कांग्रेस के प्रति नरम क्यों पड़ रही हैं मायावती ?

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०-अभिमन्यु कुमार साहा
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने अमेठी और रायबरेली में अपने मतदाताओं से कांग्रेस के पक्ष में वोट डालने की अपील की। हालांकि इन दोनों जगहों पर गठबंधन ने उम्मीदवार न उतारने का फैसला किया था और उम्मीदवार उतारे भी नहीं थे, लेकिन सवाल ये है कि इस घोषणा के बावजूद मायावती को ऐसी अपील क्यों करनी पड़ी। क्या मायावती की यह अपील भविष्य में बनने वाली सरकार का स्वरूप तय करेगी? पूर्व में मायावती जितना भाजपा पर आक्रामक नहीं हैं, उससे कहीं ज्यादा कांग्रेस को उन्होंने निशाने पर लिया है। मायावती ने रविवार को भी दोनों पार्टियों को निशाने पर लिया, लेकन अंत में कांग्रेस के प्रति उनका लहजा थोड़ा नरम हो गया। उन्होंने कहा, कांग्रेस और भाजपा एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। इसके बावजूद हमने देश और जनहित में खासकर भाजपा और आरएसएसवादी ताकतों को कमजोर करने के लिए अमेठी और रायबरेली की सीट कांग्रेस के लिए इसलिए छोड़ दी थी ताकि इस पार्टी के दोनों सर्वोच्च नेता देश की अन्य सीटों पर जीतने में अपनी ऊर्जा लगा सकें।
प्रधानमंंत्री पद पर नज़र ?
सवाल यह उठता है कि कांग्रेस का हमेशा विरोध करने वाली मायावती इतनी नरम क्यों पड़ रही हैं? दरअसल मायावती को अल्पसंख्यकों का वोट चाहिए। इसलिए वो यह नहीं दिखाना चाहती हैं कि वो कांग्रेस को हरा कर भाजपा को जिताना चाहती हैं। उनको मालूम है कि अगर उनकी दिल्ली में प्रधानमंत्री या उप प्रधानमंत्री बनना है तो उन्हें भाजपा या कांग्रेस से हाथ मिलाना होगा। भाजपा में मायावती को इन पदों की गुंजाइश कम नजर आती है, इसलिए कांग्रेस को वो विकल्प के रूप में देखती है। कांग्रेस के साथ जाने में यह भी फायदा है कि आगे चल कर अल्पसंख्यक उनसे नाराज नहीं होंगै। कांग्रेस कीसीटें कम आती हैं और अगर एचडी देवेगौड़ा या इंद्रकुमार गुजराल जैसी स्थिति बनती है तो वो सत्ता पर काबिज हो सकती हैं।
मायावती का डर
मायावती की राजनीति कांग्रेस विरोध की रही है। कांग्रेस विरोध के कारण ही बसपा का जन्म हुआ है। आज की राजनीति में भी बसपा अपने मूल चरित्र से बाहर नहीं जा सकती। बसपा का दलित वोट ही उसका आधार है, जो कभी कांग्रेस का हुआ करता था। कभी भी वह वोट बैंक कांग्रेस की तरफ लौट सकता है, यह खतरा बसपा को हमेशा महसूस होता है। पिछले कुछ चुनावों में कांग्रेस हाशिए पर चली गई ओर भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की जगह ले ली। दलित और गैर-दलित ओबीसी सीटों पर भाजपा ने सेंध लगा दी हे। २०१४ में भी इस वर्ग का बड़ासमर्थन नरेंद्र मोदी को मिला था। अगर भाजपा को रोकना है तो कांग्रेस को भी छुआ हुआ हाथ गठबंधन पर होना चाहिए थी।
प्रो-पोल अंडरस्टेंडिंग
एक सवाल यह भी उठता है कि कांग्रेस को समर्थन देकर क्या सपा-बसपा का गठबंधन चुनाव के अंतिम चरणों में उन जगहों पर फायदा लेना चाहता है जहां कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं? कांग्रेस ने पहले ही एक तरह से इशारा कर दिया है कि जहां हमारी जीतने की संभावना न हो, वहां गठबंंधन के प्रत्याशी को वोट दें। एक तरह से यह प्री-पोल अंडरस्टेंडिंग है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी शनिवार को प्रतापगढ़ की रैली में कांग्रेस को निशाने पर लेते हुए कहा था कि जो पार्टी पहले चरण के मतदान से पहले खुद को प्रधानमंत्री पद की दावेदार बता रही है अब यह मानने लगी है कि हम तो उत्तर प्रदेश में सिर्फ वोट काटने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। ये वोट कटाऊ पार्टी बन गई है।
भाजपा की रणनीति क्या है?
पिछले दिनों कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने समाजवादी पार्टी की एक रैली में मंच साझा किया था। जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंन््र मोदी ने बसपा को सपा के हाथी ठगे जोन की बात कही। प्रतापगढ़ की रैली में उन्होंने वहां समाजवादी पार्टी के गठबंधन के बहाने बहन मायावती का तो फायदा उठा लिया, चालाकी की, उनको अंधरे में रख बड़े-बड़े मान-सम्मान की बातें की। आपको प्रधानमंत्री बना देंगे, ये भी कह दिया। लेकिन अब बहन मायावती को यह समझ आ गया है कि सपा और कांग्रेस ने मिल कर बहुत बड़ा खेल खेला है। दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता खुशी-खुशी समाजवादी पार्टी की रैलियों में मंच साझा कर रहे हैं। बहनजी का ऐसा धोखा इनलोगों ने दिया है कि उन्हें भी समझ नहीं आ रहा है। हालांकि इस बयान पर पलटवार करते हुए मायावती ने कहा कि प्रधानमंत्री का यह बयान उनकी हताशा बताता है। भाजपा हमारे गठबंधन की दोनों पार्टियों के बीच फूट डालो और राज करो की नीति अपना रही है। लेकिन क्या वाकई भाजपा ने तहाशा में ये बातें कहीं हैं। शायद नहीं, दरअसल अगर कल को सरकार बनाने के लिए भाजपा को बसपा के समर्थन की जरूरत पड़ी तो उसके लिए भी आज से ही जमीन तैयार कर रही है। चुनावों के बाद क्या गणित बनेगा, उसमें मायावती कहां जा सकती हैं, आज कहना मुश्किल है। मायावती का जिस तरह काख्याल रहा है, उसके आधार पर वो अचानक बदल भी सकती हैं।
०-सुबह सवेरे के कालम ”प्रसंगवश” से साभार)
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