निर्धारित समय सीमा में क्यों नहीं चलती सदन की कार्यवाही

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)।भारतीय जनता पार्टी के नेता जो आज सत्ता पर काबिज हैं कल जब दिग्विजय सिंह के शासनकाल में सदन की बैठकों को लेकर तरह-तरह के आरोप लगाया करते थे और यह मांग किया करते थे कि सदन की बैठकें ज्यादा रखी जायें लेकिन मजे की बात यह है कि आज जब इसी प्रदेश में उन्हीं भाजपाई नेताओं की सरकार पिछले १३ सालों से चल रही है और इस दौरान शायद ही ऐसा कोई सत्र होगा जो अपनी पूर्व निर्धारित दिनांकों के अनुसार उनकी बैठकें सम्पन्न हुई हों। भाजपा के कार्यकाल के दौरान ऐसे भी कई मौके आए जब विपक्षी दलों के नेताओं की अपनी स्वयं की सरकार के द्वारा सदन में दिये गये जवाबों को लेकर घेरने का काम किया तो वहीं सरकार द्वारा विधायकों के प्रश्नों के जवाब को लेकर विपक्ष ने तो सवाल खड़े किये ही हैं लेकिन उनका साथ सत्ताधारी दल के नेताओं ने भी लिया भाजपा के शासनकाल के दौरान ऐसा लगता है कि विधानसभा की गरिमा को कई बार ठेस भी लगा है जब विपक्ष के विधायकों के साथ-साथ सत्तारूढ़ विधायकों ने अध्यक्ष के द्वारा विधानसभा की कार्यवाही के संचालन को लेकर सवाल खड़े किये तो कुछ विधायकों ने तो अध्यक्ष के द्वारा उनको कुछ भी बोलने पर बैठ जाने की हिदायत दी तो अध्यक्ष से यह तक कहते सुना गया कि जब हमें बोलने ही नहीं दिया जाता तो हम क्यों सदन में आते हैं? ऐसे अवसर हाल ही के सत्रों की बैठकों के दौरान कई बार सुनने को मिले जब अध्यक्ष द्वारा सख्त रवैया अपनाकर विधायकों को बोलने नहीं दिया गया, तो उन्होंने एकजुट होकर यह आरोप लगाया कि यदि सदन में बोलने का उन्हें अवसर नहीं दिया जाता तो हम काहे के जनप्रतिनिधि हैं और काहे को विधानसभा में आते हैं लेकिन मजे की बात यह है कि इस तरह के आरोप कांग्रेस से ज्यादा भाजपा के विधायकों ने लगाए हैं। तो वहीं भाजपा के शासनकाल में सत्तापक्ष जब भी किसी न किसी मुद्दे को लेकर कटघरे में खड़ा दिखाई देता है और विपक्ष द्वारा हंगामा खड़ा किया जाता है उसका लाभ उठाते हुए कई महत्वपूर्ण विधेयक भी चंद मिनटों में पास हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में उन विधेयकों पर बहस की गुंजाइश ही नहीं रहती हाँ यह जरूर है कि सरकार द्वारा प्रस्तुत विधेयकों पर विधायकों हाँ की जीत या ना की जीत कहकर चंद मिनटों में तो छोडि़ए सेकंडों में महत्वपूर्ण विधेयक पास हो जाते हैं, ऐसा ही कुछ इस सत्र में भी हुआ जो निर्धारित समय से पहले विधानसभा का मानसून सत्र कई सवाल छोड़ गया सदन की कुल दस बैठकें निर्धारित थीं लेकिन आठ ही बैठकें हो पाईं हालांकि इन आठ बैठकों से पूर्व सदन को स्थगित करने की चर्चाएं भी चलती रहीं लेकिन चलो दस में से आठ बैठकें तो सम्पन्न हुईं। इस सत्र में काम कम हंगामा ज्यादा हुआ। महत्वपूर्ण विधेयक बिना चर्चा के ही पारित हो गए। विधायक हंगामे में जुटे रहे और सरकार विधेयक पारित करवाने में। विधायकों के लिए प्रश्नकाल ही ऐसा अवसर होता है, जिसमें वे अपने सवालों के सरकार से सीधे सवाल पूछ सकते हैं। मंत्रियों द्वारा दिए गए जवाब से विधायक संतुष्ट नहीं है तो वे प्रति प्रश्न भी कर सकते हैं। उसी विषय से जुड़े सवाल अन्य विधायक भी पूछ सकते हैं, लेकिन सत्र के आखिरी दिन २६ जुलार्ठ को प्रश्नकाल भी हंगागमे की भेंट चढ़ गया। पूरे सत्र के दौरान आए सवालों की बात की जाए तो विधायकों ने ३२५७ लिखित सवाल पूछे। इसमें तारांकित १७१२ सवाल शामिल किए गए। इन सवालों पर प्रश्नकाल में चर्चा होना थी, लेकिन मात्र ६६ सवालों पर चर्चा हो सकी। १६४६ सवालों पर चर्चा न होना, विधायक चर्चा में रुचि लेते तो सभी सवालों के जवाब मिलते, जो नहीं हो सका। इसी लोक महत्व की छ: सूचनाएं विस सचिवालय को मिलीं।

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