कमलनाथ ‘भूरियाओं’ के मोहपाश से कांग्रेस को निकाल पायेंगे बाहर?

0
438

०- अरुण पटेल
भाजपा विधायक गुमान सिंह डामोर के सांसद चुने जाने के बाद विधायक पद से इस्तीफा देने के साथ ही विधानसभा की मौजूदा सदस्य संख्या के आधार पर कांग्रेस की कमलनाथ सरकार स्वयं ही बहुमत में आ गई है और कांग्रेस विधायकों की संख्या के आधार पर ही उसे बहुमत मिल गया है। डामोर ने छ: महीने के अंदर ही कांतिलाल भूरिया और उनके बेटे विक्रान्त भूरिया को पराजित करने का जो रिकार्ड झाबुआ में बनाया है उसका ही यह नतीजा है कि कमलनाथ सरकार अपने बलबूते उस समय तक मजबूत हो गयी है जब तक झाबुआ उपचुनाव का नतीजा उसके विपरीत नहीं जाता। कांतिलाल भूरिया स्वयं एक बार फिर झाबुआ में चुनाव लडऩे की तैयारियों में भिड़ गए हैं। 1980 से कांग्रेस की झाबुआ में राजनीति “भूरियाओं” के भरोसे ही रही है लेकिन झाबुआ की चाहत अब किसी नये चेहरे की तलाश में है, यह डामोर की जीत ने साबित भी कर दिया है। कमलनाथ के लिए अपनी सरकार को बहुमत में बनाये रखना हर हाल में जरुरी है लेकिन क्या वे इसके लिए कांग्रेस को भूरियाओं के मोहपाश से मुक्त कराकर इनसे इतर किसी अन्य चेहरे को टिकट दिलाकर उपचुनाव लड़ाकर जिता पाते हैं, या नहीं इस पर ही उनकी सरकार को जो तात्कालिक राहत मिली है वह कायम रह पायेगी। यदि कांग्रेस भूरिया परिवार से बाहर उम्मीदवार नहीं बना पाती तो फिर हो सकता है भाजपा एक बार फिर कांग्रेस के किसी चेहरे को अपना उम्मीदवार बनाकर दलबदल का तड़का लगाते हुए इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखने की कोशिश करे। वैसे भी भाजपा कांग्रेस के कुछ नेताओं को अपने पाले में मिलाकर कमलनाथ को झटका देना चाहती है, वह भी किसी सूरत में इस सीट पर अपना दबदबा कायम रखना चाहती है क्योंकि आने वाले समय में जो भी यह सीट जीतेगा उसका प्रदेश में ग्राफ अनायास बढ़ जायेगा।

मध्यप्रदेश के रतलाम-झाबुआ लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित सांसद गुमान सिंह डामोर विधायक पद से इस्तीफा न दें इसको लेकर भाजपा भी उहापोह में थी। उसका एक वर्ग चाहता था कि वे विधायक पद की जगह सांसदी छोड़ दें लेकिन भाजपा हाईकमान ने विधायक पद से इस्तीफा दिलाना पसंद किया और भाजपा जो अपने को राज्य में बहुमत के ऐन करीब समझ रही थी वह एक कदम पीछे हट गयी। 230 सदस्यों वाली विधानसभा में साधारण बहुमत के लिए 116 सदस्यों की आवश्यकता होती है लेकिन विधानसभा चुनाव में कांगे्रस की गाड़ी 114 पर आकर रुक गयी और भाजपा को 109 सीटें मिलीं। एक निर्दलीय विधायक प्रदीप जायसवाल को मंत्री बनाकर कांग्रेस ने सरकार बना ली लेकिन सपा-बसपा विधायक के लगातार दबाव के चलते भाजपा प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनाने में लगी रही और कमलनाथ भी कुछ दबाव महसूस करते रहे। झाबुआ में 1980 से दिलीप सिंह भूरिया और कांतिलाल भूरिया के इर्द-गिर्द ही कांग्रेस की राजनीति घूमती रही है। जब तक दिलीप सिंह भूरिया कांग्रेस में रहे तो वे सांसद रहे और जब वे भाजपा में चले गये तो उन्हें हराकर कांतिलाल भूरिया राज्य की राजनीति छोड़कर लोकसभा में जा पहुंचे। 2014 में दिलीप सिंह भूरिया की किस्मत ने जोर मारा और मोदी लहर में वे भाजपा की टिकट पर लोकसभा चुनाव जीते लेकिन उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनकी बेटी निर्मला भूरिया को पराजित कर कांतिलाल लोकसभा पुन: पहुंच गये। इस बार हुए लोकसभा के आमचुनाव में डामोर ने उन्हें यहां पराजित कर दिया।

