चुनाव, नेता और पत्रकार

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०-रविश कुमार
उत्तर प्रदेश वाले परेशान हैं। जिधर देखते हैं उधर दिल्ली से आए पत्रकार मिल जाते हैं। लोग अपना काम नहीं कर पा रहे हैं। लोगों को लगता है कि पत्रकार खबर खोज रहे हैं। पता चलता है कि दिल्ली से आकर लहर खोज रहे हैं। लहर खोज कर दिल्ली चले जाएंगे। वहां जाकर ट्विट करेंगे। गांव के लोग एसक तरफ से पत्रकारों को निपटाते हैं तो दूसरी तरफ से रिसर्चर आ जाते हैं। गांव के कुछ लोग अचानक दिल्ली और न्यूयार्क से कनेक्ट हो गए हैं। उन्हें लगता है कि भारतीय लोकतंत्र का सोर्स अगर कहीं फे क पड़ा है तो गांव में है। चाय की दुकान पर सारे सोर्स बैठ गए हैं। बीच में बैठे पत्रकार का फोटो लिया जा रहा है। दिल्ली ट्विट हो रहा है। कंफ र्म हो गया है कि ये मतदाता हैं। लेकिन सेम्पल टेस्ट बाकी है। नाम से शुरू होकर बात टाइटल पर खत्म होती है। यादव को गठबंधन का समझ था मगर भाजपा ाि निकल गया है। मिश्रा जी समाजवादी हो गए हैं। पत्रकार को लगता था कि राष्ट्रवादी होंगै। मौर्या और कुश्वाहा का पता करने का नया चलन है। इनका देखो किधर वोट करेंगे। क्या सोच रहे हैं। क्या बाल्मीकि जाटव के साथ जाएंगे, क्या कुशवाहा कुर्मी के साथ जाएंगे। कोई कहीं नहीं जा रहा है। सब वहीं चाय की दुकान पर बैठे हैं। टेंशन में हैं कि बिल कौन भरेगा। चर्चा का स्क्रीन शाट लिया जा चुका है। अब तो बचने का भी स्कोप नहीं कि हम ठीहे पर ही नहीं थे। चाय वाला तंग आ चुका है। दिल्ली से बबुनी आई है। गर्मी में आंचल सर पर है। बाबू की आंखों में चश्मा फ्लैश कर रहा है। अचानक से उसकी दुकान पर गोगा जासूस की टीम के दो कारकुन नजर आने लगे हैं। करें तो क्या करें। उत्तरप्रदेश परेशान है। पत्रकार परेशान प्रदेश को लेकर परेशान हैं। परेशान परेशान को लेकर परेशान है। तभी जीएसटी से बर्बाद एक व्यापारी भारत माता की जय चिल्लाता है। जीएसटी के बाद काला धन समाप्त हो गया है। जी आपको कितना समाप्त हुआ। व्यापारी कहता है कि हमें बदनाम कर दिया गया। हम तो ईमानदारी की कमाई खाते थे। जीएसटी ने हमें चोर बना दिया। पत्रकार उत्साहित होता है। ये ऊपर से प्रो मोदी है मगर भीतर से एंटी मोदी हो गया है। व्यापारी समझने में लगा है कि पत्रकार को प्रो मोदी है या एंटी मोदी है। वह दोनों बातें बोलकर चला जाता है। पत्रकार का नोट्स गिजबिज हो जाता है। लू चल रही है। पत्रकार गांव में जाता है। तालाब के किनारे। जहां सारे पॉलिथिन के पैकट एक साथ रहते हैं। बड़े पैकटें के बीच गुटखा का पाउच भी सेफ फील कर रहा है। चार लोग बैठे स्वच्छता की बातें कर रहे हैं। कम से कम चर्चा तो की। शौचालय तो बनाया। भले चल नहीं रहा मगर शौचालय खड़ा तो है। मुखिया जी ले लिए कुछ पैसे। लेकिन बाकी तो दिए। पत्रकार समझ नहीं पा रहा है। मोदी की तारीफ कर रहा है या ख्ंिाचाई। उसे सिर्फ एक ही बात जाननी है। मोदी या गठबंधन। गांव के लोग कई बातें बताना चाहते हैं। पत्रकार दो में से एक ही सुनना चाहता है। उसे दिल्ली में सबसे पहले ट्विट करना है। मतदाता के पास अपनी एक्स रे मशीन है। पत्रकार के पास एमआरआई मशीन है। दोनों एक दूसरे का टेस्ट कर रहे हैं। चैनल का नाम सुनकर लोगों ने गला खखार लिया है। अपना पैंतरा बदल लिया