गुजरात के ‘गुल को मप्र में ‘गुलजार करने में भिड़ी कांग्रेस

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०- अरुण पटेल

डेढ़ दशक बाद सत्ता में वापसी का सपना कांग्रेस की आंखों में लंबे समय से तैरता उतराता रहा है। इस बार कांग्रेस ने चुनाव लडऩे की जो रणनीति बनाई है उसमें वह गुजरात के चुनावी फॉर्मूले की प्रयोगशाला के सहारे अपना सपना साकार करने के बारे में सोच रही है। जिस प्रकार से गुजरात में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और पिछड़ा वर्ग के अल्पेश ठाकोर की त्रिमूर्ति के सहारे कांग्रेस ने भाजपा को दहाई का आंकड़ा पार नहीं करने दिया था और अपनी स्थिति काफी मजबूत बना ली थी उसी फार्मूले को मप्र में अपनाने जा रही है। देखने की बात यही होगी कि गुजरात के गुल मध्य प्रदेश में कैसे और कितने खिलेगें तथा कांग्रेस अपने अरमानों की डोली मंत्रालय वल्लभ भवन तक पहुंचा पाएंगी या नहीं? कांग्रेस हार्दिक, जिग्नेश और अल्पेश की सामूहिक शक्ति को यदि औषधि की भाषा में कहा जाए तो जो ‘त्रिफला रसायन बनाने जा रही है उससे उसकी सेहत कितनी सुधरेगी और वह संजीवनी का काम कर पाएगी या नहीं? यह तो चुनाव नतीजों से ही पता चलेगा, लेकिन गुजरात की जिस तर्ज पर कांग्रेस अमल करती दिख रही है उसमें इस ‘त्रिफला को पंचारिष्ट में परिवर्तित होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महासचिव दीपक बावरिया गुजरात के रहने वाले हैं और कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव और गुजरात के सह-प्रभारी जीतू पटवारी को भी गुजरात की रणनीति का करीबी से अध्ययन एवं अनुभव करने का मौका मिल चुका है। इसलिए कहा जा सकता है कि कांग्रेस ‘त्रिफला को पंचारिष्ट बनाकर नई शैली और नए अंदाज से 2018 के विधानसभा चुनाव में कूदने जा रही है।

मध्य प्रदेश में चुनावी फलक उभरता जा रहा है और यहां की राजनीतिक फिजा चुनावी मोड में आती जा रही है। गुजरात के प्रयोगों और वहां से जुड़े नेताओं की प्रदेश में सक्रियता से आने वाले समय में रंग और जंग का जो अक्श आकार लेगा उसकी बानगी नजर आने लगी है। अभी यह भविष्य के गर्त में है, कि जिस गुजरात के फॉर्मूले की प्रयोगशाला प्रदेश में बनने जा रही है वह यहां की धरा पर कितना सफल होगा? इतना स्पष्ट है कि हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश की सक्रियता निश्?चित तौर पर कुछ न कुछ कांग्रेस को मदद पहुंचाने वाली होगी। उससे कांग्रेस को कोई राजनीतिक नुकसान होने की संभावना इसलिए नहीं है क्योंकि कांग्रेस पिछले डेढ़ दशक में जिस स्थान पर पहुंची है उससे वह नीचे खिसकने की कोई संभावना नजर नहीं आती है। बावरिया प्रभारी होने के नाते प्रदेश में जो नए नए प्रयोग कर रहे हैं वह तो साफ नजर आ रहा है कि कुछ का बजूद तो राजनीतिक वीथिकाओं में सिद्दत से महसूस होने लगा है। कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे में भी उनकी सोच के मुताबिक परिवर्तन साफ साफ आकार ले चुका है और ब्लॉक कांग्रेस कमेटी में सख्या बढ़ाने के साथ ही मंडलम, सेक्टर कमेटियां और बूथ कमेटियां लगभग बन चुकीं हैं। सोशल मीडिया में भी कांग्रेस एक नए जोश और जज्बे से भरी टीम के साथ सामने आने वाली है क्योंकि उसने जो टेंलेंट हंट किया था उसके नतीजे शीघ्र ही देखने को मिलेंगे। कांग्रेस की गतिविधियों में जल्द ही ‘गुजरात टचÓ साफ साफ नजर आएगा। भाजपा ने कई दशक पूर्व गुजरात को हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनाकर वहां से अपनी राजनीति की भगवा धारा की भूमि तैयार की थी और उसी के सहारे आगे चलकर वह धीरे धीरे पूरे देश में फैलती जा रही है। गुजरात के उस गढ़ में जिस फॉर्मूले से कांग्रेस ने भाजपा विधायकों की संख्या को तीन अंकों में नहीं पहुंचने दिया और उन नतीजों का न केवल गुजरात बल्कि अनेक राज्यों में कांग्रेस का उत्साह बढ़ाने में एक उत्प्रेरक का काम किया है। कांग्रेस को लगता है कि यह फार्मूला उसके लिए पूरे देश में मुफीद साबित हो सकता है। इसलिए अब सारे चुनाव कांग्रेस लगभग उसी तर्ज पर लडऩे जा रही है। कांग्रेस अलग अलग वर्गों के बीच इस ‘त्रिफलाÓ के सहारे अपना आधार बढ़ाने की योजना बना रही है और बाकी राज्यों में जहां जहां संभव होगा वह गुजरात की तर्ज पर चुनाव लड़ेगी लेकिन प्रदेश में उसका ज्यादा असर इसलिए नजर आएगा क्योंकि मप्र की सीमाएं गुजरात राज्य से मिली हुई है। यही कारण है कि अब कांग्रेस की रणनीति में गुजराती टच ज्यादा ही गहरा होता जाएगा। मप्र में पहले गुजरात के कांग्रेस विधायक अल्पेश ठाकोर ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई लेकिन उनका आयोजन सामाजिक संगठन के माध्यम से हुआ और इसमें सीधे कांग्रेस की भागीदारी नहीं रही सिवाए कि वे कांग्रेस के विधायक है। पिछड़े वर्ग के लोगों को एक गैर राजनीतिक बैनर तले वे संगठित करेंगे जिसका उद्देश्य भाजपा का विरोध और कांग्रेस को राजनीतिक लाभ पहुंचाना होगा। जिन लोगों के बीच अभी तक कांग्रेस का आधार नहीं रहा है उनमें रूझान पैदा करना अल्पेश की गतिविधियों का असली मकसद होगा। हार्दिक पटेल अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं, जबकि जिग्नेश मेवाणी की आमद दर्ज कराने की तैयारियां चल रही हैं। सभी भाजपा विरोधी लोगों को चाहे वे कांग्रेस के बाहर के हो या सामाजिक चेहरे हों उन्हें कांग्रेस से जोडऩा बावरिया के एजेंडे में है। विभिन्न सामाजिक संगठनों और गैर भाजपाई स्वयं सेवी संगठनों से बावरिया अपने तार जोडऩे में लगे हैं ताकि उनका उपयोग भी अप्रत्यक्ष रूप से किया जा सकें। आम आदमी पार्टी से अलग होकर बने मप्र विचार मंच से भी कांग्रेस के तार अंदर ही अंदर जुडऩे के संकेत मिले हैं और अगला विधानसभा चुनाव कांग्रेस टिकट पर पूर्व निर्दलीय विधायक पारस सकलेचा, भाजपा विधायक रहे गिरिजाशंकर शर्मा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े भाजपा के जिला स्तर पर अति सक्रिय रहे विनायक परिहार के चुनाव लडऩे की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। 2018 के चुनाव में हार्दिक पटेल अपनी बड़ी भूमिका निभाने का एलान कर चुके हैं। कांग्रेस इस ‘त्रिफला की सिफारिश पर उनके पसंदीदा चेहरों को अपने टिकट पर चुनाव मैदान में उतार सकती है। हार्दिक पटेल की पसंद के कुछ पाटीदार नेता भी कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ेगें? इस बात को इसलिए नहीं नकारा जा सकता क्योंकि गुजरात के टिकट वितरण में इन तीनों की भी अहम भूमिका साफ साफ नजर आई थी। यहां तक की जिग्नेश मेवाणी को बतौर निर्दलीय उम्मीदबार चुनाव लड़ाने के लिए कांग्रेस ने अपने एक मजबूत दलित विधायक जो कि कई चुनाव जीत चुके थे उन्हें मैदान से हटा लिया था। कांग्रेस नेताओं को भी हाई कमान ने स्पष्ट तौर पर कह दिया है कि वे तीनों युवा नेताओं को लेकर जो रणनीति बना रहे है उस मामले में वे केवल उतना ही कहें जितना कहने की आलाकमान ने अनुमति दी है।

