गठबंधन की खिचड़ी पकाने से क्या कांग्रेस को होगा लाभ ?

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। इन दिनों प्रदेश से लेकर दिल्ली तक भाजपा के पालिटिकल सुपर पावर को खत्म करने के लिये राजनीतिक गलियारों में गठबंधन की खिचड़ी पकाने की कवायद जारी है और इस खिचड़ी की कवायद के चलते अपने-अपने दलों का अस्तित्व बचाने में लगे हुए हैं यूँ तो देश व प्रदेश में छोटे-छोटे सैंकड़ों राजनीतिक दल हैं जो बड़ी पार्टियों की गोदी में बैठकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश में लगे हुए हैं, लेकिन ऐसे समय में बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन को लेकर जो राजनैतिक गलियारे में चर्चा का दौर जारी है और एक समय था जब बसपा से गठबंधन कर भाजपा भी अपनी राजनीतिक जड़ें जमाने का काम कर चुकी है, हालांकि जनसंघ से लेकर भाजपा के अभी तक के इतिहास पर नजर डाली जाए तो भाजपा गठबंधन की राजनीति की बैसाखी पर चलकर आज पूरे देश में अपनी जड़ें जमाने में कामयाबी प्राप्त करती दिखाई दे रही है। बात यदि मध्यप्रदेश की ही करें तो मध्यप्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के लिये कांग्रेस इन दिनों सपा-बसपा से गठबंधन करने के लिये कुछ ज्यादा ही लालायित दिखाई दे रही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर बसपा के साथ गठबंधन करने से किस दल को कितना फायदा हो इसको लेकर लोगों में तरह-तरह की चर्चाएं व्याप्त हैं। यदि बसपा के गठबंधन का इतिहास पर नजर डाली जाए तो बसपा सुप्रीमो मायावती के नेतृत्व में बसपा की बैसाखी के सहारे भाजपा उत्तरप्रदेश में अपनी सरकार बना चुकी है आज वही भाजपा उसी दल को मनुवादी दल मानते हुए कोसने में लगी हुई है बसपा का देश की राजनीति में सफरनामा इस प्रकार से शुरू हुआ उसके चलते सत्ता की चाशनी चाटने के लिये भाजपा ने बसपा की बैसाखी पर चलकर उत्तरप्रदेश में सरकार बनाई थी आज वही बसपा सुप्रीमो भाजपा के लिये खलनायक बनकर रह गई हैं। विगत १५ वर्षों से सत्ता का वनवास भोग रही कांग्रेस अब सत्ता पर काबिज होने के लिए जिस प्रकार से हाथ पैर मार रही है उसके चलते वह सत्ता के खातिर किसी भी दल की बैसाखी का सहारा लेने के लिए आतुर दिखाई दे रही है। हालांकि इस तरह के गठबंधन को लेकर तरह-तरह की चर्चाओं का दौर जारी है तो वहीं कांग्रेस भी बसपा के परंपरागत वोटों से भयभीत है और वह प्रदेश में कांग्रेस बसपा और सपा के गठबंधन को देखते हुए यह मानकर चल रही है कि यदि इन तीनों दलों का गठबंधन हो गया तो यह गठबंधन उनके लिये परेशानी का सबब बन सकता है, क्योंकि मध्यप्रदेश के कुछ जिलों में और खासकर विंध्य क्षेत्र के साथ-साथ उत्तरप्रदेश से लगी सीमाओं के जिलों में बसपा के हाथी का तो प्रभाव है ही तो वहीं प्रदेश के कई लोकसभा और विधानसभा क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां समाजवादी पार्टी का अच्छा खास प्रभाव है, यह अलग बात है कि वर्तमान में प्रदेश की राजनीति में दो ही दल भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों की जड़ें इस प्रदेश के मतदाताओं तक फैली हुई हैं। जहाँ तक बात यदि बसपा और समाजवादी पार्टी की करें तो इस संबंध में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का यह मत है कि इस प्रदेश में दोनों ही दलों का प्रभाव है न कि बसपा और सपा का, इस तरह का तर्क देते हुए भाजपाई नेता यह कहते हैं कि जहां तक बात बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के प्रभाव का हौवा बताया जाता है तो आप पुराने चुनावी इतिहास उठाकर देख लें, इन पार्टियों से जो भी नेता चुनकर आया है वह अपने आपमें प्रभावशाली रहा है फिर चाहे वह कभी वह बसपा के हाथी पर सवार होकर चुनावी समर में उतरकर उसने जीत हासिल की हो या फिर समाजवादी पार्टी की साइकिल पर चलकर वह जनप्रतिनिधि बना हो। वह अपने ही प्रभाव से ही जनप्रतिनिधि बना न कि बसपा या सपा के प्रभाव से बना है। लेकिन राजनीति के जानकारों का इस संबंध में