आदिवासियों के हितों की लड़ाई भूरिया की जगह शिवराज ने लड़ी

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। कल राजधानी में हुए आदिवासियों को लेकर हाईवोल्टेज ड्रामा प्रदेश की सियासत से जुड़ा रहा और इस हाईवोल्टेज ड्रामे के बाद राजनीति से जुड़े लोगों के मन में इस लाख टके का सवाल को खोजने में हर कोई खोजने में लगा हुआ है कि इस प्रदेश के जिले झाबुआ से जुड़े आदिवासी नेता होने का भ्रम पालने वाले कांतिलाल भूरिया के द्वारा उनकी ही पार्टी की केन्द्र की यूपीए सरकार द्वारा आदिवासियों के हितों में जो निर्णय लिया गया था उस निर्णय के क्रियान्वयन कराने के लिये प्रदेश की १५ वर्षों की भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान आदिवासियों की उन समस्याओं जिनको लेकर कल राजधानी की सड़कों पर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सियासत का खेल खेला वह खेल कांतिलाल भूरिया क्यों नहीं खेल पाये? जबकि शिवराज सिंह के द्वारा किये गये आदिवासियों के हितों के लिये सियासत को प्रदेश के कमलनाथ सरकार के मंत्री पीसी शर्मा यह कहकर आरोप लगाते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री आदिवासियों के नाम पर नौटंकी रचने का खेल खेल रहे हैं आज जो समस्या सामने है वह उन्हीं के कार्यकाल की ही देन है, साढ़े तीन लाख आदिवासियों के वन अधिकार पट्टे के आवेदन शिवराज सरकार में ही निरस्त हुए थे और शर्मा का दावा है कि कमलनाथ सरकार तो उनका परीक्षण कराकर लाभ देने का काम कर रही है। पीसी शर्मा ने आगे कहा कि शायद झाबुआ विधानसभा सीट का उपचुनाव आ रहा है, इसीलिये शिवराज को यह मुद्दे याद आ रहे हैं, शर्मा ने कहा कि झाबुआ कॉलेज की लॉ फेकल्टी बन्द कर दी गई, केन्द्रीय आदिवासी विकास उपयोजना के आठ हजार ३३२ करोड़ रुपये लेप्स हो गये, केन्द्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष नंदकुमार साय ने २०१७ में भोपाल प्रवास के दौरान खुलासा किया था कि अनुसूचित जनजाति की योजनाओं में भ्रष्टाचार हुआ है आदिवासी क्षेत्रों में ५० फीसदी शिक्षकों के पद खाली हैं मुख्यमंत्री निवास के नजदीक आदिवासी छात्रावास है पर मुख्यमंत्री रहते शिवराज वहां कभी नहीं गये ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के मल्टीडायमेंशन नेशनल पॉवटी अलीराजपुर को देश का सबसे गरीब जिला अलीराजपुर बताया गया है वहां ७६.५ फीसदी लो गरीब हैं, गरीबी और भुखमरी के मामले में यहां की स्थिति अफ्रीका के सीएरालियोन जैसी है इसके अलावा अटलबिहारी वाजपेयी नीति स्वशासन स्कूल की रिपोर्ट सहारिया जनजाति के बच्चों को दूसरों की तुलना में ज्यादा कुपोषित बताया गया। सवाल यह है कि आज जब शिवराज सिंह ने आदिवासियों को राजधानी में हाईप्रोफाइल सियासत की तो पीसी शर्मा को यह सब याद आ गये लेकिन आदिवासियों का सर्वमान्य नेता का भ्रम पाले कांतिलाल भूरिया जिन्हें उनके पुत्र की पराजय के बाद भी झाबुआ में होने वाले विधानसभा के उपचुनाव के लिये चुनावी समर में उतारने के लिये कमलनाथ सरकार लगी हुई है, उन भूरिया को अपने समाज की लोगों की समस्या की लड़ाई लडऩे की फुर्सत नहीं रही, इस सवाल का हल ढूंढने में हर कोई लगा हुआ है और भूरिया को ही आदिवासियों का अहिती होने की बात लोग कहते नजर आ रहे हैं।

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