जाति अध्ययन का मतलब दलितों, पिछड़ों से ही क्यों?

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०-दिलीप मंडल
देश के लेफ्ट उदारवादी औरसेकुलर चिंतक, विचारक, एकेडेमिशियन और विश्लेषक पिछले तीन हफ्तों से लोकसभा चुनाव के विश्लेषण में लगे हैं। ये काम यूं तो बाकी विचारधारा वाले भी कर रहे हैं। लेकिन एक बात जो इस तमाम विश्लेषक पिछले तीन हफ्तों से लोकसभा चुनाव के विश्लेषण में लगे हैं। ये काम यूं तो विचारधारा वाले भी कर रहे हैं। लेकिन एक बात जो इन तमाम विश्लेषणों में लगभग कॉमन है, वो ये कि सभी का मानना है कि इस चुनाव में जाति की दीवार टूट गई है, मंडल राजनीति का अंत हो गया है और जनता अब विकास के नाम पर वोट दे रही है। कई समीक्षक ऐसा लिखते हुए अपनी खुशी छिपा नहीं पा रहे हैं। ऐसे विश्लेषक जिनके विश्लेषण मंज जाति एक फैक्टर के तौर पर आती है, उनका मानना है कि यूपी-बिहार की हिंदी पट्टी में, जहां लोकसभा की १२० सीटें हैं, गेर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों ने बड़ी संख्या में बीजेपी का रुख किया और यहां बीजेपी की भारी जीत की यह बड़ी वजह रही। कई लोग ये भी लिख रहे हैं कि दलितों के बीच इस बार बीजेपी का असर बढ़ा है। लेकिन इस बीच एक सामाजिक समूह की कहीं कोई चर्चा नहीं होगी कि उसने किसे वोट दिया और क्यों।
सवर्णों का वोटिंग व्यवहार क्या रहा
वह सामाजिक समूह हिंदू सवर्ण जातियों का है। ऐसा नहीं है कि इन जातियों के वोटिंग के बारे में आंकड़ा नहीं है। जिन आंकड़ों में यादव, जाटव, मुसलमान, गेर-यादव, गेर-जाटव वगैरह का जिक्र है, उन्हीं आंकड़ों में सवर्णों का भी जिक्र है। सवर्णों में बिना जाति ने कहां वोट दिया, इसकी जानकारी उन्हीं शोध संस्थानों में जुटाई है, जिन्होंने बाकी जातियों का आंकड़ा जुटाया है। ये आंकड़ा मतदान के बाद बाहर निकलते मतदाताओं (एक्जिट पोल) से लिया गया है। मिसाल के तौर पर लोकनीति-सीएसडीएस सर्वे के मुताबिक, उत्तरप्रदेश में ८२ प्रतिशत ब्राह्मणों, ८९ प्रतिशत ठाकुरों और ७० फीसदी बनियों ने बीजेपी को वोट दिया। उीस तरह बिहार में ७३ फीसदी और यूपी में ७७ फीसदी सवर्णों ने बीजेपी को वोट डाला। सीएसडीएस का आंकड़ा बताता है कि पूरे देश में ६१ फीसदी सवर्ण इस बार बीजेपी के साथ गए। किसी भी एक समुदाय में बीजेपी को उतना समर्थन नहीं मिला, जितना समर्थन उसे सवर्णों से मिला। ऐसी स्थिति में क्या हमें सवर्णों के वोटिंग व्यवहार के बारे में बात नहीं करनी चाहिए और क्या तमाम राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषणों को दलितों-पिछड़ों तक ही सीमित रखना चाहिए? क्या इस बारे में बात नहीं होनी चाहिए कि जो सवर्ण पहले कांग्रेस के साथ हुआ करते थे, वे अब इतनी बड़ी संख्या में बीजेपी के साथ चले गए। जो लेफ्ट-लिबरल विद्वान बीजेपी को साम्प्रदायिक मानते हैं, क्या उन्हें इस बात का अध्ययन नहीं करना चाहिए कि कौन सा सामाजिक समूह बीजेपी को सबसे ज्यादा सपोर्ट करता है? क्या यह अध्ययन नहीं होना चाहिए कि अब शिक्षा का सबसे ज्यादा पहुंच होने के बावजूद सवर्ण समुदाय उस पार्टी को सबसे ज्यादा समर्थन क्यों कर रहे थे, जिनके उम्मीदवार साक्षी महाराज, प्रज्ञा ठाकुर और गिरिराज सिंह जैसे लोग हैं।