है। मतदाता कोई सिग्नल ही नहीं देता है। मतदाता डरा हुआ है। पत्रकार सहमा हुआ है। बातचीत शुरू होती है। पता नहीं कौन क्या निकल जाएगा। मतदाता टेंशन में है कि पत्रकार कोर्ठ मोदी भक्त है या गठबंधन का। दोनों एक दूसरे के बिहेवियर का परीक्षण करते हैं। बाहर से आंतरिक परीक्षा चालू है। लगता है ये मोदी भक्त है। चलो इतना तो कन्फर्म हो गया है मगर बोल क्यों नहीं रहा है। बोलने के लिए ही तो मोदी भक्त बना था। दूसरे की बोलती बंद करने के लिए मोदी भक्त बना था। अब क्यों नहीं बोल रहा है। २०१४ में तो खूब बोल रहा था। २०१९ में क्या हो गया है। पत्रकार सोचने लगता है। यार, ये लग तो रहा है कि मोदी भक्त है। कहीं हम उसे एंटी मोदी तो नहीं लग रहे हैं। क्या पता इसी से चुप हो। कुछ न्यूट्रल पूछते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा का सेम्पल निकालता है। अब तो बोलेगा ही। क्या आप पुलवामा अटेक के बाद भारत के अटैक से खुश हैं। सवाल फेंक कर पत्रकार मतदाता के फटने का इंतजार करता है। हां बोलेगा तो भक्त और ना बोलेगा तो गठबंधन। मतदाता फटा ही नहीं। बोलता है कि बाबू हम पुलवामा पर मोदी के साथ हैं मगर यूपी में मायावती के साथ हैं। व्हाट! आप पुलवामा पर मोदी के साथ्ज्ञ मगर यूपी में माया के साथ। क्या मतलब हुआ इसका। अंडरकरेन्ट बोलते हैं इसे दिल्ली से आए बाबू जी। आप लहर खोजने आए थे। हम आपको अंडरकरंट बता रहे हैं। पत्रकार टेंशन में है। लहर खोजने आया था। अंडरकरंट मिल रहा है। तभी मोदी-मोदी करती हुए एक जीप गुजरती है। आज शाम अमित शाह की रैली होने वाली है। दिल्ली से आया पत्रकार ट्विट करता है कि राहुल गांधी सो रहे हैं। अखिलेश यादव खो गए हैं। मायावती मिल नहीं रही है। चुनाव सिर्फ मोदी लड़ रहे हैं। पत्रकार इंतजार नहीं कर सकता है। वह यूपी से आया है दिल्ली जाकर ट्विट करने के लिए। लखनऊ एयरपोर्ट। पत्रकार ट्विट करता है। यूपी में गठबंधन की चर्चा तो है मगर जमीन पर भाजपा है। ट्विट करने के बाद पत्रकार की दूसरी परेशानी शुरू हो जाती है। लाइक्स और री-ट्विट मिलने लगता है। कम आया है। लगता है कि सोशल मीडिया से मोदी लहर मिट गई है। फिर वो नम्बर ट्विट करता है। गठबंधन-४०, भाजपा-३५, कांग्रेस-पाँच, बस उसका सारा टेंशन निकल गया है। आज उसे हजवाई जहाज की सीट के बगल में एक महिला मिलती है। कहती है कि वह तो प्रियंका को वोट देंगी। फिर वो ट्विट करता है कि प्रियंका को कोई कम न आंके। लेकिन एयरपोर्ट से बाहर आते ही ओला वाला बोलता है कि हम जौनपुर से हैं। मोदी जी आ रहे हेँ। पत्रकार फिर ट्विट करता है मोदी ही आ रहे हैं। दिल्ली से जाने वाले पत्रकारों पर स्टोरी का दबाव नहीं होता है। नम्बर और लहर बनाने का दबाव होता है। नहीं बोलो तो लोग कोने से खींच कर ले जाते हैं। मुझे सिर्फ बता दो। लेकिन बताने से हपले अपना बता देते हैं। उन्होंने दिल्ली से ही यूपी का नंबर बता दिया है। अब दूसरा टेंशन। इससे मैच करता हुआ कुछ बोल दे या अपना वाला बोलने का रिस्क ले। पत्रकार बहुत परेशान है। उसे प्रासंगिक होना है। प्रासंगिक होने के लिए लहर बताना हे। सही सही नंबर बताना है।
०-लेखक एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार हैं ०-(नया इंडिया से साभार)
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