पश्चिमी यूपी में फंस गई भाजपा!

0
12

०-हरिशंकर व्यास
जिन राज्यों में विपक्ष का मजबूत गठबंधन है वहां भाजपा को ज्यादा नुकसान हो रहा है। जैसे उत्तर प्रदेश की आठ सीटों में से छह सीटों पर भाजपा मुश्किल लड़ाई में फंस गई है। गुरुवार को हुए मतदान में सिर्फ दो सीटों गाजियाबाद और गौतम बुद्ध नगर यानी नोएडा में वोटों में मामूली बढ़ोतरी हुई है। बाकी छह सीटों-मुजफ्फरनगर, कैराना, बागपत, सहारनपुर, मेरठ और बिजनौर में वोट कम हुआ है। ये सभी छह सीटें मुस्लिम बहुलता वाली हैं और बहुजन समाज पार्टी के कोर वोट यानी जाटव और रालोद के कोर वोट जाट की मजबूती वाली है। इन सभी आठ सीटों में पिछली बार के मुकाबले दो फीसदी की गिरावट है। शहरी मतदाताओं वाली दो सीओं गाजियाबाद और नोएडा को छोड़ दें तो बाकी छह सीटों पर भाजपा मुश्किल में है। हालांकि यूपी में विपक्ष का महागठबंधन नहीं है और कांग्रेस अलग चुनाव लड़ रही है पर ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस ने विपक्षी गठबंधन को मदद पहुंचाई है। पहले चरण की आठ में से दो सीटों-मुजफ्फरनगर और बागपत में कांग्रेस ने अजित सिंह व जयंत चौधरी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारा था। सो, इन दोनों सीटों पर सीधी लड़ाई थी। मुजफ्फरनगर में २०१३ में दंगे हुए थे। उसके कुछ ही दिन बाद हुए चुनाव में ६९.७४ फीसदी मतदान हुआ था। इस बार उसमें मामूली गिरावट हुई है और ६८.२२ फीसदी रही। मानो डेढ़ फीसदी की गिरावट हुई। यह इस बात का संकेत है कि २०१४ की तरह धु्रवीकरण नहीं है और भाजपा के मतदाताओं में उत्साह नहीं दिखा। यहां मुकाबला भाजपा के संजीव बालियान और सपा, बसपा, रालोद और कांग्रेस के साझा उम्मीदवार चौधरी अजित सिंह के बीच था। इस सीट पर दलित खास कर जाटव और मुस्लिम के पूर्ण समर्थन और बहुसंख्यक जाटों समर्थन से अजित सिंह के लिए एडवांटेज की स्थिति है। अजित सिंह ने अपने परिवार की पारंपरिक सीट बागपत से बेटे जयंत चौधरी को उतारा है, जिनका मुकाबला भाजपा के सत्यपाल सिंह से था। यहां भी २०१४ के ६६.७५ फीसदी के मुकाबले गुरुवार को ६४.२२ फीसदी मतदान हुआ। यह भी जयंत चौधरी के लिए एडवांटेज वाली स्थिति है। भाजपा के लिए कैराना की प्रतिष्ठा वाली सीट पर पिछली बार के मुकाबले छह फीसदी मतदान कम हुआ है। २०१४ में ७३ फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ था, जबकि इस बार ६७ फीसदी से कुछ ज्यादा मतदान हुआ है। ऐन चुनाव से पहले भाजपा ने दिवंगत हुकूम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को टिकट काट कर अपने विधायक प्रदीप कुमार को लड़ाया। यहां भाजपा ने जाट उम्मीदवार हरेंद्र मलिक को खड़ा करके सपा की तबस्सुम बेगम की मदद की, जो उपचुनाव में यहां से जीती थी। इसी तरह सहारनपुर में चार फीसदी मतदान कम हुआ है। वहां भाजपा के राधव लखनपाल के मुकाबले कांग्रेस के इमरान मसूद और बसपा के हाजी फजर्लुरहमान उम्मीदवार थे। इस सीट पर दलित मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है। उनका रूझान फजलुर्रहमान की ओर देख बहुसंख्यक मुस्लिम बसपा के साथ गए हैं। इसलिए वहां वोट बांटने की उम्मीद लगाए बैठी भाजपा को निराशा हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मेरठ से चुनाव अभियान की शुरुआत की थी। वहां पिछली बार लगभग बराबर ही मतदान हुआ है। जबकि बिजनौर सीट पर पिछली बार के मुकाबले मतदान में दो फीसदी से ज्यादा की कमी आई है। २०१४ के चुनाव जैसा ही मतदान होने का नुकसान इन दोनों सीटों पर भाजपा को हो सकता है।
०-नया इंडिया के कालम ”रविवारी गपशप” से साभार)
०००००००००००००

LEAVE A REPLY