आज भी मुख्यमंत्री होने का भ्रम पाले हुए हैं शिवराज

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव जिसमें कांग्रेस ने नहीं बल्कि प्रदेश की जनता ने शिवराज को सत्ता से दूर किया लेकिन मजे की बात यह है कि आज भी शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री होने का भ्रम पाले हुए हैं इसका नजारा हाल ही में विधानसभा में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के चुनाव के दौरान शिवराज की स्टाइल देखकर लगा कि वह भले ही १३ वर्षों तक सत्ता पर काबिज रहे हों लेकिन उन्हें आज भी संसदीय ज्ञान नहीं है और वह विपक्ष में बैठे हुए भी उनके पास की दीर्घा को अधिकारी दीर्घा समझकर जैसा कि मुख्यमंत्री काल में हुआ करता था कि जब किसी मुद्दे पर मुख्यमंत्री या मंत्री घिर जाते हैं तो अधिकारियों की ओर से मिली पीर्चियों की ओर से उन्हेंं निजात मिल जाती थी शायद अध्यक्ष पद के चयन के समय जो व्यवहार शिवराज सिंह ने सदन में किया उसे देखकर तो यही लगता है कि शिवराज सिंह आज भी मुख्यमंत्री होने का भ्रम पाले हुए हैं तभी तो बिना नेता प्रतिपक्ष या अपने दल के सदस्यों की सलाह लिये उन्होंने अध्यक्ष पद के उम्मीदवारी के लिये भरे गये नर्मदा प्रसाद प्रजापति का फार्म जो कि विधानसभा सचिवालय में पहली बार जमा किया गया था उन फार्मों को पडऩा शुरू किया। संसदीय ज्ञान के जानकार यह अच्छी तरह से जानते हैं कि विधानसभा सचिवालय में चाहे ध्यानाकर्षण प्रस्ताव हो या अन्य किसी मुद्दे पर रखा गया प्रस्ताव अध्यक्ष द्वारा पहले प्राथमिकता दी जाती है उसी परम्परा का निर्वाहन करते हुए प्रोटेम स्पीकर दीपक सक्सेना ने किया और इसके बाद कांग्रेस को समर्थन दे रहे विपक्षी दल के नेता ने डिवीजन की मांग की उसी आधार पर सदन में मतदान हुआ और प्रोटेम अध्यक्ष द्वारा एनपी प्रजापति के अध्यक्ष होने की घोषणा कर दी गई, इसी बीच शिवराज सिंह चौहान नेता प्रतिपक्ष से सलाह मशविरा किये ही अध्यक्ष पर पक्षपात और मनमानी का आरोप लगाते हुए व नारे लगाते हुए भाजपा विधायकों सहित बाहर निकल लिये उन्होंने अपने इस अज्ञानता के चलते नेता प्रतिपक्ष ने सभी सलाह मश्विरा नहीं लिया। मजे की बात यह है कि अध्यक्ष पद के निर्वाचन में शिवराज की संसदीय अज्ञानता के चलते भाजपा को तो तो नुकसान हुआ ही तो वहीं उनकी मनमर्जी के चलते विपक्ष को मिलने वाला विधानसभा उपाध्यक्ष के पद से भी भाजपा हाथ धो बैठी, संसदीय जानकारों का यह कहना है कि जब शिवराज सिंह की अज्ञानता के चलते भाजपा द्वारा परम्परा के विपरीत अध्यक्ष पद के चुनाव के लिये नामांकन भरा और नियम और प्रक्रिया के चलते उसमें भाजपा को मात हासिल हुई लेकिन इस मात के बाद भी भाजपा के नेता नहीं संभले और उन्होंने उपाध्यक्ष के निर्वाचन की प्रक्रिया में भी वही गलती दोहराकर उपाध्यक्ष पद के उम्मीदवार का फार्म भी दूसरे क्रम पर जमा किया, तो उसमें भी सत्तारूढ़ दल ने विधानसभा की परम्परा के चलते भाजपा को मात देने में सफलता हासिल कर ली। मजे की बात यह है कि अपनी संसदीय अज्ञानता को छिपाने के लिये शिवराज ने विधानसभा से बाहर आकर उन्होंने राजभवन तक पैदल चलकर शिकायत करने की घोषणा कर दी। मजे की बात यह है कि जब वह घोषणा कर रहे थे तो उसी बीच निजी टीवी चैनलों द्वारा अध्यक्ष के निर्वाचन प्रक्रिया की जो सीधा प्रसारण किया जा रहा था उसमें दर्शकों को यह भी सुनाई दे रहा था कि भाजपा के नेता आपस में चर्चा कर रहे थे कि क्या राज्यपाल से समय लिया भाजपा नेताओं की यह चर्चा स्पष्ट सुनाई दे रही थी लेकिन शिवराज सिंह जिन्हें जनता द्वारा हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में सत्ता से बेदखल कर दिया उनकी सरकार की नीतियों और उनकी सरकार में बही भ्रष्टाचार की गंगोत्री और सबका विकास सबके साथ के जुमले के चलते जनता का नहीं बल्कि प्रदेश के भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और जनप्रतिनिधियों के विकास हुआ उसे भाजपा के नेता प्रदेश का विकास होने का ढिंढोरा पीटा करते थे उसी ढिंढोरे के चलते भाजपा की यह स्थिति हुई कि वह अपनी