दिग्गी और प्रज्ञा को लेकर हार जीत के अपने-अपने दावे

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की लोकसभा सीट भले ही ३० वर्षों से भाजपा के कब्जे में रही हो लेकिन १५ वर्षों का वनवास भोगने के बाद सत्ता पर काबिज हुई कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं में जो जोश देखने को मिला उस जोश के चलते मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भोपाल संसदीय सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को चुनावी समर में उतारकर इस चुनाव को रोचक बनाने का जो प्रयास किया था उसी के चलते भाजपा ने भी इस संसदीय सीट पर अपने किसी स्थानीय कार्यकर्ता या नेता पर भरोसा न करते हुए साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को चुनावी समर में उतारा उनके प्रत्याशी की घोषणा होने के बाद ही चंद घंटों में यह सीट राष्ट्रीय स्तर पर चर्चाओं में आ गई और लोग यह बयान देने लगे कि भाजपा के पास कोई न तो कोई मुद्दा है और ना पार्टी का विश्वास भोपाल के उन भाजपाई नेताओं पर है जिनकी कार्यशैली के चलते वर्ष १९९८ में प्रदेश भारतीय जनता पार्टी भाजपा-डी (दिग्विजय सिंह) के नाम से जानी जाती थी मजे की बात तो यह है कि जब १९९८ में प्रदेश भाजपा-डी के नाम से चर्चित थी तो उस समय तत्कालीन संगठन मंत्री के रूप में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पास प्रदेश के संगठन महामंत्री की कमान थी, यही वजह है कि १९९८ के विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के पक्ष में माहौल होने के बावजूद भी तत्कालीन भाजपाई नेताओं ने नरेन्द्र मोदी से असहयोग कर प्रदेश में भाजपा की सरकार नहीं बनने दी थी यही वजह है कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने उस समय के भाजपाई नेताओं जिनमें कैलाश सारंग और विक्रम वर्मा जैसे लोग शािमल तो हैं ही तो वही उस समय अपनी युवा राजनीति करने वाले विश्वास सारंग भी अधिकांश समय सीएम हाउस में अधिकांश समय व्यतीत कर अपनी राजनीति चला रहे थे, यही सब वह कारण हैं कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने मध्यप्रदेश के और खासकर भोपाल के उन नेताओं पर भरोसा न कर मालेगांव बम विस्फोट और सुनील जोशी हत्याकांड के बाद देश की राजनीति में चर्चित प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल लोकसभा सीट से चुनावी समर में उतारा, प्रज्ञा ठाकुर के प्रत्याशी घोषित होने के बाद जो उन्होंने बयान मुंबई आतंकी हमले में शहीद हुए पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे को लेकर जो बयान दिया उसकी भत्र्सना पूरे देश में हुई और इसी विरोध के चलते उन्हें अपना बयान तो वापस ले लिया लेकिन चंद दिनों बाबरी मस्जिद के मामले में भी बयान दे डाला इन दोनों बेतुके बयानों के बाद प्रज्ञा ठाकुर अचानक चर्चा में आ गई तो वहीं भाजपा ने प्रज्ञा ठाकुर के बयानों से दूरी बनाकर तो रखी लेकिन उनका असल मकसद भोपाल लोकसभा संसदीय सीट को धु्रवीकरण करने की भाजपा की राजनीति एक तरह से असफल हो गई। इस तरह के धु्रवीकरण करने की कोशिश में भाजपा काफी दिनों से लगी थी लेकिन उनके प्रतिद्वंद्वी के रूप में दिग्जिय सिंह ने भी भाजपा की इस चाल को सफल नहीं होने दिया। हालांकि पार्टी की यह कोशिश रही कि किसी न किसी मुद्दे को लेकर दिग्विजय सिंह के पुराने बयानों को घेरकर इस संसदीय क्षेत्र का धु्रवीकरण करें लेकिन दिग्विजय सिंह की रणनीति के आगे भाजपा अपने इस मंसूबे में सफल नहीं हो पाई दिग्विजय सिंह ने भी यह चुनाव शायद अपनी जीवन का पहला चुनाव लड़ा होगा जिसके लिये इस उम्र में उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी और उनकी रणनीति काफी हद तक सफल होती दिखाई दे रही है। हालांकि इस संसदीय सीट की जीत-हार को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे हैं भाजपा समर्थक लोग सोशल मीडिया से लेकर हर अखबारों तक तरह-तरह के अपने गुणा-भाग लगाकर प्रज्ञा ठाकुर की लाखों की जीत बता रहे हैं तो दिग्विजय सिंह के समर्थकों का अपना गणित है जिसके चलते वह दिग्विजय सिंह