इस बार क्यों कश्मीरियों के लिए मुश्किलों का सबब बनी है अमरनाथ यात्रा

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०-सुहैल ए शाह
अनंतनाग में खननबल चौक के एक कोने में सालों से रोज शाम कुछ रेहड़ी वाले पकौड़े और टिक्के बेचकर अपने-अपने घर चलाते थे। हाल ही में उन्हें वहां से हटा दिया गया है। वहां पर सुरक्षा बलों ने एक बंकर बनाया है। यह बंकर ऐसे १०० से अधिक बंकरों में से एक हैं, जो पिछले लगभग १५ दिनों में घाटी की अलग-अलग जगहों पर अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि ये बंकर एक जुलाई से शुरू हुई अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा का एक बहुत छोटा सा हिस्सा है। हजारों पुलिसकर्मी, सुरक्षा बल और सेना के जवान सुबह से लेकर रात तक इस यात्रा के मार्ग पर चौकसी से यह पक्का कर रहे हैं कि भारत के अलग-अलग भागों से अमरनाथ यात्रा पर आने वाले यात्री सुरक्षित रहें। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि अमरनाथ यात्रा के लिए सुरक्षा के ऐसे इंतजाम अभूतपूर्व हैं। अभूतपूर्व इसलिए कि न पहले कभी इतने बंकर बने, न इतने सुरक्षाकर्मी सड़कों पर खड़े रहे और न ही पहले कभी कश्मीर में यात्रा के चलते स्थानीय गाडिय़ों की घंटों चिलचिलाती धूप में रोककर रखा गया। सैलानियों के लिए टैक्सी चलोन वाले जावेद अहमद भट कहते हैं, ‘ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि श्रीनगर और पहलगाम का का सफर करीब आठ घंटे में तय हो रहा है, जो अन्य दिनों में ज्यादा से ज्यादा दो घंटे का होता है।Ó इन अभूतपूर्व सुरक्षा इंतजामों के पहले कश्मीर के लोग उनका सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाने की शिकायत कर रहे हैं। हालांकि सरकार में कोई इसे सुनने को तैयार नहीं दिख रहा। खननबल चौक पर पकौड़े बेचने वाले मुदस्सिर अहमद बताते हैं, ‘हम लोग सालों से ये यात्रा देखते आ रहे हैं, लेकिन ऐसा माहौल कभी नहीं था। ऐसा कभी नहीं हुआ कि हमें अपनी जगह से हटना पड़े।’ मुदस्सिर अहमद और उनके जैसे लगभग एक दर्जन रेहड़ी वाले अपनी जगह बदलकर यात्रा के खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘पुलवामा हमले के बाद हमें बराबर इनपुट मिलते रहे हैं कि यात्रा को निशाना बनाया जाएगा। और हम कोई रिस्क नहीं ले सकते।Ó कोई भी सुरक्षा अधिकारी इससे ज्यादा न इस बात पर बात कर रहा है और न अपना नाम छापने की इजाजत दे रहा है। इस साल १४ फरवरी को पुलवामा में हाइवे पर हुए हमले में सीआरपीएफ के ४० से ज्यादा जवान मारे गए थे। इस हमले में भारत और पाकिस्तान को जंग के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया था। हमले के बाद ही कश्मीर में हाइवे पर प्रतिबंधों का सिलसिला शुरू हो गया था। लेकिन इस वक्त यात्रा के चलते हालात पहले से भी ज्यादा खराब हैं। खननबल-पहलमाग रोड (केपी रोड) अमरनाथ यात्रा का पारंपरिक मार्ग है और अगर सरसरी नजर भी दौड़ाएं तो यह रास्ता इस समय किसी छावनी से कम नहीं है। ४५ किलोमीटर के इस रास्ते के इर्द-गिर्द रहने वाले दुकानदारों, सफर करने वाले लोगों, मुलाजिमों, डॉक्टरों, टीचरों और छात्रों,सब का बुरा हाल है। बीमार के लिए तो और भी मुसीबत है। और यह सिर्फ केपी रोड का हाल नहीं है। पूरी घाटी में, जहां-जहां अमरनाथ यात्रा गुजरते हैं, यही स्थिति है। उधर, पूरे श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग का भी यही हाल है। माल से लदे ट्रक कई-कई दिन रास्ते में खड़ रहते हैं। लगभग ३०० किलोमीटर लम्बे इस राजमार्ग को पार करना असंभव सा हो गया है। बशीर अहमद कश्मीर वैली फ्रूट ग्रोअर्स कम डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। उनके मुताबिक अगर यही हाल रहा तो उनकी इंडस्ट्री का करीब-करीब दो हजार करोड़ का नुकसान तय है। बशीर अहमद कहते हैं, ‘सेब और दूसरे मेवे तैयार हो रहे हैं और कुछ ही दिनों में इनको देश के दूसरे मार्गों में भेजा जाना होगा। हम सब जानते हैं कि फ्रूट कितनी जल्दी खराब हो जाता है और अगर श्रीनगर से जम्मू पहुंचने में ट्रक को इतना ही टाइम लगने वाला है जितना अभी लग रहा है तो एक हजार से दो हजार करोड़ का नुकसान तय है।’ दूसरी तरफ कश्मीर में राजनेता भी हाइवे पर गाडिय़ां रोके जाने को लेकर खुलकर सामने आ रहे हैं। कुछ दिन पहले ही राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी की मुखिया महबूबा मुफ्ती ने कहा, ‘ऐसा लग रहा है जैसे ये सब सुरक्षा के इंतजाम लोगों को तकलीफ में डालने के लिए किए गए हैं। यात्रा सालों से चलती आ रही है और लोगों को यात्रा से कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन जो यात्रा की सुरक्षा के नाम पर किया जा रहा है वो लोगों के साथ ज्यादती है।Ó उनका यह भी कहना था कि ऐसा करके सरकार दो समुदायों के बीच दरार डाल रही है। महबूबा मुफ्ती के साथ-साथ नेशनल कान्फ्रेंस, शाह फैसल केक जममू कश्मीर पीपल्स मूवमेंट, कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य राजनीतिक दलों ने इन प्रतिबंधों का विरोध करते हुए राज्यपाल सत्यपाल मलिक से इस पर गौर करने की गुहार लगाई है। लेकिन वे गौर करने के मूड में नहीं दिख रहे। बीते रविवार को ही सत्यपाल मलिक ने कहा कि यात्रा की सुरक्षा के लिए लोगों को ये प्रतिबंध झेलने चाहिए। उनका कहना था, ‘ये यात्रियों की सुरक्षा के लिए किया जा रहा है और लोगों को ये झेल लेना चाहिए। हमारे उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा के समय हाइवे पर एक महीना कोई गाड़ी नहीं चलती है।’ लेकिन सत्यपाल मलिक शायद यह भूल गए कि उत्तर प्रदेश के उलट कश्मीर घाटी में आने-जाने का सिर्फ एक ही रास्ता है।
०-सुबह सवेरे के कालम ”प्रसंगवश” से साभार)
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