कांग्रेस और भाजपा की बेचैनी बढ़ा रही है ग्वालियर चंबल घाटी

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०- अरुण पटेल
मध्यप्रदेश की 29 लोकसभा सीटों पर जीत का परचम लहराने का सपना भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने दो साल पहले से देखना प्रारंभ कर दिया था, लेकिन ‘वक्त है बदलाव का’ नारे के साथ प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनने के साथ ही उनका यह सपना तो लगभग पूरी तरह चकनाचूर हो गया कि छिंदवाड़ा, गुना और झाबुआ के कांग्रेस के किले में सेंध लगा लेंगे। वैसे तो विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव अलग-अलग मुद्दों पर लड़े जाते हैं लेकिन यदि पिछले साल के अन्त में हुए सत्ता परिवर्तन और चुनावी आंकड़ों को देखा जाए तो भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने उन कुछ मजबूत किलों को बचाने में लगानी होगी जिन्हें बदलाव की बयार ने झकझोर कर रख दिया। लगभग एक दर्जन लोकसभा सीटें ऐसी हैं जिन पर कांग्रेस ने भाजपा पर स्पष्ट बढ़त ले ली है जहां तक गुना सीट का सवाल है तो इस पर भाजपा का जीतना लोहे के चने चबाने जैसा होगा। क्योंकि यह सिंधिया राज घराने का एक प्रकार से गढ़ रहा है और ज्योतिरादित्य सिंधिया पिछले लोकसभा चुनाव में लगभग एक लाख मतों से जीते थे। ग्वालियर-चम्बल इलाके में आने वाले चार लोकसभा क्षेत्रों में कांग्रेस और भाजपा दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। जिसके चलते कहा जाने लगा है कि चंबल घाटी कांग्रेस और भाजपा की बेचेनी बढ़ा रही है। भाजपा के सामने यह चुनौती है कि वह यहां के अपने तीन गढ़ों को बचाकर रखे तो कांग्रेस के सामने यह चुनौती है कि विधानसभा चुनाव में उसे जो बढ़त हासिल हुई थी उसे ग्वालियर, भिण्ड और मुरैना क्षेत्रों में बरकरार रखते हुए जीत का परचम लहराये।

मुरैना लोकसभा सीट पर जीत का परचम लहराना भाजपा के लिए इस मायने में नाक का सवाल बन गया है क्योंकि 2009 के परिसीमन के बाद यह सीट सामान्य हो गयी है इससे पूर्व यह अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित थी। 2009 में तत्कालीन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर इस सीट पर चुनाव जीते थे तो 2014 के लोकसभा चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के भांजे और पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा भारी मतों से चुनाव जीते थे, लेकिन हाल ही के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने दोनों क्षेत्रों में अच्छी-खासी बढ़त बना ली है। अपने दिग्गज नेताओं के वर्चस्व वाली इस सीट को बचाना भाजपा के लिए अब आसान नहीं रहा है। भाजपा यहां से नरेंद्र सिंह तोमर को चुनाव मैदान में उतार सकती है ताकि उसकी यह सीट बची रहे तो अनूप मिश्रा ग्वालियर सीट पर अपना दावा ठोंक रहे हैं जिसका प्रतिनिधित्व केंद्रीय मंत्री तोमर कर रहे हैं। कौन कहां से किस्मत आजमायेगा और कौन उम्मीदवार होगा, इसका फैसला भाजपा हाईकमान शीघ्र ही कर देगा तो कांग्रेस के उम्मीदवार कौन होंगे यह भी इसी बीच स्पष्ट हो जायेगा। जहां तक पिछले लोकसभा चुनाव का सवाल है आठों विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस को भाजपा ने बहुत पीछे छोड़ दिया था लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में यहां काफी उलटफेर हुआ और केवल एक विजयपुर को छोड़कर सभी सीटों पर कांग्रेस विधायक चुनाव जीते हैं। इस क्षेत्र में बहुजन समाज पार्टी का भी अच्छा-खासा असर है और वह जीत-हार में निर्णायक भूमिका अदा करेगी।

