प्रत्याशी चयन में उलझी भाजपा और गांठे सुलणने में जुटे दिग्गी

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०- देवदत्त दुबे
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। देश के जिन चुनिंदा लोकसभा क्षेत्रों में देवासियों की निगाहें होंगी उनमें एक भोपाल लोकसभा क्षेत्र भी होगा, जहां भाजपा प्रत्याशी चयन को लेकर बुझी हुई है वहीं कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह एक-एक करके उन गांठे को सुझलाने में लगे हैं जो उनके प्रति वर्षों से लोग बांधे बैठी है। दरअसल जब जब चुनाव होते हैं तब तब देश में कुछ चुनाव क्षेत्र ऐसे होते हैं जिन पर सबकी निगाहें होती हैं क्योंकि इन क्षेत्रों से या तो कोई बड़ा नेता चुनाव लड़ रहा होता है या फिर विपरीत या अनुकूल परिस्थितियों में कैसे मुकाबला किया जाए। इसको लेकर सबकी निगाहें होती हैं। कई बार प्रधानमंत्री लोकसभा क्षेत्र या किसी फिल्मी स्टार के लोकसभा क्षेत्र पर सर्च करने वाले सक्रिय होते हैं लेकिन चुनाव होते हैं जिन पर रिसर्च की जा सकती है और भोपाल लोकसभा का चुनाव ऐसे ही मोड़ पर पहुंच गया है जहां इस चुनावी दौर में तो यह चर्चित रहेगा ही भविष्य में भी लोग भोपाल का उदाहरण देंगे या राजनीतिक विश्लेषक जिस पर रिसर्च करते रहेंगे। बहरहाल भोपाल लोकसभा सीट पर इस समय मध्यप्रदेश ही नहीं देश में इस बात को लेकर र्चा चल रही है कि कांग्रेसी प्रत्याशी पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ भाजपा किसे मैदान में उतारती है क्योंकि यह सीट जहां भाजपा का गढ़ मानी जाती है वहीं दिग्विजय सिंह के लिए एकदम प्रतिकूल परिस्थिति के लिए हुए लेकिन दिग्विजय सिंह ने जिस तरह से इस चुनौती को स्वीकार करके और कठिन परिश्रम की शुरुआत की है वे तिनका तिनका करके वोट बटोर रहे और जिस सहज लहजे में वे धीरे धीरे अपने चुनाव अभियान को आगेू बढ़ा रहे हैं। इससे ना केवल भाजपा की चिंता बढ़ी है वरन संघ ने भी कमर कस ली है। भाजपा नेता जरूर अपने बयानों में दिग्विजय सिंह को छोटे कार्यकर्ता से चुनाव कराने की बात कर रहे लेकिन वह छोटा कार्यकर्ता पार्टी अब तक भूल नहीं पाई है और खुले मैदान का जिस बखूबी से दिग्विजय सिंह इस्तेमाल कर रहे हैं। भाजपा को बड़ा नेता ही मैदान में उतारना पड़ेगा अन्यथा दिग्गी का दांव भारी पड़ सकता है। भाजपा का अब कोई भी प्रत्याशी मैदान में आए और २३ मई को परिणाम जो भी निकले लेकिन एक बात तय है कि भोपाल का चुनाव राजनीति के विषय में रुचि लेने वालों के लिए रिसर्च का विषय रहेगा क्योंकि जिस तरह से एकदम हारी हुई लड़ाई को दिग्विजय सिंह शांत मन से व्यवस्थित ढंग से लड़ रहे हैं। उसकी उम्मीद बहुत कम लोगों को रही होगी वे एक एक क्षेत्र के महतवपूर्ण व्यक्तियों से इस तरह से मुलाकात कर रहे हैं उसे दिन प्रतिदिन उनका माहौल उन क्षेत्र में भी सुधारने लगा है जहांउनके चाहने वालों की संख्या बहुत सीमित थी। दिग्विजय सिंह को चुनाव में रोकने की मंशा रखने वाले भी समझ गए हैं कि दिग्विजय सिंह अब ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां उन्हें रोकने के लिए अतिरिक्त शक्ति चुनाव में लगानी पड़ेगी। भाजपा और संघ के रणनीतिकार जिस तरह से प्रत्याशी चयन को लेकर उलझ गए हैं उससे भी मामला गंभीर होता जा रहा है। यही कारण है कि प्रत्याशी का इंतजार किए बगैर ही संघ केक समान अनुषांगिक संगठन मैदान में सक्रिय हो गए हैं और मतदाताओं को अभी से वोट डालने के लिए प्रेरित कर रहे हैं क्योंकि वे समझ रहे हैं कि दिग्विजय सिंह समर्थक सुबह से भीषण गर्मी के बावजूद भी लाइन लगाकर वोट डालेंगे क्योंकि लड़ाई दिग्विजय सिंह के लिए जीवन-मरण की है। लड़ाई दिग्विजय सिंह की प्रदेश में भविष्य से बेहतर जमावट के लिए है और राष्ट्रीय स्तर पर यदि खिचड़ी सरकार बनती है तो फिर कोई आश्चर्य नहीं कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार बनकर उभरें। कुल मिलाकर भोपाल लोकसभा सीट के लिए एक तरफ जहां भाजपा प्रत्याशी चयन की गुत्थी सुलझाने में उड़ती जा रही है वहीं दूसरी ओर दिग्विजय सिंह उलझी हुई गठानों को दिन प्रतिदिन सुलझाने में लगे हैं। क्योंकि दिग्गी भी समझ रहे हैं संघ और भाजपा अंतत: उनकी लड़ाई आसान नहीं रहने देगी इसलिए जितने समय तक उन्हें खुला मैदान मिला है। वे अधिकतम समर्थन बटोर लेना चाहते हैं जैसे ही भाजपा प्रत्याशी मैदान में आएगा वैसे ही दिग्गी की राह में पग-पग पर कांटे बिछाए जाएंगे। यदि छोटा चुनाव होता तो दिग्विजय सिंह का मैनेजमेंट अब तक निर्णायक बढ़त दिखा देता लेकिन लोकसभा का इतना विशाल क्षेत्र ओर उस पर भी विपरीत परिस्थितियों, विपरीत माहौल दिग्विजय सिंह के लिए आसान नहीं है। माहौल और मैनेजमेंट के इस महा मुकाबले को अंत में वही जीतेगा जो दोनों क्षेत्रों, माहौल और मैनेजमेंट में बराबरी की पकड़ बना पाएगा। दिग्विजय सिंह को जहां कुछ प्रतिशत वोटों के बाद तिनका तिनका करके वोट की जुगाड़ करना है वहीं भाजपा के लिए केवल मतदाताओं का धु्रवीकरण करा कर थोक वोटरों का अपनी ओर आकर्षित करने का फार्मूला लागू करना है और ऐसे ही किसी प्रत्याशी की पार्टी को तलाश है जो बड़ी संख्या में मतदाताओं को प्रभावित कर सके। जाहिर है भोपाल लोकसभा का चुनाव एक ऐसी प्रयोगशाला के रूप में स्थापित होते जा रहा है जहां हारी हुई बाजी को कैसे जीत जाए या फिर अपनी जीती बाजी को कैसे बचाया जाए। २३ मई को चुनाव परिणाम ही बता पाएगा कि आखिर कौन अपने मकसद में कितना कामयाब रहा।
०-नया इंडिया के कालम ”राजनैतिक गलियारा” से साभार)
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