‘कुलटाओं’ की जुर्रत पर भाजपा/लुटियंस की ‘खाप-पंचायत’ नाराज

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०-उमेश त्रिवेदी
‘मीटू’ अभियान के तहत यौन शोषण का आरोप लगाने वाली महिला पत्रकार प्रिया रमानी पर मोदी सरकार के विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर का मुकदमा दिल्ली के लुटियंस में रोजाना ‘पेज-३’ दावतें उड़ाने वाले उन भयाक्रांत राजनेताओं, अफसरों और बिजनैसमैनों का काउंटर-अटैक है, जो इस से डरे हुए हैं कि कहीं उनके खिलाफ भी कोई ‘प्रिया रमानी’ आरोपों का पुलिंदा लेकर सामने नहीं आ जाए। यह मुकदमा ‘पेज-३’ पार्टी के प्रायोजकों का महिला प्रोफेशनल्स, एक्जीक्यूटिव और कलाकारों के लिए हुक्मनामा है कि परिस्थितियों और पावर का फायदा उठाकर उनकी इच्छा के विपरीत उन्हे चूमना, चूसना और खारिज कर देना उनकी सोसायटी का चलन है, विशेषाधिकार है। इसका प्रतिरोध करने वालों को लुटियंस की खाप-पंचायत ‘कुलटा’ साबित करके लाल किले की दीवारों पर टांग देगी। ताकतवर वकीलों की जमात महज एमजे अकबर को बचाने के लिए खड़ी नहीं हुई है। वकीलों की यह रक्षा पंक्ति राजनीति, प्रशासन और व्यवसाय से जुड़े उन धुरंधर चेहरों को बेनकाब होने से बचाने की रणनीति है, जो मानता है कि औरत महज कमोडिटी है और यह सब तो होता रहता है। अकबर के मुकदमे के जरिए केनद्र सरकार ने समाज की आसुरी-प्रवृत्तियों का वंदन, अभिनंदन और समर्थन किया है। भारत में यौन-अपराधों के कानून इतने जटिल हैं कि एक महिला के लिए कोर्ट में ऐसे मुकदमे झेलना उस पर होने वाले बलात्कार से ज्यादा भयावह, त्रासद और अपमानजनक होता है। अकबर के मुकदमे की स्क्रिप्ट पूरी तरह फिल्मी है। इस कानूनी-ड्रामे में पहले आरोप लगाने वाली महिला पत्रकार को कानूनी प्रताडऩा के जरिए इलीमनेट करने की तैयारी है, ताकि शेष तेरह महिला पत्रकार सामाजिक प्रताडऩा और अपमान से डरकर राजनीति दबंगों के आगे आत्म समर्पण कर दें। सामाजिक प्रताडऩा के बाद महिला पत्रकारों की कानूनी प्रताडऩा दर्शाती है कि मोदी सरकार की संवेदनाएं कितनी पथरा गई हैं? देश के कई कबायली इलाकों और दूरदराज गांवों में महिलाओं को कुलटा, चुड़ैल, चरित्रहीन घोषित करके नंगा घुमाने और आग के हवाले कर देने के किस्से अक्सर सामने आते रहते हैं। दिल्ली के आसपास खाप पंचायतों का बोलबाला भी सुर्खियों में बना रहता है। इन घटनाओं में गांव के पंच-सरपंच ओर दबंग महिलाओं की अस्मिता को नष्अ करने का सामान लेकर आगे-आगे चलते हैं। लुटियंस के लिए यह राक्षसी आचरण चकहने, चमकाने और चटखारे लेने का सामान है। राजनीति और प्रशासन इसमें तत्परता और सरोकार का स्वांग रचतो हैं तो मीडिया सिविल राइट्स और मौलिक अधिकारों के नाम पर सितारे तोड़ते लगता है। विडंबना है कि आदिवासी कबीलों अथवा खाप पंचायतों के आदिम सलूक की अब दिल्ली के पांच सितारा लुटियंस इलाके में पैर पासर रहा है, जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमितशाह, अरुण जेटली जैसी ताकतवर तिकड़ी रहती है। विश्वास नहीं होता कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सदारत में ऐसा व्यक्ति राज्यमंत्री की हैसियत में काम करेगा, जिसके ऊपर देश-विदेश की सोलह महिला पत्रकारों ने यौन शोषण का आरोप लगाए हैं? यह विचार भी कौतूहल पैदा करता है कि मोदी कैबिनेट में सुषमा स्वराज, निर्मला सीतारमण या स्मृति ईरानी या मेनका गांधी जैसे महिला मंत्री अकबर की मौजूदगी में कैसा महसूस करेंगी? स्मृति ईरानी ने कहा था कि महिला पत्रकारों का मखौल नहीं बनाया जाए, लेकिन क्या उन्हें अब यह महसूस नहीं होगा कि पूरी कैबिनेट उनका मजाक उड़ा रही है? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सदारत में भाजपा की खाप-पंचायत द्वारा एमजे अकबर को मंत्री रहते हुए कानूनी मुकदमा दर्ज करने की इजाजत देने के निहितार्थी देश की आधी आबादी के लिए शुभ संकते नहीं है। क्या मोदी के ‘बेटी बचाओ’ अभियान के तहत देश का एक मर्तबा फिर मध्ययुगीय पुरुष प्रधान पैशाचिक व्यवस्था की ओर लौट रहा है, जबकि औरत के लिए देहरी लांघना गुनाह होता था? एक टीवी इंटरव्यू में नरेन्द्र मोदी के ये शब्द गौरतलब हैं कि ‘किसी पीडि़ता की जगह ख्ुाद को रख कर या उसके संगे-संबंधी बनकर सोचते हैं तो रूह कांप जाती है। देश की कोई भी बेटी हमारी बेटी की तरह है।’ मोदी की यह कथित मार्मिकता सोचने के लिए ाबध्य कर रही है कि मोदी उन सोलह महिला पत्रकारों की जिल्लत क्यों नहीं महसूस करपा रहे हैं जिन्होंने अपने सेटल जिंदगी के आंचल में छेद करके कया घाव दिखाए हैं, जो नासून बनकर उनकी आत्मा को बेच रहे थे। यह सवाल नश्तर बनता जा रहा है कि बेटियों के सगे-संबंधी की तरह सोचने के बजाय मोदी अकबर के साथ क्यों खड़े हैं? (‘मी टू’ अभियान में मुखर महिला पत्रकारों को कथित रूप से ‘कुलटा’ लिखना व्यवावसाियक बदनसीबी है, लेकिन महिलाओं के अच्छे नसीब का रास्ता बदनसीबी की इन्हीं गंदी गलियों से गुजर रहा है सॉरी…। अभी तो संघर्ष शुरू हुआ है…।)
०– लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।
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