सरकार तक गवां बैठे लेकिन उसी मध्यप्रदेश में उन उमा भारती जिन्होंने कड़ी मेहनत मशक्कत कर कांग्रेस की सरकार को बेदखल कर प्रदेश में भाजपा की सत्ता कायम की थी उनके साथ कुचक्र कर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुए शिवराज सिंह चौहान की पार्टी के उन देवदुर्लभ और निष्ठावान कार्यकर्ताओं के साथ प्रदेश के एक दिन के लोकतंत्र के राजा (मतदाता) ने विदाई तो कर दी लेकिन शिवराज सिंह आज भी मुख्यमंत्री न होने के बावजूद भी अपने बयानों, कार्यशैली और विशेष अदा के चलते यह संकेत देते नजर आ रहे हैं कि वह मुख्यमंत्री पद होने का भ्रम वह अभी भी नहीं त्याग पा रहे हैं, इसी भ्रम के चलते उन्होंने राजभवन तक पैदल जाकर राज्यपाल से शिकायत करने की घोषणा कर डाली हालांकि अनुशासन में बंधे भाजपा के विधायकों ने उनकी इस घोषणा का पालन करते हुए राजभवन तक पैदल मार्च तो किया लेकिन रास्ते में जिस तरह की चर्चाएं यह विधायक कर रहे थे वह सुनने लायक थीं, इन विधायकों का कहना था कि जबदरस्ती इतने किलोमीटर चलवा डाला, शिवराज यह संकेत मुख्यमंत्री का पद त्यागने के बाद से अभी तक देते आ रहे हैं, हाल ही में उनकी ओर से यह ताजा बयान आया है कि वे पाला प्रभावित किसानों की समस्या का जायजा लेने १५ जनवरी से गांवों की यात्रा प्रारंभ करने जा रहे हैं, वे उन किसानों से जाकर मिलेंगे, जहाँ-जहाँ पाला पड़ा है, इसके पूर्व उन्होंने पांच जनवरी को भी घोषणा की था कि राजगढ़ और आगर जिले में किसानों से मिलने जाएंगे, उनका दौरा नेता प्रतिपक्ष चुनाव के कारण निरस्त कर दिया गया था, राजनीतिक हलकों में शिवराज की इस यात्रा को लेकर कहा जा रहा है कि वे अब सामान्य विधायक ही हैं, किसानों से मिलने की इतनी व्यकुलता क्यों? कहा जा रहा है कि प्राकृतिक आपदा के समय गांवों में जाने की ‘मुख्यमंत्री की स्टाइल’ वाली यात्राओं को शिवराज अभी भी भूल नहीं पा रहे हैं! यह सभी जानते हैं कि शिवाज की हार में ‘किसान फैक्टर’ एक बड़ा कारण रहा है, अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में शिवराज के मंत्री और विधायकों को हार का सामना करना पड़ा है। केवल यही नहीं, शायद उन्हें ध्यान नहीं रहा और ठंड के दौरान एकाएक रात को वे रैन बसेरा का जायजा लेने भी ऐसी ही स्टाइल में गए मानो वे अभी भी मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ही हों! सड़क पर शिवराज के चलने की अदा, कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद देने का अंदाज और मुख्यमंत्री से हटने के बाद अपने बंगले में कही गई गर्वोक्त, टाइगर अभी जिंदा है- सब कुछ मुख्यमंत्री शैली का प्रभाव झलका रहा है। भाजपा के भीतर और बाहर भी राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने तमाम कारणों के चलते उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाने से इनकार किया है, लेकिन शिवाज का विधानसभा के भीतर का व्यवहार ‘नेता प्रतिपक्ष’ जैसा ही रहा था, वे इस कुर्सी पर विराजित रहे, असली नेता प्रतिपक्षप गोपाल भार्गव को शिवराज यह महसूस ही नहीं होने दे रहे थे, कि यह पद उनके पास है। मुख्यमंत्री रहते हुए भार्गव उनकी कैबिनेट के मंत्री रहा करते थे, तब वे भला उनको क्या समझाते! भार्गव बात करने के लिए खड़े होते इसके पहले ही शिवराज बहिष्कार की बात कर भाजपा को ‘लीड’ करते हुए बाहर निकले, तब भी उनका अंदाज निराला था और भार्गव गौण नजर आ रहे थे। यह दृश्य भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। शिवराज सिंह चौहान ने इस्तीफा देने के बाद अपनी ट्वीटर प्रोफाइल पर लिखा- एक्स चीफ मिनिस्टर ऑफ मध्यप्रदेश, राजनीतिक हलकों में चर्चा के अनुसार, उनको सलाह दी गई कि यह प्रोफाइल आपको शोभा नहीं दे रहा है, कृपया इसे बदलें, तब उन्होंने नया प्रोफाइल लिखा-कामनमैन ऑफ मध्यप्रदेश! लेकिन यह एप्रोच केवल ट्वीटर तक ही है, शिवराज यह भूल नहीं पा रहे हैं कि फिलहाल तो वक्त बदल गया है और वे अब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं हैं।

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