भिण्ड लोकसभा क्षेत्र परिसीमन के बाद से भाजपा के कैंजे में रही है। यह अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट है। इस सीट पर अपेक्षाकृत ग्वालियर राजघराने का प्रभाव कम रहा है और यहां से एक लोकसभा चुनाव में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी कांग्रेस प्रत्याशी से चुनाव हार चुकी हैं। वैसे इस क्षेत्र पर पहले समाजवादियों और कांग्रेस का असर ज्यादा रहा, लेकिन धीरे जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पकड़ यहां मजबूत कर ली है। 2014 में इस क्षेत्र के सांसद भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे भागीरथ प्रसाद भाजपा टिकट पर चुनाव जीते, जबकि 2009 में वे कांग्रेस के टिकट पर करीबी मुकाबले में चुनाव हार गये थे। दिलचस्प यह रहा कि दिल्ली से तो भागीरथ प्रसाद 2014 में कांग्रेस का टिकट लेकर रवाना हुए और भोपाल पहुंचते ही उन्होंने कांग्रेस टिकट ठुकरा कर भाजपा की गाड़ी में बैठना ज्यादा पसंद किया और सांसद बनने की उनकी तमन्ना दल-बदल कर पूरी हो गयी। मौजूदा परिदृश्य में उनका फिर से चुनाव जीतना आसान नहीं है। यदि भाजपा इस सीट को बचा पाती है तो उसका श्रेय केवल पूर्व जनसंपर्क मंत्री रहे नरोत्तम मिश्रा को जायेगा क्योंकि उनका क्षेत्र इसी लोकसभा क्षेत्र में आता है और दतिया में वे अच्छी-खासी पकड़ रखते हैं साथ ही भिण्ड जिले में भी उनका अच्छा असर है। 2014 लोकसभा चुनाव में केवल सेवढ़ा विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस को बढ़त मिल पाई थी। इस विधानसभा सीट पर वर्तमान में कांग्रेस का कैंजा है। हाल के विधानसभा चुनाव में भिण्ड लोकसभा क्षेत्र में आने वाले पांच विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस का परचम लहराया तो भाजपा को दो और बसपा को एक सीट से संतोष करना पड़ा। इस क्षेत्र पर बसपा की भी पकड़ है लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि कांग्रेस व भाजपा के बीच जीत-हार का फैसला करने में वह निर्णायक भूमिका अदा कर पाती है या नहीं।

ग्वालियर लोकसभा सीट पर 2004 में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी लेकिन उसके बाद हुए एक लोकसभा उपचुनाव और दो लोकसभा चुनावों में भाजपा ने जीत का परचम लहराया। सिंधिया राजघराने का इस सीट पर अच्छा-खासा असर है इसलिए इस बात की भी चर्चा है कि कांग्रेस हाईकमान सिंधिया परिवार के किसी सदस्य को चुनाव मैदान में उतार सकती है। वैसे कांग्रेस के अशोक सिंह भी बहुत मजबूत उम्मीदवार हैं और पिछले तीन चुनावों में वे यहां से बहुत कम मतों के अन्तर से चुनाव हार रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने तोमर को कड़ी टक्कर दी थी और चार विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी जबकि चार क्षेत्रों में ही तोमर को भी बढ़त मिली और उन्होंने चुनाव जीत लिया। हाल ही हुए विधानसभा चुनाव में केवल एक सीट पर भाजपा का और शेष सात पर कांग्रेस का कैंजा है।

गुना लोकसभा सीट पर सिंधिया परिवार पर विशेष असर है और यही कारण है कि माधवराव सिंधिया और बाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया का यह अजेय गढ़ बन चुका है। 2014 में कांग्रेस ने प्रदेश में जो दो सीटें जीती थीं उनमें गुना के अलावा कमलनाथ का छिंदवाड़ा भी शामिल था। गुना विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस क्यों नहीं जीत पाती यह बात बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से पूछते हुए सिंधिया यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि यहां उनके प्रयासों में क्या कोई कमी रहती है। यहां आठ विधानसभा क्षेत्रों में से तीन पर भाजपा और पांच पर कांग्रेस का कैंजा है। कुल मिलाकर अभी तक के लोकसभा चुनावों के इतिहास को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भाजपा के लिए यह सीट जीतना असंभव है। राजनीति में असंभव को संभव बनाने के लिए भाजपा क्या दॉव-पेंच आजमाती है या किसे अपना उम्मीदवार बनाती है यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह किस दिग्गज नेता को यहां से चुनाव मैदान में उतरती है।

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भाजपा के सामने जहां अपने मजबूत गढ़ों को प्रदेश में बचाने की चिंता है तो कांग्रेस उन सीटों पर कब्जा जमाना चाहती है जिस पर वह पिछले लगभग तीन दशक से चुनाव हार रही है। अभी तक दोनों पार्टियों ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन जल्द ही यह साफ हो जायेगा कि कठिन सीटों पर काबिज होने के लिए कहां कांग्रेस किस चेहरे को चुनावी मैदान में उतारती है और कहां भाजपा पुराने आजमाये दिग्गजों के सहारे अपने किलों को बचाने की कोशिश करती है।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
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