पातालकोट के सौदे में असली दोषी कौन ?

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। १५ वर्षों की भारतीय जनता पार्टी और १३ वर्षों के शिवराज शासनकाल के दौरान इस प्रदेश में जो कुछ हुआ उसमें पूरे शिवराज के १३ वर्षों के शासनकाल में घोटाले दर घोटाले काफी चर्चाओं में रहे तो वहीं शिवराज सरकार के शासनकाल में शायद ही ऐसा कोई माह या वर्ष रहा हो जिसमें किसी न किसी घोटाले को लेकर शिवराज सरकार सुर्खियों में नहीं रही हो फिर चाहे वह उनके सत्ता की शपथ लेने के कुछ दिनों बाद उनकी धर्मपत्नी श्रीमती साधना सिंह द्वारा अपनी पहचान छुपाकर डम्पर खरीदी का मामला ही क्यों न हो, घोटालों और घपलों का सिलसिला लगता है इसी डम्पर घोटाले की घटना के बाद प्रदेश की नौकरशाही और भाजपा के नेताओं और जनप्रतिनिधियों को जो संदेश शिवराज सरकार के कार्यकाल में जो संकेत दिये गये उससे लगता है कि प्रदेश के नौकरशाहों ने और भाजपा के नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने शिवराज सरकार की नीयत और नीति मानकर जो ध्येय बनाया उसी के कारण शिवराज सरकार के कार्यकाल के १३ वर्षों में घोटालों और घपलों का यह सिलसिला चलता रहा घोटालों और घपलों की बात करें तो शिवराज के १५६ माह के कार्यकाल के दौरान १५६ घोटालों की एक लम्बी फेहरिस्त है जिसमें डम्पर खरीदी से श्रीगणेश हुआ घोटालों का सिलसिला इस तरह से बढ़ा कि भाजपा के नेताओं, अधिकारियों और शिवराज सरकार में बहुचर्चित सत्ता की वह अदृश्य देवी के इशारे पर जो कुछ खेल खेले गये उन सभी मामलों की चर्चा विपक्षी पार्टियों के नेता ही नहीं बल्कि भाजपा के नेता चटकारे लेकर करते नजर आ रहे हैं तो वहीं शिवराज सरकार में अदृश्य सत्ता की देवी की इतनी दहशत थी कि उनकी दहशत के चलते प्रशासनिक अधिकारी को एक झटके में पांचवीं मंजिल से पहली मंजिल पर बैठा दिया जाता था। तो वहीं जिन-जिन राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों ने सत्ता की उस अदृश्य देवी की साधना कर उसको प्रसन्न करने में सफलता हासिल कर लेता था तो वह करोड़ों में खेलता ही था तो शिवराज शासन के नवरत्नों में शामिल हो जाता था इस तरह के कई चर्चे राजनीति से जुड़े नेताओं और भाजपा के नेता चटकारे लेकर चर्चा करते नजर आ रहे हैं। शिवराज सरकार के सत्ता से बेदखल होने के बाद कांग्रेसी सरकार के मुखिया कमलनाथ जिनका नाता छिंदवाड़ा से है और उन्हीं के छिंदवाड़ा के आदिवासी बाहुल्य पातालकोट के ऊपरी हिस्से बीजाढाना की भूमि निजी कम्पनी को सौंपे जाने को लेकर इन दिनों बड़ा बवाल मचा हुआ है तो वहीं इस मामले में प्रमुख पर्यटन सचिव हरिरंजन राव की भूमिका पर संदेह व्यक्त किया जा रहा है। पातालकोट को ११ लाख रुपये में २० साल के लिये निजी कंपनी को सौंपे जाने को लेकर भी यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या हरिरंजन राव इस तरह के सौदे पर बिना किसी के संरक्षण के निर्णय ले सकते हैं, तो वहीं इसके साथ ही इस मामले में भी शिवराज सरकार में जिस अदृश्य सत्ता की देवी के भय से पूरा प्रशासन थर-थर कांपता था, उस स्थिति में हरिरंजन राव क्या अपनी स्वैच्छा से इतना बड़ा निर्णय ले सकते थे यह सवाल भी उठ रहे हैं इस लाख टके का सवाल का जवाब हर कोई खोजने में लगा हुआ है। तो वहीं पाताल कोट के सौदे को लेकर भी अनेक प्रश्न उठ रहे हैं हालांकि पर्यटन के प्रमुख सचिव हरिरंजन राव के द्वारा शिवराज सरकार में पातालकोट अकेले का ही सौदा नहीं किया बल्कि पर्यटन विभाग से जुड़े तमाम होटलों व पर्यटक स्थलों को निजी हाथों में सौंपे जाने की भी चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं और इन्हीं सब सौदों के पीछे हरिरंंजन राव किसके दबाव में इस प्रकार से पर्यटन से जुड़े सम्पत्ति को खुर्द-बुर्द कर रहे थे इसको लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, हालांकि पातालकोट के इस सौदे के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच कराने और पर्यटन विभाग के दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही किये जाने की बात कही है लेकिन कमलनाथ के इस निर्णय को लेकर लोग यह कहते भी नजर आ रहे हैं कि हरिरंजन राव ने किसके दबाव में पर्यटन विभाग में यह खेल खेला उसकी भी जांच कराकर खुलासा होना जरूरी है। पातालकोट के इस सौदे के संबंध में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यटन मंत्री अजय सिंह ने आरोप लगाया है कि शिवराज सरकार में पर्यटन विभाग को मुख्यमंत्री सचिवालय में पदस्थ एक अधिकारी ने बेच दिया। उनका कहना है कि दिग्विजय सरकार में जब वे पर्यटन मंत्री थे तो यह विभाग केवल पर्यटन गतिविधियों को संचालित करता था। पिछली सरकार ने नियमों को तोड-मरोड़कर ऐतिहासिक पर्यटक स्थलों को बेच दिया। सीएम कमलनाथ के गगह जिले छिंदवाड़ा में पातालकोट को बचने का मामला बेहद गंभीर है। इसकी उच्च स्तरीय जांच की जानी चाहिए। कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता केके मिश्रा ने सौदे को भ्रष्टाचार का खेल बताया है। पातालकोट के ऊपरी हिस्से को यूरेका ग्रुप को बेचने में नियम कायदे का उल्लंघन किया गया है। उन्होंने कहा कि विभाग ने महज ११ लाख २० साल के लिए जमीन कैसे बेच दी, यह समझ से परे है। पातालकोट के सौदे का खुलासा होने के बाद अब यह सवाल भी उठ रहे हैं कि शिवराज सरकार में अकेले पातालकोट ही नहीं न जाने कितने पर्यटन विकास निगम से जुड़े होटल और अन्य सम्पत्ति को भी खुर्द-बुर्द किये जाने के मामले घटित हुये होंगे ऐसी संभावना भी व्यक्त की जा रही है तो वहीं यह सवाल भी उठता है कि पातालकोट के साथ-साथ शिवराज सरकार में पर्यटन विकास के नाम पर हुए हर सौदे और निगम के विकास के मामलों की भी जांच कराई जाना चाहिये, क्योंकि ऐसी चर्चाएं हैं कि शिवराज सरकार में अदृश्य सत्ता की देवी के दबाव में पर्यटन विकास की तमाम सम्पत्तियों को उनके चहेती निजी कम्पनियों और निजी व्यक्तियों के हाथों सौंपे जाने का खेल भी खूल खेले जान की चर्चा है।

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