जो तर्क है उसमें वह यह दावा करते हैं कि जिस प्रकार से एक जमाने में कांग्रेस का टिकट पाना ही चुनाव में विजयश्री मानी जाती थी हालांकि समय पलटा आज कुछ प्रांतों में भाजपा का टिकट मिलना ही जीत की प्रथम सीढ़ी मानी जाती है। जहाँ तक भाजपा की राजनीति का सवाल है भाजपा की राजनीति का सवाल है तो उसके नेता झूठ बोलते है और जोर से बोलते हैं तथा सौ बार झूठ बोलकर उसे सच करके दिखाते हैं ऐसे ही कई उदाहरण भाजपा की राजनीति में कई राजनेताओं के बयानों से स्पष्ट होते नजर आ रहे हैं। इस प्रदेश की सत्ता पर २००३ में हुए उमा भारती के नेतृत्व में चुनाव के चलते भाजपा सत्ता में आई लेकिन उस समय भी भाजपा की यह स्थिति इस प्रदेश में नहीं थी कि भाजपा के तत्कालीन प्रादेशिक नेता चाहे वह सुंदरलाल पटवा हों, विक्रम वर्मा व कैलाश सारंग जैसे प्रभावशाली नेता भाजपा को दिग्जिवय सिंह को बेदखल करने की स्थिति में नहीं थे, तब उमा भारती को इस प्रदेश की कमान सौंपी गई उस समय उमा भारती को जितनी मेहनत दिग्विजय सिंह की सत्ता को बेदखल करने के लिये नहीं करनी पड़ी उससे कहीं अधिक मेहतन उन्हें अपने पार्टी के उन देव दुर्लभ और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को मनाने के लिये मेहनत मशक्कत करनी पड़ी। लगभग ऐसी ही स्थिति १९९८ में भी भाजपा की स्थिति उस समय थी जब इस प्रदेश के संगठन की कमान वर्तमान देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों में थी लेनिक उस समय पटवा, सारंग और विक्रम वर्मा जैसे नेताओं ने नरेन्द्र मोदी का इस तरह से विरोध किया कि प्रदेश के मतदताओं में भाजपा के पक्ष में माहौल होने के बावजूद भी प्रदेश की सत्ता पर दिग्विजय सिंह का कब्जा बरकरार रहा, क्योंकि उस समय यही भाजपा के नेताओं की कार्यशैली के चलते भाजपा को इस प्रदेश के लोग भाजपा-डी (दिग्विजय सिंह) कहा करते थे और उन दिनों इस बात को लेकर भी चर्चा का बाजार गर्म था कि दिग्विजय सिंह भाजपा के नेताओं और पार्टी का खर्चा उठा रहे हैं। यह अलग बात है कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को भाजपा अपराजित योद्धा मानकर चल रहे हैं लेकिन मध्यप्रदेश के नेताओं की कारगुजारी के चलते इन दो भाजपा के महारथी मोदी और शाह में से एक मोदी की रणनीति प्रदेश के भाजपा के नेताओं के आगे असफल साबित हुई और ऐसा ही कुछ इस समय प्रदेश की वर्तेमान भरतीय जनता पार्टी के नेताओं में स्पष्ट दिखाई दे रही है, जिसके चलते यह साफ नजर आ रहा है कि प्रदेश में सिर्फ और सिर्फ शिवराज ही भाजपा हैं ? तभी तो अमित शाह के भोपाल प्रवास के दौरान दिए गए इस भाषण ये यू-टर्न लेना पड़ा कि २०१८ का चुनाव किसी व्यक्ति विशेष के नेतृत्व में नहीं बल्कि संगठन के नेतृत्व में लड़ा जाएगा, लेकिन अमित शाह के इस भाषण के बाद प्रदेश में कराये गये सर्वे के माध्यम से उन्हें इस बात का अहसास हो गया कि मध्यप्रदेश में भाजपा को विजयश्री शिवराज के बिना नहीं मिल सकती। हालांकि अमित शाह के द्वारा दिये गये बयान में यू-टर्न लेने के बाद प्रदेश की राजनीति में तरह-तरह की चर्चाएं लोग चटकारे लेकर करने नजर आ रहे हैं। तो वहीं यह भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि शिवराज के अपने कार्यकाल के दौरान भले ही भाजपा के नेताओं ने सत्ता की चाशनी चख अपनी उस हैसियत को बदलने में कामयाबी हासिल की हो जिसके चलते शिवराज सरकार के सत्ता पर काबिज होने के पूर्व उनकी टूटी साइकिल खरीदने तक की हैसियत नहीं थी लेकिन आज वह शिवराक सरकार की बदौलत आलीशान बंगलों और लग्जरी कारों में फर्राटे लेते नजर आ रहे हैं। बात जहां तक भाजपा की करें तो भाजपा का इतिहास यह बताता है कि भाजपा में झूठ बोलने और उसे साबित कर जनता को गुमरनाह करने की किस तरह से ट्रेनिंग दी जाती है, इसका जीता-जागता उहारण मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की राजनीतिक परमपरा को आगे बढ़ाते हुए राजनीति में उनके बड़े पुत्र कार्तिकेय सिंह चौहान इन दिनों राजनीतिक चर्चा के केन्द्र