चुनावी-राजनीति के कारोबार में सेना का उपयोग गैरवाजिब

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०-उमेश त्रिवेदी
डेढ़ सौ सेनाधिकारियों द्वारा राष्ट्रपति केा लिखी चिट्टी से दो-तीन अधिकारियों के अलग हो जाने के मायने यह नहीं हैं कि सेना के राजनीतिकरण का मुद्दा गौरतलब नहीं रहा है। इसको हलके में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि ‘राजनीति में सेना का उपयोग’ या ‘सेना मे राजनीति का हस्तक्षेपÓ लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। डेढ़ सौ सेनाधिकारियों के दस्तखत के साथ राष्टपति को संबोधित पत्र में व्यक्त चिंता संविधान की उस इबारत को कुदेर रही है, जिसकी बदौलत आज हम भारतीय गणतंत्र को लेकर गौरवान्वित महसूस करते हैं। मात्र दो-तीन अधिकारियों ने पत्र से संबद्ध होने से इनकार किया है। राष्ट्रपति-भवन के सूत्रों का कहना है कि उसे ऐसी कोई चि_ी नहीं मिली है। कांग्रेस, सपा, बसपा या वामपंथी दलों के आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन भाजपा के ही कई वरिष्ठ नेता मुतमईन नहीं हैं जो कि कुछ भी हो रहा है, वह पूरी तरह से सही अथवा लोकतंत्र की मर्यादाताओं के पुष्ट करने वाला है। भाजपा के सूत्रधारों में पहली पायदान पर खड़े वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी ने आपातकाल की चालीसवीं सालगिरह पर कहा था कि देश में आपातकाल को अंजाम देने वाले तत्व और परिस्थितियां अभी भी कायम हैं। देश का लोकतंत्र अभी पूरी तरह निरापद नहीं हुआ है। कुछ दिन पहले भी अपने ब्लॉग में आडवाणी ने इन्हीं मनोभावों को दोहराते हुए कहा था कि भाजपा से असहमत लोग देशद्रोही नहीं हैं। उन्हें राष्ट्र-विरोधी मानना गलत राजनीतिक परम्परा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रणनीति आडवाणी की धारणाओं के एकदम विपरीत है। वो समूचे विपक्ष की राजनीति को राष्ट्रविरोध की सूली पर टांग कर हलाल करना चाहते हैं। मोदी से जुड़े राजनीतिक घटनाक्रमों का खतरनाक पहलू यह है कि वो अपने भक्तों के अलावा उनके खिलाफ मत व्यक्त करने अथवा उनकी कार्य-प्रणाली पर सवाल उठाने वाले सभी लोगों को राष्ट्र-विरोधी या सेना का विरोधी निरूपित करना चाहते हैं। पूर्व सेनाधिकारियों की चिंता का सबब भी यही है कि सेना को राजनीतिक का इंस्ट्रूमेंट बनाया जा रहा है। इनमें तीनों पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिल एल रामदास, एडमिरल अरुण प्रकाश, एडमिरल मेहता और एडमिरल विष्णु भागवत भी शरीक हैं। इन लोगों ने राष्ट्रपति से अपील की है कि वो सुनिश्चित करें कि सैन्य-बलों का धर्म-निरपेक्ष और अराजनैतिक स्वरूप सुरक्षित रहे। राष्ट्रपति सभी दलों को निर्देश दें कि वो अपने राजनीतिक कारोबार में लाभ कमाने की गरज से सेना, सेना की वर्दी, या चिन्ह या सैन्य-संरचनाओं का इस्तेमाल नहीं करें। सेनाधिकारियों के पत्र के मामले मेें राष्ट्रपति भवन अथवा सेनाधिकारियों के ये खंडन-मंडलन उन तकनीकी औपचारिकताओं का सबब है, जो लोकसभा चुनाव में होने वाले राजनीतिक नफे-नुकसान के मद्देनजर सत्तारूढ़ भाजपा के लिए जरूरी है। यह पत्र मोदी-सरकार के कार्यकलापों से उत्पन्न उन सवालों को गहरा रहा है कि क्या भारत का लोकतंत्र एक निरंकुश शासन-व्यवस्था की ओर अग्रसर है? संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण की शिकायतें किसी से छिपी नहीं हैं। इसके कई उदाहरण मौजूद हैं। इस श्रृंखला मेंसबसे पहले सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने मीडिया के सामने सर्वोच्च न्यायालय की स्वायत्ता को लेकर आवाज उठाई थी। केन्द्र-सरकार और न्यायपालिका के बीच कई सवाल अभी भी अनसुलझे हैं। लोकसभा के निर्वाचन में भारत के चुनाव-आयोग की भूमिका को लोग समाधान-कारक नहीं मानते हैं। लोकपाल की विलंबित नियुक्ति का मसला भी मोदी-सरकार की मंशाओं का खुलासा करने का गंभीर उदाहरण है। समस्या यह है कि खुद प्रधानमंत्री सचिवालय निरंकुशता की ओर मुखातिब इन गतिविधियों का मार्गदर्शक बना हुआ है। प्रधानमंत्री के भाषणों में स्पश्ट प्रतिपादित होता है कि लोकतंत्र की मर्यादाएं उने लिए गौण हैं। सेना के कवच में विपक्ष के हमलों का मुकाबला करने की रणनीति यदि उनके लिए फायदेमंद हैं, तो वो उसका अनुसरण करते रहेंगे। कानून-कायदों को ताक में रख कर नमो टीवी के गैर-वाजिब प्रसारण में प्रधानमंत्री सचिवालय की निरंकुश लिप्तता देश के लोकतांत्रिक इतिहास में अनहोनी का अध्याय लिख रही है। प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी बेफिक्र होकर आचार-संहिता के कायदों की खिल्ली उड़ा रहे ळैं। यह कहावत चरितार्थ हो रही है कि ‘सैंया भये कोतवाल, अब डकर काहे का…।.
०-सुबह सवेरे के कालम ”पहली बात” से साभार)
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