कर्जमाफी की हकीकत जानने के बहाने भूरिया को स्थापित करने की तैयारी

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। झाबुआ जिले के बहुचर्चित आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया जिन्होंने अपनी कार्यशैली के कारण उनकी साख आदिवासियों में खत्म होने की कगार पर है क्योंकि भाजपा के १५ वर्षों के शासनकाल में आदिवासियों के हितों के नाम पर कांतिलाल भूरिया ने पूरे प्रदेश की तो बात छोडि़ए अपने झाबुआ, धार, बड़वानी व अलीराजपुर जैसे जिलों में भाजपा शासनकाल में जितनी उपेक्षा इस वर्ग के लोगों की हुई तो अन्य जिलों की बात छोड़ें मध्यप्रदेश की पूर्व भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान कई दफा आदिवासियों के नाम पर मुख्य बजट में आवंटित राशि को भी चुपके से आहरण कर अन्य योजनाओं में लागने का काम किया लेकिन कांतिलाल भूरिया एक भी ऐसा कोई जनआंदोलन कर सके जिस आंदोलन के माध्यम से आदिवासियों का हित हुआ हो। तो वहीं झाबुआ और अलीराजपुर जिले में भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान शराब माफियाओं के इशारों पर इन जिलों के थाने संचालित होते रहे और उन्हीं शराब माफियाओं के इशारे पर जिले के कई पंच सरपंच से लेकर कई आदिवासियों को जेल में फर्जी मामले लगाकर पहुंचा दिया गया लेकिन ऐसा नहीं कि जन सबकी खबर कांतिलाल भूरिया या उनकी विरासत संभालने वाले उनके पुत्र विक्रम भूरिया को नहीं हुई हो लेकिन दोनों ही भाजपा के पूरे शासनकाल में अपनी नेतागिरी दिल्ली और भोपाल में चमकाते रहे लेकिन भाजपा शासनकाल में आदिवासियों पर हो रहे जुल्मों के खिलाफ न तो उन्होंने और न ही उनके परिवार की सदस्य कलावती भूरिया भी कोई आंदोलन कर सकीं। हाँ, यह जरूर है कि एक बार उन्होंने पता नहीं क्या सोचकर जिले के अवैध शराब माफियाओं के खिलाफ आंदोलन करने की चेतावनी जरूर दी थी लेकिन चेतावनी के बाद भी वह आंदोलन नहीं कर सकीं पता नहीं इसके पीछे के क्या कारण हैं यह तो कलावती भूरिया ही बता सकती हैं। लम्बे अर्से तक झाबुआ जिले के विधायक और सांसद के साथ-साथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे कांतिलाल भूरिया झाबुआ ही नहीं पूरे प्रदेश के आदिवासियों के हितों के लिये कोई ऐसा काम उनके नाम पर नहीं जुड़ा है जिसको लेकर कांतिलाल भूरिया को प्रदेश के आदिवासियों का सर्वमान्य नेता माना जाए। हाँ, यह जरूर है कि प्रदेश में १५ वर्षों बाद कांग्रेस जब सत्ता पर काबिज हुई तो वह अब सत्ता की बदौलत अपने प्रतिद्वंदियों को निपटाने की साजिश जरूर रचते रहे लेकिन उन्हें उसमें भी सफलता नहीं मिली। हाँ, यह जरूर है कि अपने प्रतिबद्वंदी के बहाने प्रदेश के एक जनहितैषी कार्यों से जुड़े पीएचई विभाग के मुखिया के परिवर्तन करने में जरूर वह कामयाब हो गये। प्रदेश के इस पीएचई विभाग में हुए इस परिवर्तन में उनको क्या लाभ मिला यह तो वही बता सकते हैं। लेकिन पीएचई विभाग में कांतिलाल भूरिया के इशारे पर हुए पीएचई विभाग के मुखिया के परिवर्तन से उन्हें कितना लाभ हुआ यह तो वही बता सकते हैं। लेकिन अपने विपक्षी को इस बहाने कमजोर करने की सत्ता की बदौलत इस साजिश में वह सफल नहीं हो सके, उसका परिणाम यह हुआ कि पहले पुत्र और बाद में स्वयं कांतिलाल भूरिया दोनों को पराजय का स्वाद चखना पड़ा। सवाल यह है कि सत्ता की बदौलत उन्होंने पीएचई विभाग में परिवर्तन करने में कामयाबी हासिल की लेकिन इसकी वजह से जो जलसंकट से आज प्रदेश की आधी से अधिक आबादी जूझ रही है उसके जिम्मेदार भी विभाग के लोग भूरिया को ही मानकर चल रहे हैं, मजे की बात तो यह है कि जो कांतिलाल भूरिया आदिवासी का सर्वमान्य नेता होने का भ्रम पाले नेतागिरी कर रहे हैं उन्हीं के अपने अलीराजपुर जिले के पीएचई विभाग में जो खेल भाजपा शासनकाल में पीएचई विभाग के प्रमुख सचिव के फर्जी फोन पर अलीराजपुर में पदस्थ पीएचई के ईई ने विभाग के गुजरात के एक ठेकेदार से १५ लाख रुपये विभाग के तत्कालीन पीएस के खाते में जमा करवाये उस मामले में भी कांतिलाल भूरिया द्वारा कोई कार्यवाही नहीं करना भी कई सवाल खड़े करते नजर आ रहे हैं तो वहीं अलीराजपुर में ही पीएचई के ईई की कार्यशैली के चलते आदिवासियों