जीत-हार का गुणा-भाग बढ़ा रहा उलझन

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०- देवदत्त दुबे
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। इंतजार करना सबसे मुश्किल काम होता है और जब इंतजार देश के भविष्य का हो देश की सरकार बनने का हो तब यह और भी बेचैनी सब्र बढ़ाने वाला होता है। ऐसा ही कुछ समय राजनीतिक गलियारों में गुजर रहा है जहां २३ मई के इंतजार में गुणा भाग जीत हार के लग रहे हैं उतनी ही उलझन भी बढ़ रही है। दरअसल लोकसभा के चुनाव में कार्यक्षेत्र व्यापक होता है लगभग आइ विधानसभा मिलाकर एक लोकसभा बनती है और हर एक विधानसभा के अपने स्थानीय समीकरण भी होते हैं जिसके कारण जहां राष्ट्रीय मुद्दे पूरे लोकसभा में एक साथ प्रभाव बनाते हैं वहीं स्थानीय मुद्दे विधानसभावार समीकरणों की गड़बड़ आते हैं। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव के परिणामों को लेकर जितने भी गुणा भाग लगाए जा रहे हैं उतनी ही उलझने बढ़ती जा रही। बहरहाल मध्यप्रदेश में २१ लोकसभा के चुनाव हो चुके हैं और आठ लोकसभा के १९ मई को वोट पड़ेंगे। जिन २१ लोकसभा क्षेत्रों में मतदान हो चुका है वहां को लेकर हार जीत के अनुमान निरंतर चाय चौपालों से लेकर वल्लभ भवन तक लगाए जा रहे हैं। सबसे ज्यादा लोगों की रुचि भोपाल लोकसभा सीट को लेकर है जहां पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह कांग्रेस प्रत्याशी हैं और भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को मैदान में उतारा था। दो विचारधाराओं की लड़ाई इस चुनाव में बनाने की पूरी कोशिश हुई लेकिन तूफान मतदान होने तक नहीं आ पाया जिसकी उम्मीद लगाई जा रही थी इस समय तीन तरह के अनुमान बनाने वाले लोग मिलते हैं। एक वे जो दिग्विजय सिंह की जीत सुनिश्चित बताते हैं जिसमें हार जीत का अंतर पचास हजार के आसपास बताते हैं। दूसरे लोग हैं जो साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की जीत एक लाख से ऊपर बताते और तीसरे वह लोग हैं जो विधानसभावार समीकरण बताने लगते हैं और आखरी में कहते हैं यह टक्कर वाला चुनाव है और जीत हार बहुत कम मतों से होगी। ऐसे ही अनुमान प्रदेश की अन्य सीटों पर भी लगाए जा रहे हैं क्योंकि दो प्रकार की परिस्थिति चुनाव क्षेत्रों में दिखाई दी जिनमें अधिकांश सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों का विरोध था लेकिन मोदी के नाम पर उन्हें वोट मिल रहा था। दूसरी ओर कांग्रेस में बेहतर प्रत्याशी दिए थे और मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सभी कांग्रेस नेताओं को पार्टी के पक्ष में सक्रिय कर दिया था लेकिन पार्टी का वैसा माहौल नहीं बन पाया जैसा बनना था। प्रदेश में कांग्रेस कीसत्ता होने के कारण भाजपा के कार्यकर्ता जहां चुपचाप काम कर रहे थे। वहीं कांग्रेस के कार्यकर्ता और उनसे भी बढ़कर कांग्रेस के प्रत्याशी अति आत्मविश्वास में चुनाव लड़ रहे थे। जिस तरह से १५ वर्षों के बाद प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई है उससे उत्साहित कांग्रेस के प्रत्याशी यह मानकर चल रहे थेकि उनकी जीत तो होना ही है। इस कारण पार्टी द्वारा जो मदद भेजी गई उसका भी सदुपयोग नहीं हुआ और जितनी मेहनत मैदान में होनी थी वह भी नहीं हो पाई। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन भी ठीक ढंग से नहीं किया और कुछ नहीं था। टिकट न मिलने के कारण नाराज थे और अंदर ही अंदर भाजपा प्रत्याशियों की मदद कर रहे थे। कुल मिलाकर परिस्थितियों, माहौल, और मैनेजमेंट चुनाव में राजनीतिक विश्लेशणों को जहां अनुमान लगाना कठिन हो रहा है, वहीं दोनों ही दलों की समर्थक अपनी-अपनी पुरजोर जीत का भरोसा दिला रहे हैं। यहां तक कि संख्या भी बता देते हैं कि कितने वोटों से हमारा प्रत्याशी जीत रहा है जबकि भाजपा के पक्ष में मोदी इफेक्ट कितना गहरा है और कांग्रेस में कितने वोट पड़े हैं इसका अनुमान लगाना बहुत कठिन है। ऐसे में जीत हार के गुणा भाग में उलझन बढ़ी है उसकी गुत्थी २३ मई को ही खुल पाएगी।
०-नया इंडिया के कालम ”राजनैतिक गलियारा” से साभार)
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