आबकारी विभाग में भ्रष्टाचार क्यों नहीं दिखाई दे रहा लोकायुक्त को?

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। एक मई १९९८ को विधानसभा के पटल पर याचिका समिति का २३वां प्रतिवेदन (भाग-दो) प्रस्तुत हुआ था जिसमें बेतवा नदी में प्रदूषण संबंधी याचिका फरवरी-मार्च, १९९७ सत्र में प्रस्तुत याचिका क्रमांक-२६४४ के संबंध में याचिका समिति की एक रिपोर्ट पेश की गई थी उस रिपोर्ट में संबंधित शराब डिस्टलरी के मालिक के बारे में यह लिखा था कि आसवनी प्रबंधन निश्चित ही राजनैतिक, प्रशासनिक रूप से सक्षम है और मण्डल जिला प्रशासन उनके सामने असहाय सिद्ध होता है इसके साथ ही उस रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया गया था कि प्रदूषण निवारण मण्डल के शीर्ष स्तर से नीचे स्तर तक की जो भूमिका है वह निश्चित ही दुर्भाग्यजनक है और इसकी उदासीनता दर्शाती है मण्डल अध्यक्ष जैसे जिम्मेदार व्यक्ति जब समिति के समक्ष प्रोसीक्यूशन की कार्यवाही संबंधी बात कहकर जायें और उसका पालन न करें तो निचले अमले से अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती है कहने को तो आबकारी विभाग का अमला स्थाई रूप से वहाँ उत्पादन पर निगरानी हेतु पदस्थ है लेकिन उसकी निष्ठा जनता एवं शासन के प्रति है, ऐसा नहीं लगा। जनता के साथ उसने विश्वाघात किया ही है साथ ही राजकोष में भी हानि पहुँचाई है। वास्तविक उत्पादन के तथ्य और स्थापित क्षमता के प्रबंध आसवनी प्रबंधकों द्वारा दर्शाया जा रहा उत्पादन उसका प्रमाण समय-समय पर आसवनी से अवैध शराब परिवहन करते वाहनों का पकड़ा जाना इस बात का प्रमाण है कि एक आयुर्वेद स्थापित क्षमता के उपयोग के बाद की गतिविधियां हैं। जिसके कई प्रकरण विधानसभा में चर्चित हुए हैं इसके साथ ही उस रिपोर्ट में यह कहा गया था कि शासन को ऐसे अधिकारी और कर्मचारियों को सेवा में रखे जायें या नहीं इस पर भी शासन को गंभीरता से विचार करना होगा, क्योंकि अंतत: जनता का शासन जनता के द्वारा जनता के लिये है न कि औद्योगिक इकाईयों एवं नौकरशाहों के हितों के संवर्धन के लिये इस तरह की टिप्पणी याचिका समिति का २०वां प्रतिवेदन (भाग-दो) दिनंाक एक मई १९९८ को विधानसभा में याचिका समिति की रिपोर्ट में की गई थी लेकिन आज इस तरह की टिप्पणी को लगभग २१ वर्ष से अधिक का समय बीत गया है लेकिन आबकारी विभाग की कार्यशैली में आज भी कोई परिवर्तन नहीं आया है स्थिति यह है कि भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल और खासकर शिवराज के १३ वर्षों के आबकारी अधिकारियों की मिलीभगत और अवैध शराब के कारोबारियों की सांठगांठ के चलते राज्य में शिवराज के १३ वर्षों के शासनकाल में शराब की जिस तरह से शराब की यह स्थिति हो गई थी कि उस समय प्रदेश में लोगों को अपने बच्चों को पिलाने के लिये रात दस बजे के बाद दूध नहीं मिल पाता था लेकिन शराब सुरा प्रेमियों को २४ घंटे उपलब्ध रहती थी शराब के इस तरह के अवैध कारोबार में सिर्फ कारोबारी ही नहीं बल्कि भाजपा के नेता इस कदर शामिल हो गये थे कि उनके संरक्षण की बदौलत प्रदेश में गांव-गांव तक शराब का अवैध कारोबार फल-फूल रहा था तो वहीं झाबुआ जिले के छोटे से