क्या पाकिस्तान मोदी को विजयश्री दिलवाएगा … ?

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०-ओमप्रकाश मेहता
प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी पर चाहे यह आरोप लगाएं कि ‘कांग्रेस पाकिस्तान के साथ मोदी को पद से हटवाने की साजिश रच रही है’, किंतु आज की वास्तविकता व हालात कुछ ऐसे हैं कि पाकिस्तान के प्रति सख्त रुख अपनाकर मोदी देशवासियों की सहानुभूति बटोरने में लगे हैं और इसी सहानुभूति को वोट में तब्दील करवाकर आसन्न लोकसभा चुनाव में विजयश्री हासिल करना चाहते हैं और यदि ‘खुदा न खास्ता’ पाक के साथ युद्ध शेरू हो जाता है तो, फिर मोदी की पुन: सरकार बनने से कोई नहीं रोक सकता। आज के राजनेताओं ने चाहे राष्ट्रभक्ति को राजनीतिक स्वार्थ में बदल दिया हो, किंतु देश की अवाम तो अभी भी सच्चे दिल से देशभक्त है और सर्वस्व लुटाकर अपने दश्ेा की अस्मिता को कायम रखना चाहती है। भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए चुनावों के पहले हर मसले पर राजनीति करने और उसे अपने पक्ष में भुनाने की प्रक्रिया कोई नई नहीं है, फिर वह मसला राष्ट्र की अस्मिता से ही क्यों न जुड़ा हो, इसलिए आज पुलवामा काण्ड, कश्मीरी अनुच्छेद-३७० व ३५ए या पाकिस्तानी सरकार के दुव्र्यवहार को लेकर देश में सत्तारूढ़ दल यह दिखाना चाहता है कि उससे बड़ा देश का हितचिंतक कोई नहीं है, इसलिए उसे ही चिरंतन काल तक सत्ता में बने रहने देना चाहिए और इसीलिए अब प्रधानमंत्री सहित सत्तारूढ़ दल के नेताओं के भाषणों का लहजा भी बदला हुआ है प्रधानमंत्री व सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष जहां अपने इन प्रयासों से २०१४ के चुनावी वादों का विस्मृत करवाने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं उनकी सरकार की पांच साल की सरकारी गुस्ताखियों को भी नजर अंदाज करवाने का प्रयास कर रहे हैं। अब अपने इन प्रयास में सत्तारूढ़ सरकार व राजनीतिक दल कितने सफल हो पाते हैं, यह तो चुनाव परिणाम बताएंगे, कितुं यह सही है कि आज-कल जो धीरे-धीरे पाकिस्तान से युद्ध का वातावरण तैयार किया जा रहा है, वह पाकिस्तान से जीत के साथ उसमें चुनाव में जीत का भाव भी निहित है। …और जहां तक प्रतिपक्षी दलों का सवाल है, यदि कटुसत्य कहा जाए तो इस देश में प्रतिपक्ष कभी इतना कमजोर नहीं रहा, जितना कि इस समय है। प्रतिपक्षी दल पूरी देश में ‘महागठबंधन’ का नाटक खेल रहे हैं और इन नाटकों में डरावने मुखौटे लगाकर सत्तारूढ़ दल को डराने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि इनकी वास्तविकता सबको पता है और इनकी इसी असलियत का सत्तारूढ़ दल फायदा उठाता आ रहा है और अब तक वे एकमत और एकजुट नहीं होंगे तक तक ये इनकी मतवैभित्यता का राजनीतिक फायदा उठाता रहेगा। आज की वास्तविकता तो यह है कि आज लोकतंत्र से भी अधिक महत्वपूर्ण ‘सत्ता की कुर्सी’ हो गई है, जो सत्ता में है, वह उसे चिरकाल तक अपने कब्जे में रखना चाहता है, और जो सत्ता से बाहर है, वह येन-केन-प्रकारेण ‘सत्ता की कुर्सी’ हथियाना चाहता है, इस तरह कुल मिलाकर लोकतंत्री इस देश में न ‘लोक’ और न ही ‘तंत्र’ बल्कि ‘कुर्सी का खेल’ (चेयर रेस) अहम हो गया है और जहां तक ‘तंत्र’ का सवाल है, वह तो फिर भी ‘जी-हुजूरी’ करके या अपने हथकण्डे अपनाकर अपरोक्ष रूप से सत्ता के लाभ हथिया लेता है, किंतु सबसे अधिक दयनीय स्थिति ‘लोक’ की हो गई है, संवैधानिक रूप से देश ने उसी ‘लोक’ की सरकार मानी जाती है, किंतु वह स्वयं अपाहिज की जिंदगी जीने को मजबूर है, चुनावी साल में राजनीतिक दलों द्वारा उसे ‘बेवकूफ’ बनाने की स्पर्धा चलती है और उसके बाद वह वहीं दयनीय जिंदगी जीने को मजबूर हो जाता है, उसके भाग्य में अब यही स्थायी रूप से अंकित हो गया है, यद्यपि यह भी सही है कि आज का मतदाता उतना नादान नहीं रहा, जितना कि वह देश के आजाद होने के बाद प्रारंभिक तीन दशकों में था, किंतु वह इतना होशियार, वाचाल और स्वयं के हितों का जानकार भी नहीं हो पाया, जितना कि अन्य देशों के मतदाता हैं। कुल मिलाकर आज देश में सामने वाले को बेवकूफ बनाकर अपना हित साधने की स्पर्धा जारी है, वहीं आधुनिक भाग्यविधाता (नेता) उेसा कोई सुअवसर भी नहीं चूकते जिसमें उनकी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि निहित हो, यही चिरंतनकाल से चलता आया है और आगे भी चलता रहेगा, फिर वह चाहे राष्ट्र की अस्मिता से जुड़ा कोई भी मामला क्यों न हो?
०-नया इंडिया के कालम ”आज की राजनीति” से साभार)
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