कांग्रेस की एक कमजोरी यह भी रही कि वह एक बार स्थापित हो चुके आदिवासी परिवारों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही जबकि समय की मांग है कि नया नेतृत्व पैदा किया जाए। वहीं आदिवासी इलाकों में अपनी जड़ें मजबूत करने में भाजपा इस कारण ही सफल रही कि उसने नये लोगों को नेतृत्व का मौका दिया। अर्जुन सिंह जब प्रदेश के मुख्यमंत्री बने उस दौरान उन्होंने जरुर स्थापित आदिवासी परिवारों के नेताओं से इतर नया नेतृत्व जगह-जगह तैयार किया और उसकी बदौलत ही कांग्रेस की मजबूत पकड़ बनी रही। कमलनाथ के सामने अब यह भी एक चुनौती है कि क्या वे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग के बीच ऐसे नये चेहरों की खोज कर पाते हैं या नहीं जो स्थापित राजनीतिक घरानों से अलग हों। यदि वे झाबुआ में किसी नये चेहरे को मौका देते हैं तो उससे यह पता चल जायेगा कि वे कुछ नया करना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास झाबुआ में कोई मजबूत चेहरा नहीं है। कांग्रेस विधायक रहे जेवियर मेढ़ा की यहां मजबूत पकड़ है उनका अपना स्वयं का एक मजबूत वोट बैंक है और वे कांग्रेस के विधायक भी रह चुके हैं। लेकिन कांग्रेस ने उन्हें 2018 के विधानसभा चुनाव में इसलिए टिकट नहीं दी क्योंकि कांतिलाल भूरिया अपने बेटे विक्रान्त भूरिया को राजनीति में स्थापित करना चाहते थे, इसका नतीजा यह निकला कि मेढ़ा विद्रोही हो गए और कांतिलाल की हसरतों पर ऐसा ग्रहण लगा कि उसकी चपेट में बाद में वे स्वयं भी आ गए। अब मेढ़ा वापस कांग्रेस में आ गए हैं और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नजदीक भी हैं। ऐसी परिस्थितियों में जबकि राहुल गांधी नेता पुत्रों को लेकर नाराजगी व्यक्त कर चुके हैं इस स्थिति में क्या कमलनाथ हाल ही चुनाव में पराजित कांतिलाल की जगह दूसरे चेहरे को प्राथमिकता दिला पायेंगे।

झाबुआ में मेढ़ा की मजबूत पकड़
झाबुआ विधानसभा क्षेत्र में मेढ़ा की मजबूत पकड़ का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के डामोर को 65 हजार 725 मत मिले थे और कांग्रेस के डॉ. विक्रान्त भूरिया को 55 हजार 600 मत मिले तो वहीं जेवियर मेढ़ा को निर्दलीय उम्मीदवार के रुप में 35 हजार 462 मत मिले थे। लोकसभा चुनाव के पूर्व झाबुआ में फिर राजनीतिक समीकरण बदले और जेवियर मेढ़ा कांग्रेस में शामिल हो गए और न केवल शामिल हुए बल्कि उन्होंने मेहनत से कांतिलाल भूरिया का काम किया और इसका ही नतीजा रहा कि जिन-जिन मतदान केन्द्रों पर विधानसभा चुनाव में जेवियर को बढ़त मिली थी उन सभी में कांतिलाल को भी बढ़त मिली। जेवियर समर्थकों का दावा है कि ऐसे करीब 45 से 50 मतदान केंद्र हैं जहां कांग्रेस को इस चुनाव में बढ़त मिली। कांतिलाल भूरिया भी इस आधार पर टिकट का दावा कर रहे हैं कि लोकसभा चुनाव के दौरान झाबुआ विधानसभा क्षेत्र में उन्होंने डामोर को पीछे छोड़ दिया था। कांतिलाल को 95 हजार 869 मत मिले थे और डामोर को 88 हजार 571 मत मिले थे, लेकिन यहां यह याद रखना भी जरुरी है कि जेवियर कांग्रेस में वापस आ गये थे। अब भले ही कांतिलाल सक्रिय हो गए हों लेकिन कांंग्रेस की नजर जेवियर पर भी है, सवाल यही है कि क्या कभी कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे भूरिया की चाहत को पार्टी अनदेखा कर पायेगी। स्थानीय कांग्रेस नेता चाहते हैं कि अब भूरिया परिवार से अलग किसी और को उम्मीदवार बनाया जाए। वैसे भी मध्य भारत व मालवा अंचल में आदिवासियों के बीच तेजी से नया नेतृत्व उभरा है और लोगों की आकांक्षा यदि नये को मौका देने की है तो देखने वाली बात यही होगी कि कांग्रेस इसे कितनी तवज्जो देती है।

और यह भी
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चाहते हैं कि गांधी परिवार से परे कोई कांग्रेसी पार्टी की कमान संभाले, लेकिन अभी तक किसी भी स्थापित नेता ने ऐसा साहस नहीं किया जो कह सके कि मैं इस दायित्व को संभालने के लिए तैयार हूं। लम्बे समय तक गांधी परिवार पर आश्रित रहने के कारण कांग्रेस नेताओं को शायद अपनी क्षमताओं पर भरोसा नहीं रहा है, लेकिन ऐसे में पूर्व केंद्रीय मंत्री असलम शेर खान ने साहस दिखाते हुए राहुल गांधी से मांग की है कि उन्हें दो साल के लिए पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया जाए, वे इसके लिए तैयार हैं। असलम शेर खान पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं और उन्होंने ओलंपिक हाकी में अंतिम कुछ सेकेन्डों में गोल कर भारत को जीत दिला दी थी और उन्हें भरोसा है कि यदि उन्हें मौका मिलता है तो वे कांग्रेस के लिए भी ऐसा ही कमाल कर सकते हैं। उन्होंने राहुल गांधी को लिखे अपने पत्र में कहा है कि सिर्फ कमरों में बैठ कर और राहुल गांधी की आलोचना करने से कुछ नहीं होगा, पार्टी को मजबूत बनाने के लिए सभी नेताओं व कार्यकर्ताओं को मैदान में उतरना होगा। कांग्रेस को अपने उस पहलू को पूरी ताकत से उभारना होगा कि वही असली राष्ट्रवादी पार्टी है और उसका राष्ट्रवाद ही असली राष्ट्रवाद है। वैसे असलम ने कांग्रेस की कमजोर नस पकड़ ली है क्योंकि अब कांग्रेस नेता वातानुकूलित कक्षों से बाहर चुनाव के समय ही निकलते हैं।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
०००००००००

LEAVE A REPLY