आलोक वर्मा को हटाकर मोदी ने बनाया ये कैसा कीर्तिमान

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०-विजय तिवारी
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। जो काम कांग्रेस के सत्तर साल के इतिहास में न हुआ उसे भाजपा के शासनकाल में किया गया। एक नौसेनाध्यक्ष को बर्खास्त किया और २६ साल बाद नरेन्द्र मोदी ने नियत अवधि केे पदासीन अफसर को भी हटाकर कीर्तिमान बनाया। सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा की सुप्रीम कोर्ट से बहाली को सरकार चौबीस घंटे भी नहीं पचा पायी और आनन-फानन में उनका तबादला उस पद पर किया गया जिसके लिए वे सर्वथा अनुपयुक्त थे। आईपीएस सेवा के नियमों के तहत आलोक वर्मा ३१ जुलाई २०१७ को साठ वर्ष के हो गए थे। कैबिनेट सचिव, गृह सचिव और सीबीआई के निदेशक का पद नियतकालीन होता है जो अवकाश प्राप्ति की आयु से बंधा नहीं होता वरन यह नियुक्ति की तारीख से दो वर्षों के लिए होता है जबकि पुलिस के अन्य पद साठ वर्ष के नियम से आबद्ध होते हैं। अब सोचें कि जिस समिति में प्रधानमंत्री हों, प्रधान न्यायाधीश के प्रतिनिधि हों और लोकसभा में विपक्ष के नेता हों उन्हें अगर यह अंतर नहीं मालूम हो तो इस देश के शीर्ष नेतृत्व की दशा को सहज ही समझा जा सकता है। संयोग देखिये कि आज से २६ साल पहले अटलजी की सरकार ने भी विश्व के इतिहास में किसी नौसेना अध्यक्ष को अप्रसन्नता के कारण बर्खास्त किया हो। ३० दिसम्बर १९९८ को सरकार से उप नौसेनाध्यक्ष पद पर रियर एडमिरल हरमीनद्र सिंह को नियुक्त किए जाने पर उन्होंने सरकार के फैसले पर अप्रसन्नता व्यक्त की थी। परिणाम राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद ३१० के अधीन उन्हें हटाया गया। देश की अनेक केन्द्रीय सेवाओं में सेना के तीनों अंग और नियतकालिक नियुक्ति भी आती है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समय थल सेनाध्यक्ष जो आज मोदी सरकार के मंत्री हैं, जनरल वीके सिंह ने सरकार के आदेशों के विरुद्ध अपनी आयु कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, रक्षा मंत्रालय के निर्देश की अवहेलना कर अदालत में सरकार के आदेश को चुनौती दी थी। अपने संभावित उत्तराधिकारी और रक्षा मंत्री तथा प्रधानमंत्री के फोन टेप करने के भी आरोप लगे थे परंतु बकौल मोदी भक्तों के एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर मनमोहन सिंह ने जरनल वीके सिंह की हरकतों को अनदेखा किया, क्योंकि एक प्रधानमंत्री या रक्षा मंत्री का अपने मातहत के साथ सींग लड़ाना शोभनीय नहीं होता है परंतु प्रधानमंत्री की मेरी मर्जी में सवाल पूछना उन्हें इतना नागवार गुजरता है कि वे बर्दाश्त नहीं कर पाते। दिल्ली विाानसभा चुनावों मेंसारी पार्टी, संघ और बेशुमार पैसा प्रचार खर्च करने के बाद भी उन्हें जो राजनीति की शतरंज में अरविंद केजरीवाल ने मात दी कि उनकी आठ रैली और घटाटोप विज्ञापन और टीवी प्रचार भी उनकी साख की जमानत नहीं बचा पाया। तथ्यों पर नजर डालें तोसीबीआई या सरकारी तोता में आलोक वमा्र और विशेष निदेशक अस्थाना दोनों ही देश के सुरक्षा सलाहकार डोवाल की पसंद थे जिन्हें मोदी भक्त अफसरों द्वारा निहायत सख्त अफसर माना जाता है। यद्यपि उनके सेवाकाल में भी दिल्ली के एक होटल से महाराष्ट्र पुलिस द्वारा एक आरोपी को गिरफ्तार करने को लेकर विवाद सामने आया था। उसमें भी संदिग्ध आरोपी को रिश्वत और हवाला के मामले में पूछताछ के लिए महाराष्ट्र पुलिस ले जा रही थी। अब किन कारणों से डोवाल साहब ने उस घटना में हस्तक्षेप किया यह तो वे ही बता सकेेंगे। आलोक वर्मा और अस्थाना की रस्साकशी में भी डोवाल साहब का नाम आया था कि उन्होंने किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने या ना करने आदि के लिए ब्यूरो को कहा था। आस्थाना कुछ ज्यादा ही उनके करीबी थे, इसलिए उन्होंने आलोकनाथ के सीधे आदेश को नकार दिया। इस घटनाक्रम से अखिल भारतीय सेवाओं में अनचाहे दबाव और राजनीतिक दखलंदाजी उजागर होती है।
०-नया इंडिया से साभार)
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