प्रदेश में कांग्रेस में विभिन्न ऐसे मंचों के माध्यम से जिनकी पृष्टभूमि में भले ही कांग्रेस की हो लेकिन सामने कांग्रेस नजर न आए, उनकी सक्रिय भागीदारी से अपना अभियान चलाने की योजना बनाई है। ऐसे आयोजनों में सामने कोई कांग्रेस का परिचित चेहरा बतौर आयोजक शायद न हो लेकिन उनके कार्यक्रमों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जाकर उनके विचार जानते हुए अपनी बात सामने रख सकते हैं। दीपक बावरिया ने प्रदेश से जुड़े बड़े प्रमुख कांग्रेस नेताओं को इस फॉमूले को लेकर पूरी तरह विश्वास में ले लिया है और उनकी इस रणनीति पर किसी को कोई एतराज नहीं है। इस रणनीति का असली मकसद प्रदेश में पिछड़ों, दलितों और पाटीदारों के उस वर्ग के बीच भी अपनी पैठ बनाना है जो कांग्रेस से दूरी बनाए हुए हैं या भाजपा का समर्थक रहे है।

हार्दिक भले ही सार्वजनिक तौर पर यह कह चुके है कि राहुल गांधी को वे अपना नेता नहीं मानते लेकिन वे यह भी कहते हैं कि वह राहुल को पसंद करते हैं और देश के लोग भी अब गांधी को गंभीरता से लेने लगे हैं। वे अपनी लड़ाई सीधे सीधे भाजपा से बता रहे हैं और मप्र में अपनी उपस्थिति निकट भविष्य में काफी बढ़ाने का संकेत दे चुके हैं। इसका मतलब साफ है कि वे भाजपा के विरूद्ध जितना माहौल बनाएंगें उसका सीधा सीधा फायदा कांग्रेस को मिलेगा। यही कारण है कि कांग्रेस के किसी भी नेता को इस फार्मूले पर कोई एतराज नहीं है। हार्दिक, जिग्नेश और अल्पेश अपने अभियान में जितने सफल होंगे उतना भाजपा की राह में कुछ मुश्किलें पैदा होंगी और कांग्रेस की उतनी ही राह आसान होगी। ऐसा नहीं है कि भाजपा इन सबसे अनभिज्ञ हो। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिनके चेहरे पर भाजपा चौथी बार सरकार बनाने की जोरशोर से तैयारी कर रही है, उनके द्वारा हाल ही में किया गया मंत्रीमंडल का मिनी विस्तार भी इसी की एक कड़ी है। जिसमें पिछड़े वर्ग के जालिम सिंह पटेल और अति पिछड़े वर्ग के नारायण सिंह कुशवाहा और पाटीदार नेता बालकृष्ण पाटीदार को मंत्री बनाया गया है।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
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