किसानों के साथ फिर छल !

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०-हरिशंकर व्यास
हल्ला हुआ, बहुत हल्ला हुआ कि धान के खरीद मूल्य में ऐतिहासिक बढ़ोतरी हुई है जबकि किसान संगठनों ने कहा है कि यह आंखों में धूल है! एक तरफ मोदी सरकार की किसानों को खजाना लुटाने की ऐतिहासिक घोषणा की बात तो दूसरी ओर किसानों के लिए खेती को वहनीय याकि सस्टेनेबल बनवाने के सुधी किसान संगठनों के एलायंस के संयोजक किरण कुमार ने बताया कि २०१४ के चुनावी वादे को पूरा करने की ऐतिहासिक खरीद मूल्य बढ़ोतरी का हल्ला चाहे जो हो हकीकत में मोदी सरकार की दाम बढ़ाने की घोषणा पैदावार लागत में मुनाफे, मार्जिन को घटा कर है। मनमोहन सिंह की यूपीए-दो की सरकार ने २००९-१४ के बीच किसान के लिए मुनाफे का ज्यादा प्रावधान रखा था। उस नाते पहली बात तो यह कि मोदी सरकार ने दाम तय करते हुए यह वादे के अनुसार सी २ फार्मूले में दाम तय नहीं किए। मनमोहन सरकार की तरह पुराने ए२+एफएल फार्मूले पर ही खरीद मूल्य को बढ़ाया गया। पर यह भी कम! मतलब पहले इसी फार्मूले में यूपीए-दो ने लागत कुल कर किसानों को २००९-१४ के बीच ६९ फीसदी मुनाफा तय करके खरीद रेट बनाई थी जबकि वहीं मोदी सरकार ने जब अपने आखिरी साल में ५० फीसदी मुनाफा लागत पर तय कर नई रेट घोषित की। ऐसे में धान पैदा करने वाला किसान २०१९ में कैसे २०१४ की तुलना में ज्यादा फायदा लिए हुए होगा? किरण कुमार ने आगे कहा यह सरकार एमएसपी को २०१४ के पहले के लेवल के बराबर अब लेकर आई है! तब इससे कैसे आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाली विकट आर्थिक स्थितियों से किसान को निजात मिल पाएगी? लगभग यही बात देश के १९४ किसान संगठनों की ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति (एफआईकेएससीसी) ने यह जुमला बोल कर बताया है कि नई बोतल में पुरानी शराब! इसके समन्वयक वीएम सिंह की बात मानें तो मनमोहन सरकार पहले से ही ए२+एफएल फार्मूले मतलब लागत और पैदावार में लगे परिवार के श्रम की कीमत जोड़ कर गेंहू सहित एक फसल की एमएसपी रेट बनवाए हुए थी और उसमें ७२ फीसदी का मुनाफा डाला हुआ था तो मादी सरकार का ताजा हल्ला तो झांसा है! इसके साथ स्वराज इंडिया के योगेन्द्र यादव की टिप्पणी पर भी गौर किया जाए। उन्होंने २०१८-१९ के एमएसपी दामों की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा छोटी ही सही किसानों की यह जीत है, जो चुनाव साल में किसानों ने मोदी सरकार को आंशिक तौर पर, कागजों में ही सही, उस खरीद दाम बढ़ोतरी के लिए मजबूर किया है, जिसका चुनाव से पूर्व इन्होंने वादा किया था। सो, एक तरफ किसान संगठनों, किसान हित की मांग करने वाले लोगों का यह सब कहना है तो दूसरी ओर गुरुवार को कैबिनेट के फैसले के बाद मोदी सरकार का हल्ला करवाना है कि किसानों के लिए ऐतिहासिक फैसला हुआ। किसान को खरीफ २०१८ याकि नवम्बर-दिसम्बर में मंडियों में धान का यह मूल्य मिलेगा, जिससे किसान परिवारों के चेहरे दमक उठेंगे। किसान बम-बम होंगे और नोटबंदी के दुष्चक्र से किसान की कमर टूटने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह थमेगा। सोचें, किस पर विश्वास करें? किसान संगठनों के मीनमेख किकालने पर या मोदी सरकार के हल्ले पर? अपना तर्क है कि किसी पर विश्वास के बजाए विचार यह होना चाहिए कि आम किसान का अनुभव क्या बोल रहा है ? वह क्या बोलेगा? संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार अगले दस महीनों में जबरदस्त प्रचार करने वाली है कि उनकी सरकार ने किसानों के लिए यह कर दिखाया, जो पहले किसी ने नहीं किया प्रचार दस तरह से होगा और यहीं बात मोदी सरकार, भाजपा को ले डूबने वाली है। जब किसान का अनुभव उसकी जेब पर बना हुआ है। नोटबंदी के बाद से लगातार उसकी कमाई को पाला पड़ा हुआ है। किसानों और उसकी मंडियां, व्यापार में जब दस तरह के झंझट बने हुए हैं तो पहली बात तो यह कि तयशुदा कीमत किसान को नहीं मिली है और न मिलेगी। दूसरी बात सरकार खुद किसान से सीधे सौ फीसदी तो छोड़ें कई फसलों की पांच प्रतिशत तक खरीद नहीं करती तो नवम्बर-दिसम्बर में किसान जब धान की फसल ले कर मंडी पहुंचेगा तो वह उस वक्त संतुष्ट या गुस्साएगा? कोई माने या न माने, अपने की जमीनी फीडबैक है कि पिछले चाल सालों में मोदी सरकार के प्रति यदि सर्वाधिक अंधविश्वास की हवा किसी वर्ग में बनी