चुनाव अब प्रतिस्पर्धा का नहीं, युद्ध का स्वरूप ले चुका है!

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०-विजय तिवारी
भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से लोकसभा चुनाव लड़ा है, उससे कुछ बातें स्पष्ट हो जाती हैं। पहले की भांति अब यह भिन्न-भिन्न राजनीतिक दलों में एक निष्पक्ष एम्पायर की निगरानी में कुछ नियमेां के तहत होने वाले प्रतियोगिता नहीं रह गई है! अब यह युद्ध की भांति येन-केन-प्रकारेण विजय प्राप्त करने का लक्ष्य हो गया है! मात्र इस तरीके ने ही लोकतंत्र की आत्मा को खत्म कर दिया है! क्योंकि जब प्रतियोगियों को समान अवसर और साधन नहीं होंगे, तब किस प्रकार इसे प्रतियोगिता माना जा सकता है? अब अगर हम इस चुनावी प्रतिस्पर्धा के एम्पायर की भूमिका पर विचार करें तो पाएंगे कि रेड कार्ड प्रभावी रूप से सिर्फ और सिर्फ गैर बीजेपी दलों के ही प्रत्याशियों को दिखाया जाता रहा! भले ही कितना बड़ा फाउल बीजेपी की ओर से हुआ हो उसको चुनाव आयोग ने नजरअंदाज कर दिया। राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने अपने पुत्र के चुनाव प्रचार में जिस प्रकार बीजेपी को जिताने और मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का सार्वजनिक बयान दिया वह संवैधानिक पद पर आसीन लोगों द्वारा राजनीतिक दल का खुलेआम समर्थन उन्हें अपने पद पर बने रहने से डिक्वालीफाई करता है। परंतु आयोग से शिकायत किए जाने पर मामले को केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास जांच के लिए भेज दिया गया जिस पर चुनाव सम्पन्न और आचार संहिता के प्रभावशील हो जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई! अब यह है चुनाव आयोग की ईमानदारी! खैर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में मतदाताओं का कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए कहा कि चुनाव में अंकगणित ही निर्णायक होता है पर इस बार कैमेस्ट्री ने अंकगणित को हरा दिया! सार्वजनिक रूप से तो उनका इशारा जाति, समाज और धर्म के आधार पर थोकबंद वोटों की राजनीति को असफल कर दिया उनकी पार्टी की रणनीति ने! अब यह कथन कई अर्थों में परिभाषित हुआ है जिसमें ईवीएम पर व्यक्त संदेेह भी है। हालांकि अमित शाह का यह कहना भी सही है कि इसी ईवीएम से कांग्रेस जब छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में जीती तब तो इन मशीनों पर संदेह व्यक्त नहीं किया गया! टीवी चैनलों पर एक प्रतिभागी ने कहा था कि लोकसभा जीतने के लिए बीजेपी ने अपने तीन राज्या सरकारों की बलि दे दी जिससे मशीन की स्पष्टता पर शंका जाहिर न की जा सके। अब इन तीन राज्यों में जिस प्रकार की छिछलती जीत मिली है वह इस संकेत को सिद्ध करता है। वरना पाँच माह बाद इन्हीं राज्यों में कांग्रेस को मात्र दो सीट मिली! इस असफलता को कैसे नापा जा सकता है? इसके दो कारण हैं, पहला खुद नरेंद्र मोदी! सात चरणों में चुनाव कराने के आयोग केे फैसले में उन्हें दो माह तक देश में तूफानी दौरा करके माहौल् बन ाया। माहौल् बनाने के लिए साम-दंड-भेद आदि सभी हथकंडों का उपयोग किया गया। कलकत्ता में ईश्वरचंद्र विद्यासागर कॉलेज में उकनी मूर्ति के बस्ट को तोड़ा जाना, जब अमित शाह का रोड शो निकल रहा था, चेनलों पर उस समय के वीडियो में यह साफ तौर पर देखा जा सकता है। परंतु रोड शो के नाम पर शिव बारात और उनके गणों की जुलूस में मौज्ूदगी इसे राजनीतिक से धार्मिक आयोजन बना दिया था। जबकि चुनाव प्रचार में धर्म और मतों का नाम लेने पर अयोग्यता साबित होती है! परंतु आयोग ने क्लीनचिट देकर बीजेपी की लाजा रख ली। हां, एक मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भगवाधारी यागी आदित्यनाथ के मुंह पर भी ७२ घंटे के लिए ताला जड़ दिया था, बस। हालांकि रामपुर की मुस्लिम बाहुल लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी की हीरोइन उम्मीदवार जयाप्रदा लाख आरोपों और बेचरावाद की अपील के बावजूद आजम खान से हार गई! अब मुख्य मुद्दे पर बात करते हैं। राजनीति में वंशवाद, जिसकी भीषण भत्र्सना मोदीजी ने अपनी संभाओं में की है! देश-दुनिया का इतिहास सिर्फ राजवंशों और सम्राटों के वंशों के युद्ध और वंशों के उत्थान और पतन की ही कहानी ही तो है। फिर चाहे वह राजा रामचंद्रजी की हो या कृष्ण की हो, नन्द वंश के नाश की हो या मौर्य वंश के उद्धव की! इसी वंशानुगत राजनीति का परिणाम ही देवानामप्रिय अशोक हो अथवा मकदुनिया का विश्व विजेता एलेकजेंडर या सिकंदर हो, जिसने इतिहास में सिंधु औरे सतलुजज के मध्य में बसने वालों को इतिहास में नई पहचान दी ‘हिन्दू’! जिसे बाद में बीसवीं सदी में कुछ संगठनों ने वेदिक धर्म और सनातन परंपरा का पर्याय बना दिया! आज भी कश्मीर से कन्या कुमारी तक इस शब्द को धर्म बना दिया है। भले ही इस धर्म का उल्लेख हमारे वेदों या पुराणों में नहीं हो। परंतु चुनाव के समय वैदिक धर्म मानने वालों की तो राजनीतिक ताकतें इसी हिन्दू धर्म का ब्रह्मास्त्र का उपयोग, समाज कोा विभाजित करने के लिए होता है! राजनीतिक रूप से १९५२ से २०१४ तक देश में हुए चुनावों में दलबदल के लिए सरकारी पार्टी साम, दाम और दंड के साथ भेद का प्रयोग उपलब्धि के यप में कर रही है, यह वाकई दुखद और लोकतंत्र के लिए खतरा है। अप्रत्याशित चुनाव परिणामों का कारण जो भी हो परंतु समाज में सवाल पूछने वाला वर्ग आज भी इस द्वंद्व युद्ध में कुछ पौराणिक संदर्भों की याद दिलाता है बाली और सुग्रीव का तथा दुर्योधन और भीम के गदा युद्ध का! एक में मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने तथा दूसरे में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने युद्ध की मर्यादाओं को भंग किया था! इसलिए लोकसभा निर्वाचन में पूर्ण नियमों और मर्यादाओं की आचार संहिता का पालन किया गया होगा, ऐसा विचार करना भी व्यर्थ है! परंतु ऐसी अनेक घटनाएं हमारे धर्म गं्रथों में हैं जो एक पक्ष देव और मानवों के लिए मर्यादाओं को भंग किए जाने का उदाहरण है! सर्व प्रथम है अमृत मंथन की उपलब्धि को समान रूप से दोनों पक्षों में वितरित किए जाने का आश्वासन त्रिदेवों की ओर से दिया गया था। परंतु हम सभी जानते हैं कि अमृत के वितरण में कितनी निष्पक्षता से मर्यादा निभाई गई। खैर उस युद्ध के बाद भी देवता इंद्रपुरी का सुख भोग हमेशा के लिए नहीं कर पाये। बार-बार दैत्यों और राक्षकों द्वारा तपस्या करना ब्रह्मा, विष्णु और देवााधिदेव शिव को प्रसन्न किया गया और फिर देव और मनुज उनके कोप का शिकार हुए। अनादिकाल से आर्य आशीवा्रद रहा है, सौ वर्षों तक जीवन का भोग करो और सौ संतानों के पालक बने! मानव इतिहास में राजवंशों का उत्थान और पतन होता रहा है। इसलिए अगर आज एक वर्ग भारत की राजनीति में वंशवाद को एक अयोग्यता मानता है तो यह उसकी समझ पर प्रश्न चिन्ह है। क्योंकि राजनीतिक हो अथवा व्यापार में लगा परिवार अपनी विरासत आगे की पीढ़ी, को सौंपने की इच्छा रखता है। कहते हैं दुष्यन्त और शकुंतला के पुत्र महाराज भरत ने राजगद्दी देने में योग्यता को विरासत और पुत्र से बेहतर मानते हुए राजगद्दी परिवार के बाहर सौंपी थी। इस संदर्भ में कोई अन्य उदाहरण नहीं पाता हूँ। तब कैसे कोई भारतीय समाज में वंशवाद का विरोध कर सकता है! आज जब डॉक्टर और वकील माता-पिता अपने कौशल को अपने परिवार में बनाए रखना चाहते हैं, तब राजनीति में यह परंपरा गाली कैसे हो गई? बड़े-बड़े औद्योगिक घराने भी विरासत के उदाहरण है। तब यह कहना कि राजनीति में वंशवाद उचित नहीं है मेरी समझ से उचित नहीं। यचदि केाई इसको तर्क और तथ्यों से गलत बता सके तब मैं आभारी होऊंगा!
०-नया इंडिया के कालम ”आईना” से साभार)
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