जाति यानी दलित और पिछड़ा
दरअसल भारत की राजनीति में जब भी जाति की बात होती है या विश्लेषण लिखा जाता है कि तो अध्येता की नजर ओबीसी और दलित जातियों पर ही होती है। सिर्फ चुनाव में ही नहीं अन्य मामलों में भी जाति संबंधी अध्ययन का मतलब निचली या मध्यम जातियों से ही होता है। इसलिए हमें सवर्णों के राजनीतिक व्यवहार के बारे में बहुत कम लेख मिलेंगे। आपको यादवों और कुर्मियों के राजनीतिक झगड़े पर लेख मिल जाएंगे, लेकिन यूपी में ठाकुरों और ब्राह्मणों के राजनीतिक संघर्ष के बारे में बहुत कम लिखा मिलेगा। इसी तरह जाटव और नॉन जाटव पर अध्ययन मिल जाएगा, लेकिन राजनीति में कायस्थों को हाशिए पर चले जाने के लेख नहीं मिलेंगे। भारत मेंं समाजशास्त्र का मतलब नीचे की जातियों का अध्ययन बन कर रह गया है। आखिर क्यों भारत में सवर्ण किसी अध्ययन या शोध का, जांच का विषय नहीं है?
कौन तय करता है विषय ?
इस प्रश्न का जवाब इस बात में है कि किसी भी अध्ययन परंपरा में सब्जेक्ट मैटर यानी विषय कौन निर्धारित करता है। स्टडी कौन कर रहा है और स्टडी किसकी हो रही है। सवर्णों के विषय न होने की दो वजहें हो सकती हैं। पहली कि ज्यादातर अध्येयता, शोधकर्ता, प्रोफेसर और उनका शोध या विश्लेषण प्रकाशित करने वाले संपादक आदि सवर्ण हैं और दूसरी वजह यह है कि ये लोग नहीं चाहते कि सवर्णों की, यानी उनके अपने जैसे लोगों की स्टडी की जाए और उन्हें जांच के दायरे में लाया जाए। दरअसल कोई भी सामाजिक समूह खुद को, तब जबकि वह प्रभुत्व की स्थिति में है, जांच का विषय क्यों बनाएगा। वर्चस्व रखने वाली ताकतें ही स्टडी और शोध के विषय तय करती हैं। मिसाल के तौर पर देश के कई विश्वविद्यालयों में दलित स्टडीसेंटर या माइनरिटी स्टडी सेंटर हैं। लेकिनक्या आपने कभी सुना है कि किसी विश्वविद्यालय में ब्राह्मण स्टडी सेंटर या ठाकुर स्टडी सेंटर चल रहा हो? अमेरिकी समाजशास्त्री मार्टिन निकलोस ने कहा था कि अमेरिकी समाजशास्त्री अपनी दृष्टि समाज के निचले तबकों की ओर रखते हैं और यहां भी हो रही गतिविधियों की सूचना ऊपर के लोगों को पहुंचाते हैं। वे कहते हैं कल्पना कीजिए उस स्थिति की जब हजारों की संख्या में प्रशिक्षित समाजशास्त्री समाज के प्रभु वर्ग की आदतों, उनकी समस्याओं, उनके रहस्यों, उनके अवचेतन का नियमित अध्ययन करेंगे और वे रिपोर्टें प्रकाशित होकर आम लोगों तक पहुुंचेगी।
०-सुबह सवेरे के कालम ”प्रसंगवश” से साभार)
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