तो वह किसानों में (व्यापारियों से भी ज्यादा) है। इसलिए कि सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सबसे ज्यादा हल्ला किसानों के नाम पर किया था। किसान फसल बीमा योजना की घोषणा पर उसका ऐसा हल्ला बनाया कि मैंने भी इस कॉलम में सोचा था कि यह फसल बीमा योजना तो किसानों की सुरक्षा देने वाली हो सकती है। ऐसे ही किसानों के खेतों की मिट्टी की जांच करें, उनके सोयल कॉर्ड का नरेन्द्र मोदी ने ऐसा हल्ला बनवाया मानो किसान के लिए सचमुच समझदारी से फसल पैदा करने की स्थितियां बनेेंगी। लेकिन इन दोनों हल्लों के परिणाम एकदम उलटे हैं। प्रदेश के कर्ता-धर्ताओं ने अपने को फीडबैक दी है कि फसल योजनाएं बीमा कंपनियां की चांदी हुई। योजना ऐसी बनाई, जिसमें कोई बीमा कंपनियां को नहीं कस सकता है और प्रदेशों ने अपने सतर पर जो योजनाएं बना रखी थीं उस सबका पैसा नहीं नई योजना को चला गया और किसान-प्रदेश सरकार सब बीमा कंपनियों के हाथों ठगे गए। इससे भी बड़ी ठगी खेत की मिट्टी की जांच योजना में है। पांच सालों में दो ढाई हजार करोड़ रुपए मोदी की इस योजना में बरबाद हो रहे हैं। मिट्टी जांच का काम सरकारी ठेकों से फर्जी जांच एजेंसियों से कराए जा रहे हैं। उत्तर भारत के प्रदेशों में लूट का यह नया धंधा बना है। मोदी सरकार भले कितने दावे करे कि उर्वरकों की लूट खत्म कर दी लेकिन उसकी जगह कृषि विभाग की नौकरशाहों, डायरेक्टरों और कर्मचारियों के लिए मिट्टी जांच का नया गोलमाल बन गया है। मिट्टी जांच के टेंडर किसी अखिल भारतीय लैब परीक्षण, एक्रीडेशन देने वाली संस्था से सर्टिफाइड-प्रमाणिक लैब को नहीं दिए जाते। इस पर किसी ने भारत सरकार के कृषि मंत्रालय और उनके अफसरों का ध्यान दिलाया और उसमें एक हिम्मती अफसर ने जब टेंडरों में लैब एक्रीडेशन की अनिवार्यता की शर्ता जोडऩे का सरकुलर प्रदेशों को भेजा तो गोलमाल करने वालों ने उसका ऐसा विरोध किया कि अफसर ने तौबा कर डाली। तभी पिछले चार वर्षों में किसान के साथ सबसे बड़ा धोखा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मिट्टी जांच योजना कार्ड का है। जांचने के नाम पर सिर्फ कार्ड भरने का गोरखधंधा है, असल जांच है ही नहीं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश पंजाब, आदि तमाम प्रदेशों में आए दिन टेंडर निकलते हैं। बेमतलब के आईएसओ की मामूली पुष्टि वाली कथित लैबों की मिलीभगत वाली टेंडरिंग से ठेका बंटता है और किसान को मिट्टी जाचं के नाम पर उल्लू बना कर आवंटित सरकारी खर्च कीखाया जा रहा है। लालू यादव का चारा घोटाला इसके आगे चवन्नी लगेगा। सो, फसल बीमा योजना ही मिट्टी जांच कार्ड या किसान से सीधी खरीद सबकी हकीकत की ग्राउंड जीरो वाली फीडबैक दहला देने वाली है। इनमें खरीद मूल्य और मंडियों में खरीदी का मामला अधिक छलावा कौडिय़ों में होना किसान को यह अनुभव कहा गया है, जिसके चलते प्रधानमंत्री मोदी कुछ भी कर लें २०१९ के लोकसभा चुनाव में किसान का वह भरोसा कतई नहीं लौटता है जो २०१४ में बना था। यों किसान और किसानों का मामला भारत में पेचीदा है। तमाम, सरकारों ने अपने आपको किसानों की माईबाप सरकार बना कर भारत में खेती को बरबाद किया है। भारत में इस समझ के साथ कभी काम नहीं हुआ कि खेती का धंधे की तरह विकास हो। यूरोप में, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया सब जगह माईबाप वाला नहीं, बल्कि सुरक्षा का था। भारत में सरकार, कृषि मंत्रालय और उनके बाबू सबने बच्व्चा पैदा करने से लेकर दाह संस्कार मतलब बीज, बुआई, खाद, बिजली, ऊर्जा, फसल खरीद, कटाई, कीमत का दायित्व ले कर खेती को हर तरह से भ्रष्टाचार से लथपथ बनाया है, जबकि पश्चिम में किसान और किसानी को सरकार ने धंधे की तरह छोड़ रखा। हां, यहां सरकार को पता है कि खेती घाटे का सौदा है। किसान की पैदावार दुनिया के कंपोटिशन से मुनाफा नहीं कमा पाती तो इसे ध्यान में रख कर सरकार हर साल प्रति एकड़ नुकसान का हिसाब लगा कर घाटे वाली सब्सिडी किसान के बैंक खाते में अपने आप जमा करा देती है। सब कुछ साफ-सुथरा और दो टूक! जबकि भारत में माईबाप बन कर किसान पर अहसान भी तो उसे झूठे हल्ले झूठी बातों से ठगना भी। ऐसे में किसान गुस्साएं न तो क्या करें? आत्महत्याएं वहीं करता जा रहा है!
०-(नया इंडिया के कालम ”अपन तो कहेंगे!” से साभार)
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