की जीत का दावा कर कर रहे हैं, इस हार जीत के चलते दिग्विजय सिंह के चुनावी समर में अड़ंगा पैदा करने वालों के भी नाम उछल रहे हैं तो वहीं कोई सुरेश पचौरी और उनकी टीम का दिग्विजय सिंह को असहयोग करने की चर्चाएं गर्म हैं कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि दिग्विजय सिंह के खिलाफ पीसीसी में बैठे पीसीसी में सुरेश पचौरी के बैठे लोग जिनमें मीडिया प्रभारी शोभा ओझा भी शामिल हैं उनका नाम तक ले रहे हैं और यहां तक कह रहे हैं कि पूरे चुनाव के दौरान जब भी मीडिया ने शोभा ओझा और सुरेश पचौरी से जुड़े लोगों से दिग्विजय सिंह के बारे में कुछ जानकारी चाही तो उनका एक ही जवाब रहता था कि दिग्विजय सिंह के मीडिया प्रभारी माणक भाई से पूछो। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि सुरेश पचौरी से जुड़े जिस पेट्रोल पम्प से दिग्विजय सिंह के यहां से डीजल की पर्ची जाती थी वहां भी उन वाहन में बैठे लोगों को यहां तक कहा जाता था कि दिग्विजय सिंह का प्रचार न करें। तो वहीं दिग्विजय सिंह के चुनाव के दौरान गदर फिल्म से जुड़े मुद्दे से जुड़े लोग भी दिग्विजय सिंह का असहयोग करते नजर आए तो वहीं पीसी शर्मा जैसे लोग अपने आपको प्रबल समर्थक होने का दावा करते हैं के विधानसभा क्षेत्र से यह शिकायतें आई कि कार्यकर्ताओं से पीसी शर्मा ने ठीक से बात नहीं की कहने वाले तो यहाँ तक कह रहे हैं कि कई कार्यर्ताओं ने पीसी शर्मा ने इस बात को लेकर डांटा कि काम तो हम ही कराओगे देखता हूँ कैसे तुम राजनीति करते हो, पीसी शर्मा के इस तरह के व्यवहार से खिन्न हो कई पार्टी से जुड़े कार्यकर्ता घर बैठे रहे और उन्होंने अपने स्तर से काम तो किया लेकिन वह दिग्विजय सिंह की रैलियों में तो नजर आये लेकिन पीसी शर्मा के निर्देश का पालन नहीं किया । मतदान के बाद जो पार्टी की विभिन्न बैठकें दिग्विजय सिंह द्वारा बुलाई गई उनमें पीसी शर्मा के विधानसभा क्षेत्र से गच्चा लगने की भी खबरों से लोगों ने दिग्विजय सिंह को अवगत कराया गुणा-भाग के खेल में कांग्रेसियों और खासकर सुरेश पचौरी से जुड़े लोगों ने चुनावी समर में जो खेल खेला तो वह भी चर्चाओं में हैं तो लोग यहां तक कहते हैं कि अपने आपको राष्ट्रीय स्तर के नेता होने का भ्रम पालने वाले जो सुरेश पचौरी आज तक पार्षद तक का चुनाव जीत पाए और न ही उनकी समर्थक वह शोभा ओझा जो प्रदेश कार्यालय में बैठकर पत्रकारों पर जनसम्पर्क से दबाव बनाने और निजी टीवी चैनलों पर चल रही चर्चाओं में किन पत्रकारों को निजी टीवी पर चलने वाली बहस में उसकी अनुमति मुझसे लें, इस तरह का दबाव बनाने वाली शोभा ओझा भी अपने नेता सुरेश पचौरी की तरह भी राष्ट्रीय नेता होने का भ्रम पाले हुए हैं लेकिन वहभी आज तक पार्षद तक का चुनाव नहीं जीत पाईं कुल मिलाकर शोभा ओझा के बारे में पार्टी के लोग यहां तक कह रहे हैं कि कमलनाथ सरकार के खिलाफ समस्या खड़ी करने का काम शोभा ओझा द्वारा मीडिया को नाराज कर किया जा रहा है। ऐसे कई उदाहरण देते मीडिया के लोग नजर आ रहे हैं। इस सबके बावजूद भी भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर और दिग्विजय सिंह की हार-जीत को लेकर तरह-तरह के अपने-अपने दावो लोग करते नजर आ रहे हैं तो वहीं प्रज्ञा ठाकुर के समर्थन में भाजपा के लोगों की कार्यप्रणाली भी खूब चर्चाओं में हैं तो वहीं दिगिवजय सिंह के साथ सुरेश पचौरी से जुड़े तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं की असहयोग करने की एक लम्बी सूची ली है कांग्रेस के कई कार्यकर्ता नजर आ रहे हैं। तो वहीं अपने-अपने नेता की जीत का दावा करते प्रदेश कार्यालय से लेकर चौक-चौपालों ओर चाय की चुस्की लेते होटलों तक में चर्चा का दौर जारी है। किसकी जीत होगी या किसकी पराजय यह तो २३ मई को ही चुनाव परिणाम से पता चलेगा, लेकिन इसके साथ ही दिग्विजय सिंह के मजबूत किले में सेंध लगाने का प्रयास सुरेश पचौरी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने किया उसकी भी चर्चाएं लोग चटकारे करते नजर आ रहे हैं।

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