाती है। मुख्यमंत्री के सहयोगी मंत्री योजनाओं के क्रियान्वयन की मॉनीटरिंग कैसे करसकते हें, जबकि उनमें से अधिकांश तो इस तकनीक से नितांत अपरिचित है। जिन विभागों में डिजिटल प्रणाली लागू भी है, उनमें कार्यरत अफसर और बाबू जिस ढंग से काम करते हैं, उससे जनता असंतुष्ट हैं। अनेक तकनीकी कठिनाईयों का बहाना बनाकर काम की रफ्तार को थामने में प्रशासन कुशल हो चुका है। विद्युत कंपनियों के बिलों में प्रापर्टी की रजिस्ट्रियों में या परिवहन कार्यप्रणाली में इन्हीं वजहों से असंतोष उपजता है। राज्यपाल की सक्रियता से जमीनी हकीकत सामने आती जाएगी और सरकार के दावों की वास्तविकता सत्ता के शीर्ष केन्द्रों तक पहुंचेगी।
०-नवदुनिया से साभार
०-लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है।
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