क्या राम मंदिर के मसले पर सुप्रीम कोर्ट की गरिमा खंडित नहीं हो रही … ?

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०-ओमप्रकाश मेहता
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। यह तो कटु सत्य है कि देश की आजादी के महज सत्तर साल बाद आज देश की जनता का प्रजातंत्र के तीन स्तंभों में से केवल और केवल न्याय पालिका पर ही विश्वास कायम है, और अब तो वह भी राम मंदिर मसले पर खंडित होने के कगार पर है, क्योंकि राम मंदिर मसले पर सुनवाई और फैसले में सर्वोच्च न्यायालय कथित रूप से देरी कर रहा है, इसी कारण हमेशा निष्पक्ष के सिद्धांत पर चलने वाली न्याय पालिका पर सरकार या किसी अन्य के इशारे पर चलने के आरोप लगने लगे हैं और सर्वोच्च न्यायालय से पूछा जा रहा है कि एक आतंकी के मसले पर न्यायालय आधी रात को बैठकर सुनवाई कर सकती है तो फिर राम मंदिर जैसे अहम और देश के करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े मुद्दे पर सुनवाई को बार बार क्यों टाला जा रहा है? आज सबसे दु:खद तथ्य यह है कि देश की आस्था के इस महत्वपूर्ण मुद्दे को सियासत और चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है, यही नहीं यदि कोई संत समुदाय भी राम मंदिर के बारे में कोई अपनी राय रखता है या उस दिशा में कदम उठाता है तो उसे भी सियासत से जोड़ दिया जाता है, जिसका ताजा उदाहरण जगदगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद जी के नेतृत्व में जब परमधर्म संसद ने २१ फरवरी को अयोध्या कूचकर मंदिर के शिलान्यास का फैसला लिया तो शंकराचार्य जी व उनके अनुयायी संतों को कांग्रेसी करार दे दिया गया। इधर विश्व हिन्दू परिषद के तत्वावधान में आयोजित हो रही संसद को भाजपा समर्थक माना जा रहा है और अब दोनों ही ध्र्मा संसदों में राम मंदिर को लेकर सर्वोच्च न्यायालय को कटघरे में खड़े करने की कोशिश की जा रही है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले तक मंदिर निर्माण के बारे में फैसले से परहेज करने वाली केन्द्र की मोदी सरकार भी सियासी लाभ की गरज से सुप्रीम कोर्ट से अयोध्या की गैर विवादित जमीन लौटाने और उसी जमीन पर मंदिर निर्माण की शुरुआत करने की पहल करने लगी है। जिसकेक जवाब में शंकराचार्य जी व उनके संत समुदाय ने स्पष्ट कह दिया है कि मंदिर तो राम की जन्मस्थली अर्थात विवादित स्थल पर ही बनेगा और उन्होंने मंदिर के शिलान्यास की तारीख भी घोषित कर दी। जबकि शंकराचार्य जी के विरोधी विहित संत संगठन ने इस साल के अंत में छ: दिसम्बर (बाबरी मस्जिद ढहाने वाले दिन) को मंदिर निर्माण प्रारंभ करने के संकेत दिए हैं, जिसकी वे औपचारिक घोषणा एक दो दिन में (धर्म संसद के दौरान) कर देंगे। अब सबसे अहम सवाल यह उठता जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय की ऐसी क्या मजबूरी है जो बदनामी व उलाहने सहने करकेक भी इस अहम मसले पर कोई कदम नहीं उठा रही है, क्या सर्वोच्च न्यायालय पर भी किसी का दबाव है? न्याय पालिका की भाारती जनतंत्र में एक सर्वोच्च और अहम गरिमा है, फिर वह यह सब करने को मजबूर क्यों है? यद्यपि यह तो दिन के उजाले की तरह साफ है कि चाहे सरकार हो या दोनेां संत संगठन, सभी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर इस मुद्दे पर सियासी खेल खेल रहे हैं और शंकराचार्य जी के संत समुदाय ने रामजन्म भूमि पर ही मंदिर के निर्माण का मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री मोदी के उस राजनीतिक प्रयास पर पानी फैलाने का अहम काम किया है, जिसके तहत मोदी जी अयोध्या की गेर विवादित जमीन पर मंदिर बनाने की मंशा प्रकट कर चुनावी रण जीतना चाहते हैं। अब चाहे विहिप के नेतृत्व वाला संत समागम मंदिर शिलान्यास की तिथि के बारे में कुछ भी फैसला करे किन्तु ‘लाठी-गोली खाकर’ भी २१ फरवरी को मंदिर शिलान्यास का संकल्प पूरा करने की शंकराचार्य संत समुदाय की घोषणा आम हिन्दू मतदाता को अधिक प्रभावित करेगी। किन्तु यहां सबसे अहम सवाल फिर भी यही है कि सर्वोच्च न्यायालय अपनी गरिमा को खंडित होने से कैसे बचायेगा?
०-नया इंडिया के कालम ”चिंतनीय प्रश्न” से साभार)
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