चुनाव परिणाम के पूर्व भाजपा और कांग्रेस कर रही अपने-अपने दावे

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भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। इस बार के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने वहीं पुरानी गलतियां दोहराई हैं जिसके कारण उसकी लगातार प्रदेश में २००३ से हार हो रही है। ऐसा लगा था कि कांग्रेस इस बार भाजपा की तरह मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी की घोषणा करेगी और उसका बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन होगा। कांग्रेस अपनी गुटबाजी से भी मुक्त होगी। लेकिन सत्ता में आने की इन तीनों शर्तों में से कांग्रेस ने किसी भी शर्त पर अक्षरश: पालन नहीं किया। लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस यदि विधानसभा चुनाव में भाजपा से मुकाबले में बनी हुई तो इसमें उसका कौशल कम और भाजपा सरकार के खिलाफ १५ वर्षों की एंटीइनकमबेंसी फैक्टर की भूमिका अधिक है। इसके बावजूद भी सुनिश्चित रूप से यह कतई नहीं कहा जा सकता है कि कांग्रेस इस बार सत्ता में आ रही है। अच्छे से अच्छे राजनैतिक समीक्षक भी विधानसभा चुनाव के आंकलन की दृष्टि से कांग्रेस और भाजपा की संभावनाओं को पचास-पचास मान रहे हैं। विधानसभा चुनाव के छह माह पहले भाजपा का आत्मविश्वास इस हद तक बढ़ा हुआ था कि नारा दिया गया इस बार भाजपा २०० के पार। इसका तात्पर्य यह था कि भाजपा २०१३ के चुनाव में मिली अपनी १६५ सीटों की संख्या को बढ़ाएगी और कांग्रेस की सीटों की संख्या ५८ में से घटेगी। कांग्रेस जब प्रदेश में सत्ता में आने की बात करती थी तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का कटाक्षपूर्ण जवाब रहता था कि कांग्रेस दिन में सपने देखना बंद करे। लेकिन सरकार के खिलाफ एंटीइनकमबेंसी के कारण कांग्रेस तमाम आत्मघाती प्रयासों के बाद भी मुकाबले में वापिस आ गई। चुनाव के एक सकाल पहले से सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ताल ठोककर कह रहे थे कि इस बार कांग्रेस मुख्यमंत्री पद के लिए अपना चेहरा अवश्य घोषित करेगी। कई साक्षात्कारों में उन्होंने स्वीकार किया था कि चुनाव में चेहरे से फर्क पड़ता है। मतदाता को यह मालूम होना चाहिए कि मुख्यमंत्री पद के लिए वह किसी चुन रहा है। श्री सिंधिया ने स्वीकार किया था कि भाजपा को शिवराज सिंह के चेेहरे से फायदा मिला था। क्योंकि कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद के लिए किसी के नाम की घोषणा नहीं की थी। लेकिन सिंधिया के अलावा कांग्रेस के अन्य नेता चाहे वह कमलनाथ हों, दिग्विजय सिंह हों, अजय सिंह हों या अरुण यादव, चेहरे के नाम पर उनका एक ही जवाब रहता था कि इसका फैसला पार्टी आलाकमान अर्थात सोनिया गांधी और गांधी करेंगे। सिंधिया भले ही चेहरा घोषित करने को पार्टी के लिए लाभदायक मानते रहे। लेकिन अन्य नेताओं का ऑफ दी रिकॉर्ड कहना था कि चेहरा घोषित होने से कांग्रेस आलाकमान ने यदि चेहरा घोषित कर चुनाव लडऩे का निर्णय लिया तो बाजी ज्योतिरादित्य सिंधिया के पक्ष में जा सकती है। इसलिए चेहरा घोषित करने का उन्होंने लगातार विरोध यिका और पार्टी आलोकमान की इतनी हिम्मत नहीं हुई कि प्रदेश के इन नेताओं की बातों में दरकिनार कर चेहरा घोषित करे। सिंधिया सहित अन्य नेताओं ने माना कि प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के खड़ा होने से कांग्रेस को नुकसान पहुंचता है। क्योंकि अमूमन कांग्रेस और बसपा के परम्परागत मत एक जैसे होते हैं और इन मतों का बंटवारा होने से कांग्रेस को नुकसान होता है। पिछले चुनाव में भाजपा को प्रदेश में ४४.८ प्रतिशत मत हासिल हुए थे। जबकि कांग्रेस को ३७.७ प्रतिशत और बहुजन समाज पार्टी को ७.५ प्रतिशत से अधिक मत मिले थे। यदि इन दोनों मतों को जोड़ दें तो कांग्रेस और भाजपा के मतों का प्रतिशत लगभग बराबर हो जाता है। वर्तमान में जब कांग्रेस और भाजपा के मतों में महज एक प्रतिशत का अंतर ही दिख रहा है। ऐसे में बसपा और कांग्रेस की एकता कारगार सािबत हो सकती है। लेकिन अपने-अपने अहंकार से टकराव के कारण कांग्रेस और बसपा केे बीच विधानसभा चुनाव में गठबंधन नहीं हो सका और इसका कांग्रेस को नुकसान होना साफ प्रतीत हो रहा है। शिवपुरी जिले की बात करें तो यहां कांग्रेस और बसपा के बीच करैरा और पोहरी विधानसभा क्षेत्र में नम्बर एक और दो की लड़ाई चलरही है। यह टकराहट इतनी धनी है कि इससे यह भी आश्ंाका प्रतीत हो रही है कि दोनों की लड़ाई में कहीं भाजपा बाजी न मार ले जाए। इतनी तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद भी कांग्रेस महज जनभावनाओं के कारण मुकाबले में बनी हुई है और इन जनसभाओं ने भाजपा के इस नारे को अबकी बार २०० पार की हवा निकिाल दी है। मुख्यमंत्री, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सहित कई वरिष्ठ नेता अब २०० पार की बात नहीं कर रहे। वह २०१३ के अपने पिछले आंकड़े तक पहुंचाने की बात भी नहीं कर रहे बल्कि हक रहे हैं कि भले ही कम अंतर से बने लेकिन सरकार भाजपा की बनेगी। इससे स्पष्ट है कि प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के बीच बराबर की टक्कर बनी हुई है। कांग्रेस अपनी पिछली गलतियों को दोहराने के बाद भी यदि मुकाबले में बनी है तो इसका एकमात्र कारण प्रदेश सरकार के खिलाफ एंटीइनकमबेंसी है लेकिन यह भी निष्कर्ष है कि कांग्रेस अपनी पिछली भूलों से सबक लेती तो बाजी इस बार सुनिश्चित रूप से उसके हाथों में होती।

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