कांग्रेस के खिलाफ हो रहे धरना प्रर्दशनों के पीछे कहीं शिवराज का हाथ तो नहीं ?

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। दिग्विजय सिंह के शासनकाल के अंतिम दौर में कांग्रेस सरकार के खिलाफ जितने भी आंदोलन चले उनमें से अधिकांश आंदोलनों के पीछे शिवराज सिंह की अहम भूमिका रही, उन दिनों से जुड़ी घटनाओं के जानकारों का यह कहना है कि इन्हीं शिवराज सिंह चौहान ने दिग्विजय सिंह सरकार के खिलाफ शिक्षक आंदोलन के पीछे शिवराज की जो भूमिका रही उससे जो लोग परिचित होंगे उन्हें यह स्मरण होगा कि जब उस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोग कांग्रेस सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे और बाद में वह ७४ बंगले में स्थित शिवराज के बंगले में जाकर बैठकें किया करते थे। इन घटनाओं का लोगों को स्मरण होगा तो वहीं अपनी ही पार्टी के वयोवृद्ध नेता तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के खिलाफ जिन स्वयंसेवी संगठनों ने आंदोलन छेड़ा था वह सभी अपने हर धरना-प्रदर्शन करने के पूर्व ७४ बंगले के एक बंगले से निकलकर ही इन सभी आंदोलनों व प्रदर्शनों को अंजाम देते थे। कांग्रेस से जुड़े कई नेता हाल ही में चल रहे कमलनाथ सरकार के खिलाफ आंदोलनों की बाढ़ के पीछे शिवराज सिंह की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं तो वहीं भाजपा के वह नेता जिन्होंने बाबूलाल गौर के खिलाफ चले आंदोलन की रूपरेखा से परिचित वह सभी कमलनाथ सरकार के खिलाफ चल रहे आंदोलन के खिलाफ तमाम सवाल उठाते नजर आ रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने सत्ता पर काबिज होने के लिये अपनी ही पार्टी की वह नेत्री जिन्होंने इस प्रदेश की जनता को दिग्विजय सिंह के शासनकाल से मुक्ति दिलाकर भाजपा को भारी भरकम बहुमत प्राप्त कर भाजपा को सत्ता पर काबिज किया था ऐसा न तो सुन्दरलाल पटवा और न ही शिवराज के शासनकाल में ऐसा बहुमत प्राप्त हुआ था। जिस तरह का भाजपा को रिकार्ड बहुमत उमा भारती के नेतृत्व में प्राप्त किया था वैसा बहुमत आज तक प्राप्त नहीं हो सका है, उन्हीं उमा भारती को सत्ता से हटाने के लिये किस तरह की दिक्कते खड़ी करके तभी दम लिया जब उन्हें भाजपा से बाहर का रास्ता दिखाकर दम लिया और सत्ता पर काबिज हो गये बात जहां तक उनके शासनकाल की करें तो उनके शासनकाल में भी संगठन और सत्ता दोनों ही शिवराज सिंह ही थे, शिवराज १३ वर्षों तक सत्ता पर काबिज रहे तो संगठन के मुखिया के तौर पर केवल तीन ही अध्यक्ष बन पाये, उनकी भी क्या दुर्गति हुई, यह भी सभी जानते हैं कि प्रभात झा को किस तरह से परमाणु विस्फोट की तरह पद से हटाया गया, तो वहीं पार्टी के अध्यक्ष रहे नंदकुमार सिंह चौहान की क्या स्थिति रही और उनकी कितनी चली और उन्होंने कितना संगठन मजबूत किया। इस स्थिति से भाजपा के नेता और जानकार परिचित हैं। बात यदि अंतिम संगठन के मुखिया राकेश सिंह की करें तो राकेश सिंह को संगठन के मुखिया के पद पर काबिज करने में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की जरूर भूमिका रही हो वह भी शिवराज के आभामण्डल के दबाव में कुछ ज्यादा सुधार नहीं कर पाए और आखिरकार सत्ता और संगठन की ओर से शिवराज सिंह ने ही अपनी मनमर्जी के माफिक चुनावी रणनीति तैयार की जिसका परिणाम यह रहा कि उन्हीं रेत माफियाओं, शराब माफियाओं और हर तरह के अवैध कारोबारों से जुड़े भजापा के नेताओं को पुन: चुनावी समर में उतारा गया जिसकी वजह से ऐसे विधायकों को पराजय का मुंह देखना पड़ा तो वहीं शिवराज सिंह के साथ ही नरेन्द्र सिंह तोमर भी हवा हवाई नेता सिद्ध हुए। उनकी इस चुनाव में भूमिका को लेकर भी तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं तो वह अपने क्षेत्र में कितने मजबूत हैं यह तो उनके वहां से पलायन की खबरों से ही पता चलता है। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए भाजपा के लोग यह मानकर चल रहे हैं कि शिवराज सिंह ने न तो पार्टी में अपने समकक्ष नेताओं को बढऩे दिया और न ही युवा नेतृत्व को, यही वजह है कि आज पार्टी में दूसरे लाइन के नेताओं की कमी खल रही है, तो वहीं शिवराज सिंह को आज भी सत्ता जाने का गम सता रहा है और वह अपनी चिर परिचित रणनीति के तहत आज भी नेता प्रतिपक्ष को नेता प्रतिपक्ष न मान उसकी भूमिका भी निभा रहे हैं और उन्हें कुछ करने का मौका भी नहीं दे रहे हैं, क्योंकि शिवराज सिंह उस कोशिश में लगे हुए हैं कि कैसे भी हो कांग्रेस का तख्ता पलट कर सत्ता पर काबिज हों, सत्ता की भूख उन्हें इस तरह से सताए हुए है कि वह प्रदेश में अपने आपको सर्वमान्य भाजपा का नेता मानकर अपनी पार्टी के नेताओं को और नेता प्रतिपक्ष को कुछ करने नहीं दे रहे हैं इसके पीछे उनकी मंशा सिर्फ और सिर्फ सत्ता पर काबिज होने की लालसा सता रही है, यही वजह है कि सत्ता पाने के लिये जिस तरह से उन्होंने उमा भारती और बाबूलाल गौर के खिलाफ मुहिम चलाई थी आज वही मुहिम कमलनाथ सरकार के खिलाफ छेडऩे में लगे हुए हैं, इसके परिणाम क्या होंगे यह तो भविष्य बताएगा।

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