कर्म की बजाए आडंबर पर निर्भर होते राजनेता

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०- देवदत्त दुबे
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। भगवान कृष्ण ने वैसे तो बेहतर जीवन जीने के कई मार्ग बताए इसमें एक मार्ग उन्होंने राजनतिज्ञों के लिए भी दिखाया है जिसमें कर्म योगी बनकर सफलता अर्जित की जा सकती है लेकिन आज के दौर में कृष्ण को मानने वाले नेता भी आडंबर के सहारे सफलता अर्जित करना चाह रहे हैं जिसमें न स्थायित्व है और न ही आर्कषण जबकि जो भी राजनीति में आता है उसे लोकप्रियता की भी इच्छा होती है और जीत की निरंतरता का मोह भी होता है। दरअसल, भले ही तब के युद्ध में और आज के चुनावी युद्ध में अस्त्र शस्त्र और साम, दाम, दंड, भेद का उपयोग होता रहा है लेकिन अंतिम परिणाम या कि जीत उसी की होती रही है जो सद् मार्ग पर चलता रहा है जिसने अहंकार नहीं किया। चाहे वह निहत्था ही क्यों न हो या फिर साधनहीन ही क्यों न हो। अंतत: राम ने रावण को मारा और कृष्ण ने कंस को। इसमें कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि भले ही राम और रावण की राशि एक थी। भले ही कृष्ण और कंस की राशि एक थी लेकिन दोनों जगह अहंकार हारा। अस्त्र-शस्त्र हारे, धनबल-बाहुबल हारा, जीत न्याय की हुई, धर्म की हुई और कर्म की हुई। इन सब बातों को सुनते जानते हुए भी आज के नेता भरोसा नहीं करते। यही कारण है कि वे राम को मानते हैं, कृष्ण केा मानते हैं। इनके बताए मार्ग पर नहीं चल सकते और आज के चुनावी युद्ध में जीतने के लिए छल, कपट, पाखंड और आडम्बर का सहारा लेते हैं। यही कारण है कि जीत में निरंतरता नहीं रह पाते बहुत कम नेता ऐसे हैं जो दिखने में भले ही अच्छे न दिखें लेकिन वे अंदर से अपना सत्य तत्व मजबूत किए हुए हैं और अन्य नेताओं की बजाए लोकप्रियता भी कायम रखे हैं और चुनावी जीत में निरंतरता बनाए रखे हैं। बहरहाल, कोई भी त्यौहार हो उसको मनाने के साथ-साथ हम सबको ये प्रेरणा भी लेना चाहिए। खासकर उन लोगों को जो महत्वपूर्ण पदों पर बैठकर निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं। वे वर्तमान की दौर से शिक्षा भी ले सकते हैं। जहां अर्श से फर्श तक और फर्श से अर्श तक आने में समय नहीं लगता। पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पूर्व वित्त मंत्री वर्तमान में सांसद और देश के जाने-माने वकील पी. चिदंबरम को आज किन हालातों से गुजरना पड़ रहा सबक और हो सकता है क्योंकि पदों पर जब नेता होते हैं। कोई डर नहीं होता वे समझते हैं वे जो कर रहे हैं वही सही है लेकिन अंतत: सत्य ही सामने आता है जो जैसा करेाग वैसा ही भरेगा। नेताओं को चाहिए कि वे पदों पर पहुंचकर समाज और देश के बारे में सोचें। उन गरीब लोगों के बारे में सोचें जिसने बड़ी उम्मीदों के साथ वोट देकर चुनाव जिताया है जिसके पास खाने को दो टाइम का भोजन नहीं है। रहने को पक्की छत नहीं है और नेताओं के लिए डॉक्टरों से मना किया हुआ है कि आप फलां फलां चीज न खाएं। नेताओं के पास रहने के लिए कितने मकान हैं, कितने ऑफिस हैं कि उन्हें ही नहीं पता कि किसने कब बैठना है। इसके बावजूद लालच ऐसा कि एक और शासकीय आवास मिल जाए फिर उसमें लाखों का इनोवेशन कराया जाए। कुल मिलाकर राजनीति में जिस तरह से भ्रष्टाचार बड़ा है और जिसके कारण अहंकार और आडंबर में जीने की भावना बनी है। उससे कृष्ण का संदेश कर्म करने का बहुत पीछे छूटता जा रहा है और अब देश की राजनीति में जिस तरह से बदलापुर की राजनीति का दौर आया है। उसमें कर्मठता और ईमानदारी ही काम आएगी। न पैसा काम आएगा, न आडम्बर काम आएगा और न ही रुतबा कोई बचत कर पाएगा। तब जिस मार्ग में तनाव है, बेइज्जती है और अंत में हार है। तब भी नेताओं द्वारा उसी मार्ग का अनुसरण क्यों किया जा रहा है। यह आम लोगों की समझ से परे है जबकि राम और कृष्ण को मानने वाले नेताओं की इस देश में कोई कमी नहीं केवल कमी है तो उनके मार्ग पर चलने की आज छोटी-छोटी घटनाओं पर नेताओं मेें घबराहट पैदा हो जाती है जबकि कृष्ण के जन्म के पहले मौत उनका इंतजार कर रही थी और फिर पूरे जीवन उन्होंने संघर्षों का सामना कितने आनंदित भाव से किया आज भी प्रेरणादयक है। इसी तरह आज छोटी-छोटी बातों पर दल बदलने की घटनाएं हो जाती हैं जबकि जिस समय भगवानन राम का राजतिलक होना था। उस समय उनका वनवास हो गया तब भी उन्होंने कोई गिला शिकवा नहीं किया। वनवास की ओर प्रसन्न मुद्रा में प्रस्थान कर गए और उस दौरान पत्नी सीता का अपहरण और भी कितनी समस्याएं आई और सभी जानते हैं लेकिन आदर्शों से कभी भटके नहीं। जाहिर है आज की राजनीतिक रामनवमी और कृष्ण जन्माष्टमी जैसे अवसरों पर प्रेरणा लेकर न्याय धर्म और सत्य की राजनीति को बढ़ा सकते हैं। जिससे स्वयं नेताओं का भला होगा समाज का भला होगा देश का भला होगा।
०-नया इंडिया के कालम ”राजनैतिक गलियारा” से साभार)
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