बने हुए हैं। उससके पीछे का कारण यह है कि उनका पिछले दिनों अपने पिताश्री के विधानसभा क्षेत्र में एक आमसभा के उस संबोधन को लेकर चर्चाओं में है जिसमें उन्होंने अपने पिताश्री की तरह प्रदेश की सड़कें अमेरिका से बेहतर होने का दावा तो किया ही है तो वहीं उन्होंने यह भी कहा है कि मैं अमेरिकार गया हूँ और वहाँ मेैंने देखा है कि प्रदेश की सड़कें १०० प्रतिशत अमेरिका से बेहतर हैं। पता नहीं उनके इस तरह के दावे को लेकर प्रदेश में तरह-तरह की चर्चाओं का दौर जारी तो वहीं लोग उनके इसत तरह के बयान को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं करते नजर आ रहे हैं और यह कहते नजर आ रहे हैं कि भाजपा में नये नेताओं को इस तरह से प्रशिक्षित किया जाता है, बात जहां तक प्रशिक्षण की करें तो इन्हीं शब्दों का उयोग जब भाजपा की संगठन की कमान संभालने वाले चौधरी राकेश सिंह की एक पत्रकार वार्ता के बाद जब भाजपा के एक बयानवीर ओर बच्चा पार्टी के नेता से पत्रकारों ने अनोपचारिक चर्चा के दौरान यह कहा कि अध्यक्ष अभी परिपक्व नहीं हैं तो उनका एक ही जवाब था कि वह अभी प्रशिक्षण मैं और धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। उक्त हवाबाज नेता के इस तरह के कथन को लेकर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष राकेश सिंह को लेकर तरह-तरह की चर्चाओं का दौर जारी रहा तो वहीं लोग यह भी कहते दिखाई दिये कि यह है भाजपा की नेताओं की कार्यशली अपनेे ही दल के नताओं की छवि बनाने के लिये वह क्या-क्या कह डालते हैं। इस तरह की भाजपा की राजनीति के चलते सवाल यह उठता है कि क्या प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के लिये कांग्रेस, बसपा और सपा का गठबंधन प्रदेश में सफल हो पाएगा, हालांकि इस गठबंधन को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं व्याप्त हैं तो वहीं कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दीपक बावरिया, मप्र विस के नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल समेत वरिष्ठ कांग्रेसियों को जो बैठक दिल्ली में हुई, उसके केंद्र बिन्दु मेुं बसपा के साथ गठबंधन की ही चर्चा शामिल थी। अफसर बयानों से पलटी मारने के लिए जानी जाने वाली बसपा सुप्रीमो ने तो खुलकर ऐसा कुछ नहीं कहा लेकिन कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व आए दिन गठबंधन की बात कहकर बसपा का राजनैतिक भाव बढ़ाता रहा है। कभी गठबंधन की राजनीति की खिल्ली उड़ाने वाली कांग्रेस की आखिर क्या ऐसी मजबूरी है कि उसे चुनावी रंग में उतरने के लिए बसपा का मोहताज होकर घुटनों के बल रेंगने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। दरअसल यह तिलस्म मध्यप्रदेश में बसपा के वोटबैंक को लेकर पैदा हुआ है। बीते चुनाव में बसपा को प्रदेश में सात और कांग्रेंस को ३७ प्रतिशत वोट मिले थे। वहीं भाजपा को ४५ प्रतिशत वोट मिले थे। जाहिर है कि यदि कांग्रेस और बसपा के वोट मिल जायें तो भाजपा के जीत के समीकरण मप्र में बदल सकते हैं। कांग्रेस का वोटबैंक जहां प्रदेश में लगातार गिर रहा है। वहीं पिछले २० सालों में बसपा ने मध्यप्रदेश में सात प्रतिशत के करीब वोट शेयर करती रही है। पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के वोट शेयर ३७ प्रतिशत को इसमें जोड़ दिया जाए तो यह गठबंधन भाजपा के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है। मध्यप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का विंध्य, बुंदेलखण्ड और ग्वालियर-चंबल संभाग में प्रभाव है। साल २०१३ मतें चुनाव में बसपा ने यहां से चार सीटें जीती थीं। ६२ विधानसभा क्षेत्रों में दस हजार और १७ सीटों पर ३० हजार से ज्यादा वेाट मिले थे। बसपा का अपना स्थाई वोट बैंक है। भाजपा की वर्तमान स्थिति को देखकर सवाल यह उठता है कि क्या बसपा-सपा और कांग्रेस का गठबंधन इस प्रदेश में भाजपा को सत्ता से बेदखल कर पाएगा।

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