कल्पेश : आत्महत्या के जिम्मेदार फंसेंगे या बचेंगे … ?

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०-विजय तिवारी
वैसे तो संपादकों की हत्या होते ही सुना है, चाहे वो गौरी लंकेश हो या शुजात बुखारी या बिहार में भास्कर के पत्रकार नवीन निश्चल या विजय सिंह … ये नाम सरकार या आतंकवादी अथवा इलाके के डॉन के आंखों की किरकिरी रहे, इसलिए इन्हें रास्ते से हटाया गया, लेकिन भास्कर समाचार पत्र के समूह संपादक कल्पेश याग्निक की असामयिक मौत् एक रहस्य बनती जा रही है। एक और शक्तिशाली बता रही है, वहीं घटनाएं उन कारणों का भी खुलासा कर रही है, जिन्होंने कल्पेश को आत्महत्या करने पर मजबूर किया ? क्योंकि कानून खुदकुशी का कारण बनने वाले को भी हत्यारे की ही श्रेणी में रखता है और अंग्रेजी में कहावत है, ‘एवरी मडर्ढर हैज मोटिसÓ माने हर हत्या का कोई उद्देश्य होता है या तो कुछ छुपाना अथवा किसी जानकारी को मरने वाले के साथ ही दफन कर देना। अब कल्पेश की मौत किस में है? और कौन है वे लोग? वैसे भास्कर समाचार पत्र के मालिकान का नाता भोपाल से खास है। इस अखबार को स्थापित करने वाले द्वारिका प्रसाद अग्रवाल और उनके पुत्र रमेश अग्रवाल इस शहर के स्थायी निवासी थे, लेकिन समाचार पत्र के संपादकीय मामलों में इंदौर था, जहां समूह संपादक कल्पेश याग्निक बैठते थे। १३ जुलाई को गहरी रात करीब दस से ग्यारह बजे के बीच कार्यालय के नीचे सड़क पर घायल और बेदम मिलना संदेह पैछा करता है। दफ्तर के घर जाते समय उन्हें कभी भी अकेले नहीं देखा गया, लेकिन उस दिन वो अकेल रहे। यह स्थिति सम्पूर्ण घटनाक्रम पर सवालिया निशान लगाती है। जहां तक बात कल्पेश के दुश्मनों की है तो कोई भी संगठन या लोग अथवा किसी भी लॉबी के खिलाफ वो नहीं थे। वो व्यवस्था और तंत्र के विरोधी थे। कुछ अतिवादी विचारधारा के खिलाफ वे लिखते थे, लेकिन किसी के खिलाफ उन्होंने मुहिम चलाई हो, ऐसा तो याद नहीं पड़ता। वैसे मुहिम मीडिया में कैसे चलाई जाती है, इसका पाठ हमें या पत्रकारों को एनडीटीवी के रवीश कुमार से सीखना होगा, जो सतत रूप से प्रशासनिक व्यवस्था के तंत्र की पोल खोलते रहते हैं। उनके विरुद्ध जो विषवमन हिंदुवादी और गौसेवक धरक रक्षक तथा अंधभक्त सोशल मीडिया पर गाली-गलौज करते हुए जान से मार डालने की धमकी देते रहते हैं, उसकी तुलना में कल्पेश को प्राण का कोई आसन्न खतरा नहीं था। असंभव के विरुद्ध उनके कॉलम को काफी लोग सराहते थे, लेकिन चूंकि वो एक स्पष्ट सोच होती थी, इसलिए किसी को उनसे इस सीमा तक कुपित होने की जरूरत नहीं थी कि वो उनकी जान का दुश्मन बन जाये। अब इन बातों और तथ्यों पर गौर करें, तब एक घटनाक्रम चौंका देने वाला है। उन्होंने पूर्व सहकर्मी द्वारा उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की धमकी का पत्र एडीजी अजय शर्मा को कुछ समय पहले दिया था। उन्होंने ये आग्रह किया था कि इस पत्र को सूचना के लिए दे रहे हैं, ये कोई प्रथम दृष्टया रिपोर्ट या प्राथमिकी नहीं मानी जाए। अब ये बात संदेह पैदा करती है कि तकलीफ की शिकायत तो है पर दस्ताने वाले हाथों से ये भी हिदायत है कि कोई कार्रवाई करने की नीयत नहीं है, तो क्या ये पत्र एक इंश्योरेंस पॉलिसी की मानिंद था कि जिसे किसी घटना या दुर्घटना होने या मेरे मरने के बाद खोला जाये? अगर ऐसा था तो दो सवाल उठते हैं… ऐसी कौन