को फ्लोराइडयुक्त पानी पीने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है, लेकिन अपने ही वर्ग के आदिवासियों के हितों के लिये न तो कांतिलाल भूरिया और उनकी विरासत के उत्तराधिकारी विक्रम भूरिया ने आज तक कोई आवाज नहीं उठाई और आखिरकार वर्षों से अलीराजपुर के कई गांवों के वह आदिवासी फ्लोराइडयुक्त पानी पीने के कारण तमाम बीमारियों से जूझ रहे हैं, जिस झाबुआ-रतलाम संसदीय क्षेत्र से वह अनेकों बार सांसद रहे हैं उसी संसदीय क्षेत्र में रहने वाले हजारों आदिवासी आज भी तमाम समस्याओं से जूझ रहे हैं लेकिन आज तक ऐसा कोई जन आंदोलन भाजपा के शासनकाल में कांतिलाल भूरिया अथवा उनके पुत्र विक्रम भूरिया नहीं चला सके। कांग्रेस कांतिलाल भूरिया को प्रदेश के आदिवासियों का सर्वमान्य नेता मानकर चलते हैं उनकी कार्यशैली अपने ही जिले और उसके आसपास के आदिवासियों के हितों की नहीं है तो वह प्रदेश के आदिवासियों के सर्वमान्य नेता कैसे हो सकते हैं। हाल ही में हुए विधानभा चुनाव में उनके विक्रम भूरिया और लोकसभा चुनाव में स्वयं कांतिलाल भूरिया जिन जीएस डामोर से पराजय का स्वाद चख चुके हैं इससे यह साफ हो जाता है कि दोनों पिता-पुत्र जो अपने आपको आदिवासियों का सर्वमान्य नेता मानकर चलते हैं उनकी साख अब क्षेत्र में खत्म हो गई है। मजे की बात यह है कि इन्हीं पिता-पुत्र की राजनीति की बदौलत आदिवासी झाबुआ, अलराजपुर, धार और बड़वानी में जयस भी सक्रिय हो गई लेकिन यह दोनों पिता-पुत्र जयस के बढ़ते प्रभाव पर रोक नहीं लगा सके आज वही जयस कांग्रेस के लिये मुसीबत खड़ी करने में लगी हुई है। जबकि उसी क्षेत्र से लगे धार जिले में उमंग सिंघार और बाला बच्चन कई कांग्रेसी नेता हैं जो अपने-अपने क्षेत्रों में कितने प्रभावशील हैं, यह तो कांग्रेस को परखने की जरूरत है। मजे की बात यह है कि हाल ही में हुए दोनों चुनावों में पिता-पुत्र की हार कांग्रेस कांतिलाल भूरिया को आज भी प्रदेश के आदिवासियों का सर्वमान्य नेता बनाने पर तुली हुई है और इसके लिये सरकार अपने स्तर पर कांतिलाल भूरिया की हार की मायने तलाशने के लिये आदिवासी क्षेत्रों में शिवराज सिंह चौहान के शासनकाल की तरह मैदानी स्तर पर सरकार के गिरते स्तर और उसकी योजनाओं के लाभ के लिये सूखा पर्यटन अधिकारियों को मैदानी स्तर पर भेजने का काम किया था अब कमलनाथ और कांग्रेसियों की नजर में अपनी पार्टी के दिग्गज नेता कांतिलाल भूरिया और उनके पुत्र विक्रम भूरिया की हार के मायनों की तलाश किये जाने के लिये अधिकारियों का एक दल आदिवासी ब्लॉकों में भेजने की तैयारी की जा रही है यह दल किसानों की कर्जमाफी का कितना लाभ मिला उसकी मैदानी हकीकत जानने के साथ-साथ आदिवासी क्षेत्रों में जाकर इस हकीकत को खोजने के लिये सहकारिता विभाग ने आठ वरिष्ठ अधिकारियों को इसका जिम्मा सौंपा है, सरकार यह कवायद शायद झाबुआ में विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने जाने और बाद में रतलाम-झाबुआ लोकसभा क्षेत्र से भाजपा से सांसद बने जीएस डामोर द्वारा झाबुआ विधानसभा से विधायक के रूप में त्यागपत्र देने के कारण आगामी दिनों में झाबुआ विधानसभा के होने वाले उपचुनाव को ध्यान में रखते हुए। उपचुनाव में पुन: कांतिलाल भूरिया को उतारने की तैयारी की जा रही है और मैदानी हकीकत जानने के लिये जिन अधिकारियों को जिम्मा सौंपा गया है वह झाबुआ जिले में जाकर क मलनाथ सरकार के द्वारा कर्जमाफी से आदिवासियों को क्या लाभ हुआ इसकी खोज करेंगे और इस खोज के माध्यम से आदिवासियों में कमलनाथ की गिरती साख का भी जायजा लेंगे ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही है फिलहाल सरकारी स्तर पर कमलनाथ सरकार कांतिलाल भूरिया को प्रदेश का सर्वमान्य आदिवासी नेता बनाने की तैयारी में लगी हुई है लेकिन उनके अपने विधानसभा क्षेत्र में आदिवासी किन समस्याओं से जूझ रहे हैं इसका ज्ञान शायद कांतिलाल भूरिया को भी नहीं है यही वजह है कि उनकी साख अपने ही वर्ग के आदिवासियों में लगातार गिर रही है लेकिन सरकार है जो उन्हें आज भी झाबुआ जिले का सर्वमान्य आदिवासी नेता मानने में लगी हुई है।

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