खेतों में बंजर बनाने पर क्यों तुल गए हैं किसान

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०-विनोद के. शाह
देश के तीन हिंदी भाषी राज्यों में नवगठित राज्य सरकारों के सामने यूरिया संकट है। हालांकि केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय तथा रेलवे ने समय पर यूरिया पहुंचाकर किसानों के गुस्से को काफी हद तक नियंत्रित कर दिया है। यूरिया की अनुपलब्धता व खुले बाजार की मुनाफाखोरी से किसानों का उत्तेजित होना स्वाभाविक भी है। किसानों का कहना था कि बगैर यूरिया के न केवल फसल की बढ़वार प्रभावित होती है, बल्कि फसलों की सिंचाई भी बेअसर साबित होती है। मप्र को चालू अवधि में गत वर्ष की तुलना में अधिक यूरिया उपलब्ध कराया गया है, जबकि प्रदेश में रबी के रकबे की बुवाई गत वर्ष की तुलना में नौ फीसदी कम हुई है। कम वर्षा के कारण प्रदेश में यूरिया का कम उपयोग होना चाहिए था। लेकिन इसके विपरीत यूरिया की मांग बढऩे और तनावपूर्ण हालात बनने के लिए स्थानीय अधिकारियों की कर्तव्यपरायणता प्रश्नों के घेरे में है। आखिर राज्य को आवंटित यूरिया कहां लापता हो गया? आचार संहिता के दौरान जिला कलेक्टरों का पूरा ध्यान चुनावी व्यस्तता में था। इस दौरान कृषि विभाग के अधिकारियों की लापरवाही से यूरिया का संग्रह कालाबाजारियों के पास पहुंचने के संकेते हैं। आंकड़े बताते हैं कि मध्यप्रदेश में पिछले दो दशक में यूरिया की खपत में ४८.८१ फीसदी की वृद्धि हुई। हालांकि इस अवधि में राज्य में कृषि के सिंचित क्षेत्र में भी वृद्धि हुई है, लेकिन इसकी तुलना में यूरिया की खपत में वृद्धि अत्याधिक है। कृषि वैज्ञानिक उत्पादन की बढ़ोतरी में यूरिया के उपयोग को नकारते हैं। यह बात प्रमाणित भी है कि मप्र में वर्ष २०१७-१८ में यूरिया की खपत, अनुपलब्धता या अन्य कारणों के चलते दो दशक की न्यूनतम रही थी। लेकिन इस अवधि में गेहूं उत्पादन रिकॉर्ड स्तर को छूने वाला रहा। इसलिए यह कहना कि यूरिया उत्पादकता देने वाला उत्प्रेरक है, सप्रमाणग लत है। वैज्ञानिकों का मानना की उर्वरकों के अत्याधिक प्रयोग से जमीन बंजर हो रही है। मेढ़ बंधान में असफला से कृषि भूमि का सतही उपजाऊपन भी बरसाती पानी के साथ खेतों से बहकर नदियों में पहुंच रहा है। फिर अत्याधिक पैदावार के लिए किसान यूरिया व पानी का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं। यहसब जमीन की उवऊरा शक्ति को पूर्णत: नष्ट करने वाला है। कृषि वैज्ञानिकों, पर्यावरण विदों की ऐसी ही चेतावनी के फलस्वरूप केन्द्र सरकार ने गत वर्ष से यूरिया की पैकिंग मात्रा ५० किलो से घटाकर ४५ किलो प्रति बैग कर दी है, ताकि यूरिया का कम प्रयोग हो। राज्य में धान उत्पादक नहरी क्षेत्र का किसान कम दिनों में रबी फसल लेने के लिए फसलों में पानी के साथ यूरिया बहा रहा है, जो पर्यावरण व जमीन की सेहत के लिए घातक है। इसे रोकने के लिए जागरूकता की आवश्यकता है। यूरिया की कमी पर राजनीतिक दल किसानों को भड़काने का कार्य करते हैं, जबकि इनकी भूमिका जागरूकता लाने की होनी चाहिए। नया शोध कहता है कि यूरिया का तरल रूप अधिक प्रभावकारी है। एक हैक्टेयर में सिर्फ २५ किलो घोल। जबकि किसान अज्ञानतावश प्रति हैक्टैयर १५० से २५० किलो यूरिया का उपयोग कर रहा है। अत: अब वक्त है कि किसानों को जागरूक किया जाए ओर उन्हें यह बताया जाए कि अच्छी फसल के लिए नेतागिरी और आंदोलन की नहीं, बल्कि सही समझ, जानकारी और निर्णय की जरूरत है।
०-नवदुनिया से साभार)
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