सी बात या तथ्य था, जिसके उजागर करने से वो बच रहे थे? लेकिन वो ये भी चाहते थे कि यदि उन्हें कुछ हो जाये तो वो हकीकत कानून और दुनिया के सामने जरूर लाई जाये। अब ऐसी क्या बात है रहस्य है, जिसको वो खुद सार्वजनिक करने का साहस नहीं कर पा रहे थे? अब यह तथ्य किसी नेता या अधिकारी के खिलाफ अथवा किसी संस्थान या उसके किसी व्यक्ति के खिलाफ है? अगर ऐसा है तो निश्चित ही वो व्यक्ति कल्पेश ही होगा, इसीलिए उन्होंने सिर्फ इत्तिलाभर की ही की, कोई कार्रवाई नहीं मांगी? हालांकि पहले कुछ हल्कों में ये कहा जा रहा था कि खिड़की पर खड़े होकर जब वो रात की कालिका मेमं कोई रोशनी को देखने की कोशिश कर रहे थे तब निराशा के कारण उन्हें हार्ट अटैक हुआ और वो नीचे गिर गए, लेकिन वहीं दफ्तर के लोगों का कहना है कि केवल अपना साप्ताहिक कॉलम लिखने के समय ही वो अकेले रहते थे, वरना उनके दफ्तर में लोग आया-जाया ही करते थे। वे बिरले ही अकेले रह पाते होँ। बात भी तार्किक और तथ्यात्मक भी है कि देश के तीन बड़े हिन्दी अखबारों में किसी भी एक का समूह संपादक भला कैसे एकांत प्राप्त कर सकता है। अब इंदौर से एक मुहिम चली है, जिसमें ये लिखवाया जा रहा है कि कल्पेश याग्निक मिर्गी के दौरे के मरीज थे। लेखक ने अपने आलेख में दावा किया है कि अपनी नौकरी के प्रारंभिक काल में इंदौर से भोपाल जाते समय उन्हें मिर्गी का दौरा पड़ा था। मेडिकल विज्ञान के अनुसार र्मिी का मूल का इतिहास रोमन साम्राज्य के जुलियस सोजर से मिलता है,जिनको लगातार युद्ध के क्षेत्र में रहते-रहते सहवास का अवसर नहीं मिला था। मिस्त्र की खूबसूरत रानी किलयोपेट्रा से विवाह करने के बाद उसे मिर्गी के दौरे पडऩा बंद हो गए थे। अब कल्पेश की मौत मिर्गी का दौरा आने से हुई, जैसाकि इन्दौर के एक अकादमिक डॉक्टर ने लिखा है, संदेहपूर्ण है? उन्होंने अपने आलेख की शुरुआत ही में कह दिया कि कल्पेश याग्निक को कोई भी संस्थान नौकरी पर रख लेता क्योंकि वो नितांत प्रतिभाशाली थे। मेरा उन डॉक्टर साहब से एक ही सवाल है कि कृपया वो याग्निक के नियोक्ताओं से पूछ ले कि कितने सालाना के पैकेज पर काम कर रहे थे? और क्या उतना वेतन, भत्ता अन्य संस्थानों (समाचार पत्र) में मिलता है? रिलायन्स के मुकेश अंबानी की तरह तो कल्पेश अपने वेतन-भत्ते निश्चित नहीं कर सकते थे? उन्हें तो मालिक ही तय करता है या नहीं? इन्दौर से चली इस मुहिम से अब ये संकेत तो मिल रहा है कि जबरन इस्तीफा लिए जाने की बात में दम हो सकता है वरना भास्कर समूह की ओर से ऐसा दुष्प्रचार करने का कोई कारण नहीं? इन संदर्भों में कल्पेश याग्निक द्वारा एडीजी अजय शर्मा को दी गई चि_ी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अब सरकार जैसा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी जनआशीर्वाद यात्रा के दौरान पत्रकारों को आश्वासन दिया है कि आत्महत्या के लिए जिम्मेदार लोगों को छोड़ा नहीं जाएगा। हालांकि मुख्यमंत्री को ये आश्वासन पिछले १४ वर्षों से प्रदेश की जनता देख-सुन रही है। अब उस अनुीाव से तो इस रहस्य की गुत्थी के जिम्मेदारों को सजा मिलने की उम्मीद नहीं हो सकती, क्योंकि शांति-व्यवस्था और कानून का राज ओर न्याय को तो १४ साल का वनवास मिला हुआ है।
०-(नया इंडिया के कालम ”आईना” से साभार)
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