गांव पिटोल में भाजपा नेताओं और शासन में बैठे लोगों के साथ-साथ आबकारी विभाग के अधिकारियों की संरक्षण की बदौलत इन्दौर जैसे महानगर से कहीं अधिक बीयर की बिक्री होती थी तो वहीं झाबुआ और अलीराजपुर में अवैध शराब के कारोबारियों के इशारे पर जिले के थाने चल रहे थे और थानों में भाजपा के पंच सरपंच से लेकर भाजपा के कई नेताओं पर झूठे प्रकरण चलाकर उन्हें जेल में बन्द कर दिया जाता था इस बात का खुलासा किसी विपक्षी दल या मीडिया द्वारा नहीं बल्कि तत्कालीन अलीराजपुर और झाबुआ जिले के प्रभारी मंत्री रहे शिवराज मंत्रीमण्डल में राज्यमंत्री रहे विश्वास सारंग द्वारा झाबुआ जिले के सर्किट हाउस में बुलाई गई भाजपा नेताओं और अधिकारियों की बैठक में भाजपा नेताओं ने आरोप लगाये थे। आज भले ही सत्ता बदल गई हो लेकिन आबकारी विभाग में अपर संचालक नेमा की कार्यशैली की बदौलत आबकारी डिस्टलरियों से आये दिन करोड़ों रुपये की अवैध शराब धड़ल्ले से निकलकर इन अवैध कारोबारियों के द्वारा पूरे प्रदेश में सप्लाई की जा रही है आबकारी विभाग के सूत्रों के अनुसार जितनी आमदनी आबकारी विभाग को सालभर में प्रदेश के देसी और अंग्रेजी शराब के ठेकों से होती है उससे कहीं अधिक शराब इन डिस्टलरियों में पदस्थ आबकारी अधिकारियों और डिस्टलरी मालिकों की सांठगांठ की बदौलत अवैध शराब के रूप में इन डिस्टलरियों से बाहर कर दी जाती हैं। इसका जीता-जागता प्रमाण है लोकसभा चुनाव की आचार संहिता के चलते आबकारी विभाग द्वारा बल्कि पुलिस द्वारा पकड़े गये स्पिरिट के कंटेनरों की जब्ती यह बात साबित करती है कि इस तरह का खेल आबकारी विभाग के अधिकारियों की बदौलत शराब फैक्ट्रियों का कारोबार चल रहा है, विभाग के सूत्रों के अनुसार आबकारी विभाग के अपर आयुक्त नेमा की कारगुजारी को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं व्याप्त हैं। मजे की बात यह है कि इस विभाग में पदस्थ आईएएस स्तर के अधिकारी जिन्हें आयुक्त बनाया जाता है उन पर इन्हीं नेमा का मायाजाल चलता है और उसी मायाजाल में इन दिनों वर्तमान आबकारी आयुक्त रजनीश श्रीवास्तव भी आ गये हैं और वह हर काम नेमा के मार्गदर्शन में कर रहे हैं जिसको लेकर आबकारी विभाग में असंतोष पनप रहा है नेमा की बदौलत ऐसे भ्रष्ट अधिकारी जिन्होंने अपने कार्यकाल में करोड़ों का चूना आबकारी राजस्व को लगाकर सरकारी खजाने को पहुंचाया वह अच्छे पदों पर पदस्थ हैं प्रदेशभर में आबकारी विभाग के अधिकारियों की जो स्थिति है वह एक मई १९९८ में विधानसभा में प्रस्तुत याचिका समिति के ३०वें प्रतिवेदन में एक आसवनी के संचालकों के संबंध में की गई टिप्पणी का एक-एक शब्द आज भी आबकारी विभाग पर नजर आ रहा है और प्रदेश के आसवनी मालिकों से मिलीभगत कर आबकारी विभाग प्रदेश के राजस्व को हानि पहुंचाने में लगा हुआ है। यही वह कारण है जिनकी वजह से इन कमाई बाले विभागों जिनमें आबकारी और प्रदेश की सीमाओं पर स्थित परिवहन चौकियों पर चल रही अवैध वसूली की और लोकायुक्त के द्वारा कार्रवाई नहीं किए जाने को लेकर तरह तरह की चर्चाएं आम नागरिकों में लोग चटखारे लेकर करते नजर रहे हैं?

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