करोड़ों खर्च के बावजूद भी नहीं मिटने का नाम ले रहा प्रदेश...

करोड़ों खर्च के बावजूद भी नहीं मिटने का नाम ले रहा प्रदेश से कुपोषण का कलंक

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। पूर्व शिवराज सरकार के कार्यकाल में सक्रिय मंत्रियों, अधिकारियों और ठेकेदारों के सक्रिय रैकेट के चलते सरकारी योजनाओं में फर्जी आंकड़ों की रंगोली सजाकर जिस तरह से वाहवाही लूटने का जो खेल चला लगता है कि १५ वर्षों के बाद भाजपा के सत्ता में बेदखल होने के बाद भी यह सिलसिला आज भी जारी है, हालांकि उस पूर्व शिवराज के शासनकाल में कुपोषण के कलंक को मिटाने के लिये करोड़ों रुपये खर्च किये गये लेकिन उसके बाद भी कुपोषण खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था बल्कि स्थिति यह रही थी कि कुपोषण के नाम पर मंत्रियों, अधिकारियों और ठेकेदारों ने अपनी तिजोरी भरने का काम किया। प्रदेश के कई जिलों के बच्चे आज भी कुपोषण से जूझ रहे हैं। पूर्व शिवराज सरकार के कार्यकाल में प्रदेश के आदिवासी जिला झाबुआ कुपोषण से बच्चों की मौत के मामले में सुर्खियों में रहा तो वहीं कमलनाथ सरकार के आते ही श्योपुर जिला भी इन दिनों कुपोषण से बच्चों की मौत के मामले में सुर्खियों में है। मजे की बात यह है कि कुपोषण के बचाव के लिये श्योपुर जिले में एक बच्चे पर साढ़े चार हजार रुपये खर्च किये जाने का दावा किया जा रहा है लेकिन इस दावे के बावजूद कुपोषण से बच्चों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। यह वही श्योपुर जिला है जिसके प्रभारी मंत्री बनते ही पूर्व शिवराज सरकार की राज्यमंत्री ललिता यादव अपने परिवार व लाव-लश्कर के साथ दल-बल सहित जिला योजना समिति की बैठक में भाग लेने के लिये पहुंची थीं, ललिता यादव के जनप्रतिनिधि बनने के बाद उनकी सम्पत्ति में २४३ प्रतिशत इजाफा होने का मामला भी सुर्खियों में रहा तो वहीं श्योपुर जिले के प्रभारी मंत्री के रूप में अपने परिवार के सदस्यों के साथ ठेकेदारों को ले जाने को लेकर भी उठे तमाम सवालों का आज भी जवाब खोजने में लोग लगे हुए हैं। हालांकि पूर्व भाजपा शासनकाल में इस तरह की घटनाएं हमेशा सुर्खियों में रहीं तो वहीं कुपोषण के शिकार बच्चों को कुपोषण से मुक्ति दिलाने के नाम पर भी करोड़ों खर्च किये गये लेकिन प्रदेश से कुपोषण का कलंक आज तक नहीं मिट पाया। प्रदेश में सत्ता के बदलाव के बाद भी आज प्रदेश का वही श्योपुर जिला अब फिर सुर्खियों में है जिले में कुपोषण के खात्मे पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। हर महीने दस करोड़ ७० लाख रुपए से ज्यादा कुपोषण को जड़ से समाप्त करने पर खर्च किया जा रहा है। श्योपुर में २२ हजार से ज्यादा कुपोषित बच्चे हैं, यानी एक कुपोषित पर एक महीने में औसतन चार हजार पाँच सौ रुपये खर्च हो रहा है। इतने बड़े खर्चे के बाद भी कुपोषण घटने की बजाय बढ़ता जा रहा है। महिला एवं बाल विकास विभाग का रिकॉर्ड बता रहा है कि दिसम्बर २०१८ में श्योपुर जिले में कुपोषित बच्चों में संख्या २२०५० थी, इनमें ३४१० अति कुपोषित बच्चे थे, जिनकी हालत बेहद नाजुक थी। मई-जून २०१८ का रिकॉर्ड देखें तो पता चलता है कि कुपोषितों की संख्या बढ़कर २२२५० से ज्यादा हो गई। यानी १९० कुपोषित बच्चे बढ़ गए हैं। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि दिसम्बर २०१८ में गंभीर कुपोषितों की संख्या ३४१० थी भी अब बढ़कर ३८५० को पार कर चुकी है। यानी छह महीने में ४४० गंभीर कुपोषित बढ़ गए हैं। बस यही कारण है कि कुपोषित बेकाबू हो चुका है और बीते एक महनीे में १८-२० कुपोषितों की मौत के मामले अब तक सामने आ चुके हैं। दिसम्बर २०१७ से कुपोषणग्रस्त सहरिया परिवारों को एक-एक हजार रुपए नकद दिए जा रहे हैं। जिले में ३४५४३ आदिवासी परिवारों को हर महीने तीन करोड़ ४५ लाख ४३ हजार रुपए बंट रहा है पूरक पोषण आहार पर हर महीने डेढ़ करोड़ और आंगनबाड़ी पर खाना व नाश्ते के लिए एक महीने में औसतन ८७ लाख ५० हजार रुपए खर्च हो रहे हैं कुपोषण के खात्मे के लिए कुछ नए नवाचार करने के लिए सरकार एक करोड़ रुपए अलग से श्योपुर जिले केा देती है। कुपोषण को रोकने के लिए तैनात किए गए आउटसोर्स कर्मचारी, आंगबाड़ी सहायिका कार्यकर्ता, सुपरवाइजर सीडीपीओ से लेकर डीपीओ के वेतन पर सरकार हर महीने तकरीबन ३२ लाख रुपए बांटे जा रहे हैं। एक नजर में कुपोषण का ग्राफ इस प्रकार है दिसम्बर २०१७ में २०३०० सामान्य कुपोषण ३८०० अतिकुपोषण, दिसम्बर २०१८ में १८६५० सामान्य कुपोषण, अति कुपोषण ३४० तथा मई-जून २०१९६ में १८४०० सामान्य कुपोषण तथा ३८५० अति कुपोषण के मामले सामने आए हैं। जैसा कि हर मामले में मंत्रियों का जो जवाब रहता है वैसी ही प्रतिक्रिया कमलनाथ सरकार की महिला एवं बाल विकास मंत्री मध्यप्रदेश का कहना है कि कुपोषण के खात्मे के लिए सरकार पूरे प्रयास कर रही है, लेकिन मैंने खुद देखा है कि कई आदिवासी महिलाएं बच्चों को एनआरसी में लाने तैयार नहीं। पैसा खर्च करके हम सुविधाएं दे सकते हैं, लेकिन आदिवासी समुदाय को इस समस्या के लिए खुद खड़ा होना पड़ेगा। वृक्षारोपण केवल सहरिया समुदाय के बीचव है, उन्हें जागरुक करने के लिए हम कदम उठाएंगे।

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