तंगबस्ती के बच्चों के सांता आलोक खरे

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०-रूबी सरकार
फिल्मों से हटकर इंदौर शहर की कुछ झुग्गी बस्तियों की ऐसी ही कुछ सच्ची कहानी है, जो किसी के लिए प्रेरणास्त्रोत बन सकती है। हम यहां बात कह रहे हैं झुग्गी बस्ती में पले-बढ़ं पंकज चौरसिया और हेमा माझी की। हेमा ने संगीत में तो पंकज ने सरकारी नौकरी में उच्च पद हासिल कर माता-पिता का नाम रोशन किया और सैंकड़ों बच्चों को सपने देखना सिखाया। इन दोनों को बैंंक अधिकारियों का समाज सेवा प्रकोष्ठ के प्रमुख आलोक खरे और उनके साथियों ने कुछ इस तरह तराशा कि, वे औरों के लिए मिसाल बनकर उभरें। दरअसल, समाज सेवा प्रकोष्ठ बैंक अधिकारियों की एक ऐसी अनौपचारिक संस्था है, जो तंगबस्तियों में रहने वाले निर्धन परिवार के बच्चों के विकास और उन्हें मुख्यधारा से जोडऩे के लिए लगातार वर्षों से काम कर रही है। बैंक अधिकारी संगठन के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता आलोक खरे के नेतृत्व में सेवानिवृत्त बैंक अधिकारियों की पूरी टीम शहरी बच्चों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के लिए आज तक कोई ८५ समग्रे व्यक्तित्व विकास शिविरों के अलावा बालिकाओं के लिए ‘सुरक्षा स्वास्थ्य सम्मान’ विषय पर केंद्रित शिविर जैसे-हस्तशिल्प, नृत्यकला शिविर एवं परीक्षा पूर्व तैयारी शिविरों का आयेाजन भी करती रही है। गर्मियों के स्कूली अवकाश के दिनों में हर वर्ष आठ दिवसीय दो नियमित ‘व्यक्तित्व विकास शिविर’ संचालित होते हैं, जिनमें संगीत, योग, हस्तशिल्प, अनुशासन, कम्प्यूटर, भाषा, रचनात्मक लेखन, भाषण कला, विज्ञान, पर्यावरण, इतिहास, अंग्रेजी, कैरियर मार्गदर्शन, नागरिक दायित्व, पुलिस यातायात, आर्थिक और बैंकिंग विषयों आदि की जानकारी प्रात: सात बजे से चार बजे तक नि:शुल्क दी जाती हैद्य। शिविरों में तीन सौ से साढ़े तीन सौ बच्चे सक्रियता से भाग लेते हैं। नाश्ते आदि का प्रबंध भी किया जाता है। शिविर के दौरान विभिन्न गतिविधियों में श्रेष्ठ बच्चों और विजेताओं को उपहार भी दिया जाता है। शिविर में अपने क्षेत्रों में सफल हस्तियों, प्रतिभाओं का साक्षात्कार शिविरार्थी बच्चों से परिणामस्वरूप करवाया जाता है। नगर की प्रमुख विभूतियों भी प्रतिदिन शिविर में आकर बच्चों और आयोजकों का मनोबल बढ़ाते हैं। वैसे तो शिविर की शुरुआत झुग्गी बस्ती की महिलाओं के साथ हुई थी। शिविर के माध्यम से महिलाओं को समूह बनाने और पैसे का प्रबंधन ठीक से करने का प्रशिक्षण दिया जाता था। जब महिलाओं में आत्मविश्वास पैदा होने लगा और वह आत्मनिर्भर होने लगी, तब समाज सेवा प्रकोष्ठ ने उनके बच्चों के साथ काम करना शुरू किया। इस महत्वपूर्ण गतिविधि में आलोक खरे के साथ सुबोध भौरास्कर, अशोक कापडनिस, ब्रजेश कानूनगो, श्याम पांडेय, आर सी चुग, के एल निहोरे सहित बहुत सारे सेवानिवृत्त बैंक अधिकारियों का सक्रिय सहयोग रहता है। इनके सम्मिलित प्रयासों का ही सुफल है कि गरीब परिवारों से शिविर से निकली अनेक प्रतिभाएं आज समाज में अपने परिवार और स्वयं का नाम रोशन कर रही हैं। अब पिछले तीन वर्षों से तंग बस्ती के बच्चों के लिए २१ दिन का टेबल टेनिस शिविर भी आयोजित किया जाने लगा है। जिनमें से चुने हुए बच्चों को जिला टेबल टेनिस संघ द्वारा वर्ष भर उच्च प्रशिक्षण नि:शुल्क दिया जाता है। इस तरह तंगबस्ती के बच्चे समाज की मुख्यधारा में शामिल होते जा रहे हैं। अब तोहालात यह है कि उनके माता-पिता स्वयं बच्चों को लेकर शिविर में आते हैं। तंगबस्ती के लिए आयोजित किये जाने वाले शिविरों में संचालन की भूमिका निभाने वाले सक्रिय सदस्य साहित्यकार ब्रजेश कानूनगो के हाल ही में प्रकाशित उपन्यास ‘डेबिट क्रेडिट’ में तंबस्ती के बच्चों के शिविरों और उनमें शामिल बच्चों को लेकर कई प्रेरक और मार्मिक कहानियां भी पढ़ी जा सकती हैं। इसमें वे ‘पंकज चौरसिया? भी हैं, जो गरीब बस्ती से निकलकर सफल पायलट बनकर अपने विमान को चेन्नई से हांगकांग तक सफलतापूर्वक उड़ाने लगता है। वह दुबली पतली सी गरीब बालिका भी है, जो ‘हेमा माझी’ के रूप में संगीत सभाओं में जलवा बिखेरकर िकसी सितारा गायक से कम नहीं समझी जाती।

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